अच्छा ! तो ये वजह है, प्याज-लहसुन न खाने की

हमारे भारत में अनेकों तरह की डिसेज बनती हैं. लोग उन्हें खाते हैं, खिलाते हैं. ऐसे में हमारे यहां बड़े-बड़े भंडारे रखे जाते हैं. जहां लोगों को निमंत्रण दिया जाता है. अनेकों तरह के पकवान बनते हैं. लोगों को खिलाते हैं. लेकिन जब कभी धार्मिक भंडारे की बात होती है तो हमारे यहां सब्जी बनाने में सबसे किफायती प्याज-लहसुन को दरकिनार कर दिया जाता है. अनेकों और भी घर हैं जहां प्याज और लहसुन पूरी तरह बैन हैं.

न तो इसे घरों में बनाया जाता है न ही खाया जाता है. लेकिन क्या आपको मालूम है क्यो?

गुणों की खान प्याज-लहसुन को लेकर पुरानी कई मान्यताऐं हैं. जिनके चलते लोग प्याज-लहसुन को पवित्र नहीं मानते हैं. ऐसे में पौराणिक कथाऐं ही हैं जो प्याज-लहसुन को अनेकों घरों से दूर रखती हैं.

ऐसा कहा जाता है कि, जिस समय देवता और असुरों में युद्ध हुआ था. और समुंद्र मंथन हुआ था. उस समय समुंद्र से अनेकों चीजें निकली थी. जिसमें अमृत-विष भी था. विष तो भगवान शंकर ने पी लिया था. लेकिन अमृत को लेकर छीना-झपटी मच गई थी. यही वजह थी कि, भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप लेकर देवताओं को अमृत पिलाने का काम शुरू किया. ऐसे में राहु-केतु ने अपनी पंक्तियां बदल ली और देवताओं की कतार में शामिल हो गए.

प्याज-लहसुन की उत्पत्ति

प्याज-लहसुन

ऐसे में पंक्ति में शामिल राहु को मोहिनी यानि की भगवान विष्णु भी पहचान न सके. और उसे भी उन्होंने अमृतपान करवा दिया. हालांकि सूर्य और चंद्र देव ने उसे पहचान लिया और इसके बारे में मोहिनी को उन्होंने बता दिया. जिससे गुस्साए भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र निकाल, राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया.

जिसके चलते, सिर में से उसके रक्त के बूंदे के साथ अमृत की कुछ बूंदे भी जमीन पर गिरीं और प्याज लहसुन की उत्पत्ति हो गई.

राक्षसीगुण युक्त होता है प्याज-लहसुन

प्याज-लहसुन
प्याज-लहसुन

ऐसा भी कहा जाता है कि, चूंकि प्याज-लहसुन की उत्पत्ति राक्षस के खून और अमृत की बूंदो से हुई है तो, ये रोगनाशक व जीवनदायिनी है. हालांकि इसमें राक्षसी रक्त के समावेश से ये राक्षसी है. जिसमें उत्तेजना है, क्रोध है, अशांति व पाप है, यही वजह है कि, धार्मिक कार्यक्रमों में और कई घरों में प्याज-लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता.

आयुर्वेद में प्याज-लहसुन की स्थिति

हमारे आयुर्वे में खाद्य पदार्थों को तीन श्रेणियों में रखा गया है. ‘सात्विक, राजसिक और तामसिक.’

जिन्हें मानसिक स्थितियों के तौर पर रखा गया है.

सात्विक यानि की शांति, संयम, पवित्रता युक्त गुण

राजसिक यानि की जुनून और खुशी जैसे गुण

तामसिक यानि की अंहकार, विनाश व क्रोध, जुनून युक्त गुण

ऐसे में प्याज-लहसुन व अन्य ऐलीएशस यानि की (लशुनी) पौधों को राजसिक और तामसिक श्रेणी में रखा गया है. ऐसे में प्याज-लहसुन हमारे अंदर जुनून बढ़ाते हैं अज्ञानता बढ़ाता हैं. जबकि हिंदू धर्म में हत्या निषेध है. चाहे वो रोगाणुओं की ही क्यों न हो.

अब प्याज-लहसुन जमीन के अंदर पैदा होने वाले खाद्य पदार्थ हैं. यही वजह है कि, आर्युवेद में भी प्याज-लहसुन को खाने में पहली श्रेणी में जगह नहीं दी जाती. क्योंकि ये जमीन के अंदर उगते हैं. जिससे जिससे उनमें सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं. जिनकी समुचित सफाई नहीं की जा सकती. ऐसे में आप ये भी सोच सकते हैं कि, अगर ऐसा है तो आलू, मूली और गाजर लोग क्यों इस्तेमाल करते हैं. इसके बारे में हम कभी बाद में आपको बताएंगे.

तब तक आप ये जान लें कि, इसके अलावा एक और धारणा है जो प्याज-लहसुन को धार्मिक कामों से व अनेकों घरों से दूर रखती है.

प्याज-लहसुन में चक्र शंख का दिखना
प्याज-लहसुन
प्याज-लहसुन

अगर आपने कभी प्याज-लहसुन काटा और छीला हो तो, प्याज को जब हम चाकू से बीचों बीच काटते हैं तो उसमें हमें भगवान विष्णु के चक्र की आकृति नज़र आती है.

जबकि लहसुन की आकृति शंख की तरह होती है. ऐसे में ये मान्यता है कि, धार्मिक कार्यक्रमों में घरों में इनका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि शंख व चक्र दोनों ही पूज्यनिय हैं. जोकि हम खा नहीं सकते.

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