Zoho : गांव से ऑपरेट होने वाली कंपनी जो गूगल को टक्कर देती है, मालिक करते हैं किसानी

सॉफ्टवेयर या सॉफ्टवेयर कंपनी के बारे में सुनते ही पहला ख्याल क्या आता है, जाहिर सी बात है ज्यादातर लोगों के दिमाग में माइक्रोसॉफ्ट से लेकर गूगल तक ये सभी घूम जाते होगें। वहीं जब इन सॉफ्टवेयर कंपनीयो का नाम आता है तो सामने एक बड़ी सी बिल्डिंग का चित्र छा जाता है। एक कंपनी जो 15 से 16 मंजिला बिल्डिंग वाली है, ऊपर से नीचे तक शीशे में कैद।

ज्यादातर सॉफ्टवेयर कंपनियां भारत की सिल्कन वैली बैंगलोर में हैं, वहीं मुंबई दिल्ली में भी आपको कई सॉफ्टवेयर कंपनियां मिल जाएगी। लेकिन क्या किसी सॉफ्टवेयर कंपनी का हेडक्वार्टर शहर के शीशमहल के बजाए किसी गांव की हरियाली के बीच एक घर में हो सकता है? आप कहेंगे की हां हो सकता है, लेकिन वो कंपनी ज्यादा कुछ खास नहीं होगी…, अगर सच में आपका यहीं जवाब है तो बता दें की हम जिस सॉफ्टवेयर कंपनी की बात कर रहे हैं, वो आज के दौर में गूगल और माइक्रोसॉफ्ट तक को टक्कर देती है, लेकिन इसको ऑपरेट गांव से किया जाता है।

क्या है Zoho सॉफ्टवेयर कंपनी ?

Zoho

हम जिस सॉफ्टवेयर कंपनी की बात कर रहे हैं उसका नाम है zoho। Zoho एक सॉफ्टवेयर कंपनी है जो एक सिंगल क्लाउड सिस्टम के जरिए हर वो एप्लिकेशन उपलब्ध कराता है। जिसकी जरूरत क्लाउड सिस्टम पर बिजनेस चलाने के लिए होती है। वहीं ये सॉफ्टवेयर कंपनी 40 तरह के ऐप्स भी प्रोवाइड करती है जिसमें zoho people, office, Books, CRM आदि हैं। इसके एप्लिकेशन ‘ सॉफ्टवेयर एज अ सर्विस’ सिस्टम के आधार पर डिस्ट्रीब्यूट होते हैं, मतलब सब्सक्रिप्शन लेनी होती है।

ज़ोहो अपने राइटर, शीट, शो, क्रिएटर, मीटिंग और प्लानर उत्पादों के लिए एक ओपन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस का उपयोग करता है। इसमें माइक्रोसॉफ्ट वर्ड और एक्सेल प्लगइन, एक OpenOffice.org प्लगइन और फ़ायरफ़ॉक्स के लिए एक प्लगइन भी है। यह साइट एक ऑनलाइन, ड्रैग एंड ड्रॉप वेबसाइट बिल्डर है। यह वेब होस्टिंग, असीमित भंडारण, बैंडविड्थ और वेब पेज प्रदान करता है।

मतलब कुल मिलाकर कहें तो ये सॉफ्टवेयर ऑनलाइन ऑफिस स्पेस देता है। जहां हर वो चीजें आपको मिलती हैं। जो एक बिजनेस को चलाने के लिए जरूरी है और इसके लिए कंपनी कुछ अमाउंट सब्सक्रिप्शन के तौर पर लेती है और इसके बदले में देती है आपके डाटा के सुरक्षा की गारंटी।

Zoho- तमिलनाडू के तेनकासी जिले में है हेडक्वार्टर

Zoho

भारत के वेस्टर्न घाट की ओर तमिलनाडू के एक छोर पर स्थित है तेनकासी जिला। ये जगह टूरिस्टों के बीच कोर्टाल्लम के पांच झरनों के लिए जाना जाता है, जो धार्मिक पांच सिर वाले सांप का प्रतिबिंब मानें जाते हैं और माना जाता है कि इसका पानी चमत्कारी है। इन झरनों से नीचे समतल जमीन है। जहां के ज्यादातर खेतों में धान उगाया जाता है। इसी जगह पर कंपनी ने यहां के एक गांव मथालंपराई में 4 एकड़ जमीन खरीदी, ताकि वो यहीं से ऑपरेट कर सके। ये जगह तमिलनाडू कि राजधानी से 650 km दूर है।

श्रीधर वेंभू का विजन- ‘ वर्क फ्रॉम विलेज ‘

Zoho के फाउंडर है, श्रीधर वेंभू का जन्म तमिलनाडू के किन तंजावुर जिले के एक गांव में हुआ था। जिसके बाद पढ़ाई के लिए वो शहर चले गए। जहां से आगे वे न्यू जर्सी पहुंचे और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और फिर्ल क्वालकॉम में काम किया। इस दौरान कभी से सैन देईगो और कैलिफोर्निया बे के पास रहे। यहीं पर उनके अंदर एक विजन आया कि सिल्कन वैली को गांव लेकर जाना है।

