World Nature Conservation Day – आओ लें प्रकृति संरक्षण का संकल्प

संस्कृत का बहुत फेमस श्लोक है…

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

इसका मतलब है पहला सुख निरोगी काया। हमारा शरीर अगर स्वस्थ रहेगा तभी हम कुछ कर सकते हैं। हम स्वस्थ्य तभी रह सकते हैं जब हमारे आस पास का वातावरण अच्छा हो पोलुशन ना हो हमें पीने के लिए साफ़ पानी मिले, खूब हरियाली हो और हम ताज़ी हवा में सांस ले पाए। जल, जंगल और जमीन इन तीन तत्वों से ही मिलकर प्रकृति बनती है और अगर ये तत्व न हों तो प्रकृति इन तीन तत्वों के बिना अधूरी ही तो है। इसलिए स्वस्थ बनने के लिए हमें प्रकृति की जरुरत ना सिर्फ कल थी बल्कि आज भी है और कल भी रहेगी। कुछ यही आपको याद दिलाने के लिए हर साल 28 जुलाई को विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस यानि वर्ल्ड नेचर कन्सेर्वटिव डे मनाया जाता है। विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस हमे ये याद दिलाता हैं की हमे प्रकृति की रक्षा करनी चहिये और ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए। वैसे ये भी बड़े कमाल की बात है कि प्रकर्ति को बचाने के लिए हमें लोगों को ये बताना पड़ता है कि आपके स्वास्थ्य के लिए पर्यावरण का होना कितना जरुरी है। क्या बिना हम अपने बारे में सोचे हुए प्रकर्ति का संरक्षण नहीं कर सकते।

कुदरत, दुनिया का सबसे नायाब तोहफा है, कुदरती, खूबसूरती में हर किसी का खो जाने का मन करता है। लेकिन अफसोस इस बात का है, आज हम अपने स्वार्थ के चलते प्रकृति से ही खिलवाड़ कर रहे हैं। पहले हम कहते थे कि प्रकर्ति को संजों कर रखो वरना भविष्य खतरे में पड़ जाएगा मगर आज तो हम ये भी नहीं कह सकते क्योंकि हमारा तो आज ही खतरे में पड़ गया है। वैज्ञानिक भविष्य में प्रक्रति के नष्ट होने की चेतावनी बार बार दे रहे हैं। कई न्यूज़ चैनल्स, एनजीओ सरकार और तमाम बुद्धिजीवी हमें पर्यावरण के महत्व के बारे में बताते हैं जो कभीं हम बचपन में अपनी किताबों में पढ़ा करते थे। पर हम में से ज़्यादातर ने इसे बस किताबों में पढ़कर ही छोड़ दिया। पर क्या आज का मनुष्य सच में अपने आसपास के प्रकृति और पर्यावरण के महत्व को समझ पाया है? क्या व्यक्ति चांद तारे, सूरज आकाश, शीतल पवन, लहलहाते सुंदर वृक्ष, गीत गुनगुनाते पक्षी, और असीम समुद्र के विषय में सच में समझ पाया है? जवाब है नहीं ! आज इंसान प्रकृति को बहुत साधारण और तुच्छ समझने लगा है। क्योंकि प्रकृति हर जगह मौजूद है इसलिए लोग इसे आसानी से मिलने वाली एक तुच्छ चीज समझने लगे हैं। जबकि प्रकृति को एहसास करना और इसे समझना हर किसी व्यक्ति के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। प्रकर्ति के साथ इतनी तो छेड़छाड़ हमने कर दी और कितनी छेड़छाड़ करेंगे हम। क्यों आज सबको ऐसा लगता है कि प्रकृति को उनके अनुसार होना चाहिए ये सरासर गलत है क्योंकि हम प्रकृति के अनुसार रहने के लिए बने हैं ना कि इसमें अपने अनुसार कुछ बदलाव करने के लिए। लेकिन हम तो बदलाव पर बदलाव किए ही जा रहे हैं लाख चेतावनियों के बावज़ूद। प्रकृति ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है परंतु मनुष्य हमेशा इसे बर्बाद करने में लगा हुआ है। मनुष्यों ने पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीन हाउस प्रभाव, जैसे कई प्रकृति के विनाश करने वाले कारणों को पैदा किया है। आज के टेक्नोलॉजी की दुनिया में कई नए आविष्कार किए जाते हैं लेकिन इन अविष्कारों से प्रकृति पर क्या असर पड़ेगा ये कोई नहीं सोचता। इसलिए कुछ भी करने से पहले हमें ये सोचना चाहिए कि वो काम करने से प्रकृति को लाभ होगा या हानि।

आओ एक बार फिर पर्यावरण का आदर करें

इसलिए हमें जितना हो सके अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखना चाहिए, प्रदूषण नहीं फैलाना चाहिए, और अपने क्षेत्र में वनीकरण को बढ़ावा देना चाहिए। हर दिन लाखों घर बनाए जा रहे हैं जिसके लिए लाखों-करोड़ों पेड़ों की कटाई हो रही है ऐसे में हमें नए पौधे लगाना बहुत जरूरी है ताकि प्रकृति में पेड़ पौधों का संतुलन बना रहे। हर कोई अच्छा वातावरण खुला आसमान ठंडी हवा और हरियाली देखना चाहता है। जिसके लिए लोग हज़ारों रूपए खर्च कर के पहाड़ों पर जाते हैं। लेकिन आप ये सब सिर्फ साल में एक ही बार क्यों चाहते हैं। क्यों नहीं ऐसा माहौल ऐसा पर्यावरण आप हमेशा रखना चाहते हैं। जब हम वर्तमान को ही ठीक तरीके से स्वस्थ नहीं रखेंगे तो भविष्य तो निश्चित ही खतरे में पड़ेगा ही।

आज जरुरत हमारी पृथ्वी के पर्यावरण को स्वस्थ बनाये रखने की है। चलो अपने पर्यावरण के लिए नहीं तो कम से कम अपने लिए तो ऐसा करते हैं। क्योंकि अगर प्रकर्ति ही नहीं बची तो हम भी नहीं जी पाएंगे। चिंता का विषय है कि खुद मनुष्य पृथ्वी के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है। भारत जैसे देश में जहाँ नदियाँ बारह महीने बहती रहती थीं। जगह-जगह पानी के स्त्रोत रहते थे। आज ये हालत किस वजह से बने हैं। इसके पीछे एक मुख्य कारण सही तरीके से प्रकृति का संरक्षण न कर पाना ही तो है। जब मनुष्य प्रकृति का संरक्षण नहीं कर पा रहा तो प्रकृति भी अपना गुस्सा कई प्राक्रतिक आपदाओं के रूप में दिखा रही है। इसलिए अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो बार बार मिलने वाली चेतावनियों को समझें और इसे अमल में जरूर लाएं।

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