बस यहीं से zoho की नींव पड़ी, 20 वीं शताब्दी के आखिरी दौर में यानि 1996 के करीब श्रीधर ने एडवेंट नेट नाम से कंपनी अपने दोस्तों और परिवार के मदद से खोली ताकि वे सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट बना सकें। 2009 में उन्होंने कंपनी का नाम बदलकर zoho Corp रख दिया, क्योंकी ये सॉफ्टवेयर कंपनी जो network equipment vendors का काम करती थी। वो अब innovative online applications provider बन गई थी। जोहो के कई नई ऐप्स मथालंपराई के हेडक्वार्टर में तैयार हुए हैं। जो वेंभु के के अनुसार ये संकेत देते हैं कि विश्वस्तरीय उत्पाद बनाने के लिए शहर में रहना जरूरी नहीं है।

आज CoVid-19 के कारण दुनिया के लिए वर्क फ्रॉम होम नया मंत्र बन गया है। लेकिन श्रीधर पिछले कई सालों से वर्क फ्रॉम विलेज के मंत्र पर काम करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। हाल ही में फोर्ब्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि, कुछ साल पहले उनके में में ख्याल आया कि, कुछ नया किया जाए और इस नए काम ने मुझे गांव के तरफ बढ़ा दिया। वे कहते हैं कि मैं छोटे गांव में जाकर अपना सेटअप लगाना चाहता था, ऐसा सेटअप जहां से 10-20 लोग काम कर सकें।

अब तक, ज़ोहो के दो विलेज ऑफिसेज हैं, एक तेनकासी में और दूसरा आंध्र प्रदेश के रेनीगुंटा में, जिसमें इनके इंटरनेशनली काम करने वाले 9,300 एंप्लॉयज में से 500 एंप्लॉयज काम कर रहे हैं। वेंबू का प्लान है कि अपने 8,800 इंडियन एंप्लॉयर्स में ज्यादा से ज्यादा को गैर शहरी इलाकों में काम करने का वातावरण दें।

सॉफ्टवेयर के काम के संग किसानी भी करते हैं

Zoho

श्रीधर के गांव की तरफ आने के पीछे दो मुख्य बातें हैं। पहला ये की वे मानते हैं कि अगर उनके एंप्लॉयर्स को गांव का वातावरण मिलेगा तो, ये उनके लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि ऐसा वातावरण बहुत से आइडियास के क्रॉस फर्टिलाइजेशन दिमाग में उत्पन्न करते हैं। दूसरी बात ये कि वे इसी जरिए अपनी जड़ों तक पहुंच पाते हैं। पिछले आठ सालों में खुद वैंभू अपनी जड़ों तक चले गए हैं।

वे हर सुबह 4 बजे उठकर सबसे पहले यूएस ऑफिस से बात करते हैं फिर 6 बजे टहलने निकलते हैं। इसके बाद वे गांव के कुएं में तैराकी का माजा लेते हैं। फिर घर आकर ब्रेकफास्ट करते हैं। इसके बात होता है। ऑफिस का काम जिसमे इंजीनियरिंग वर्क को देखना, कॉड्स रिव्यू करना और कस्टमर्स से बात करना। इसके बाद श्रीधर उस काम को करते हैं। जो उनके पूर्वज करते थे, यानि खेती बाड़ी। वे अपने खेतों में धान या टमाटर, बैगन जैसे सब्जी और तरबूज जैसे फल उगाते हैं।

‘मैं अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस करता है और एक ऐसे वातावरण में रहने का माजा लेता हूं। जहां मुझे ये चिंता नहीं है कि मेरे पड़ोसी ने फरारी गाड़ी ली है या आज मेरा पड़ोसी आज छुट्टी पर है। इससे जीवन में अधिक मौलिक सादगी आईं है….श्रीधर वेमभू

बता दें कि ज़ोहो को पहला सॉफ्टवेयर उत्पाद यूनिकॉर्न होने का गौरव प्राप्त है और 2019 में फोर्ब्स ने श्रीधर वेम्बु कंपनी की 88 प्रतिशत की हिस्सेदारी की वैल्यू $ 1.83 बिलियन आंकी थी। 2019 में, जोहो ने ₹ 3,410 करोड़ के कुल राजस्व पर 9516 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया। कंपनी का दावा है कि वैश्विक स्तर पर उसके ऐप को 50 मिलियन लोग यूज करते हैं। कंपनी ने हाल में महामारी के मद्देनजर लॉन्च ऐप लॉन्च किए जिसे उपयुक्त रूप से ज़ोहो रेमोटी कहा जाता है।

आज जहां आमतौर पर बड़ी बड़ी आईटी कंपनियां शहरों में और मेट्रो सिटीज में अपना कारोबार जमाने की कोशिश में रहती हैं वहीं श्रीधर वेम्बु ने अपनी कंपनी zoho के जरिए ट्रेंड को उल्टा कर गांव को सॉफ्टवेयर हब बना दिया जहां से सीधी टक्कर गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों को मिलता है।

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