Tuma Craft : जहां घर सजाने के लिए ऊगाई जा रही है लौकी

‘लौकी की सब्जी’…. गांव के गार्डन से लेकर शहरी मकानों के छत तक इसकी लताएं फैली हुई हैं। इन लताओं में एक बड़ा सा फल निकलता है एकदम ग्रीन कलर का जिससे बनने वाली सब्जी को हम और आप लौकी की सब्जी कहते हें। अगर लौकी की सब्जी को लेकर पसंद और न पसंद वाली वोटिंग करा दी जाए तो नापसंद करने वाले लोगों का पलड़ा भारी रहेगा। हां लेकिन अगर इसी लौकी के साथ दूध या चना मिला दिया जाए तो शायद इसे पसंद करने वालों के नंबरों में कुछ इजाफा हो जाएगा। वैसे अगर आप गांव वाले इलाकों से आते है तो आपको आमतौर पर सुबह में झमड़ों या छप्परों पर एक आद लौकी तो देखने को मिल ही जाएगी।

लौकी के दो काम ही आमतौर पर देखने को मिलते हैं या तो सब्जी के लिए या फिर इसके खुद के बीजों के लिए। उसके अलावा शायद ही कोई काम आपको या हमें आज तक पता होगा। वैसे लौकी गांवों में एक और काम में आती है, और वो है मुफ्त में बांटने के काम में। गांवों में आपको शायद ही कोई सब्जी इसके मुकाबले वाली मिले जो मुफ्त में बांटी जाती है। वैसे कभी-कभी इसे लेकर झगड़े भी होते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कतरत की कलाकारी के परिणाम स्वरूप पैदा हुई लौकी इंसानों की कलाकारी के भी काम आ सकती है। शायद नहीं सोचा होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी ईलाकों में लौकियों की शानदार कलाकारी देखने को मिलती है। आदिवासियों की इस कला को ‘तुमा क्राफ्ट’ के नाम से जाना जाता है। ये क्राफ्ट आमतौर पर छत्तीसगढ़ के बस्तर में ज्यादातर देखने को मिलता है। अगर हम बस्तर को ‘तुमा क्राफ्ट’ की राजधानी कहे तो इसमें कोई गलत बात नहीं होगी।

Tuma Craft

क्या है Tuma Craft और ये कैसे बनता हैं

तुमा क्राफ्ट एक अलग तरह की कलाकारी है जो भारत में कई सालों से पारंपरिक तरीके से चली आ रही है। ऐसा बताया जाता है कि, यह कला बस्तर के इलाकों में आदिवासियों में पीढ़ियों से ट्रांसफर होती आ रही है। और आज भी जारी है। इस कला का सबसे अहम हिस्सा होता है लौकी, जिसे पहले तो तोड़ के रख लिया जाता है फिर इसे धूप में सुखाया जाता है। सुखाने की यह प्रक्रिया बहुत लंबी होती है।

कभी—कभी 6 महीनों के लिए भी यह प्रक्रिया चलती रहती है। इसके कारण लौकी ब्राउन कलर की हो जाती है। कुछ लौकियां ज्यादा गहरे रंग की हो जाती है ऐसा होना उसके पुराने होने पर डिपेंड करता है। इसके बाद इस सूखी हुई लौकी को मिट्टी से धोया जाता है। यह एक तरह से इसके लिए स्क्रबर की तरह काम करता है। इसके बाद इन्हें एक बार फिर से सूरज की धूप में सुखाया जाता है और फिर पानी में 5 से 6 घंटों के लिए रख दिया जाता है। जिससे इसका ऊपरी हिस्सा लूज़ हो जाता है और उसे चाकू के सहारे अलग कर लिया जाता है। 

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फिर लौकी के पीछे के हिस्से को गर्म लोहे के चाकू का उपयोग करके काटा जाता है और अंदर की सामग्री को हटा दिया जाता है, जिससे यह पूरी तरह से खोखला हो जाता है। फिर इसपर अपनी चाहत अनुसार पेंसिंल से डिजाइन का स्केच उकेर लिया जाता है और एक गर्म चाकू से फिर उसे उसी तरह से बना लिया जाता है। इससे लौकी की सतह जलती है और पैटर्न स्थायी बन जाता है। अगर लौकी से कटोरा या खाने के बर्तन जैसी कोई चीज बनाई जानी हो तो इसके लिए पहले लौकी की कड़वाहट को दूर करने के लिए इसे उबाला जाता है। अंत में, लौकी को वार्निश किया जाता है।

Tuma Craft में फेमस कौन हैं ये भी जान लीजिए

इस क्राफ्ट को करने वाले सबसे फेमस कलाकारों में एक कलाकार का नाम सबसे ऊपर आता है जिनका नाम जगत राम देवांगन है। वे कोण्डागांव के रहने वाले हैं। उन्हें इस कला का सबसे इनोवेटिव कलाकार माना जाता है। इतना ही नहीं, ये इस इलाके के एक मात्र तुमा कलाकार हैं। देवांगन ने इस काम में कई तरह की स्टाइल्स को लेकर काम किया, उन्होंने इसके फार्म और स्टाइल के ऊपर भी काम किया। इसी दौरान जिस इंट्रेस्टिंग शेप्स और नक़्क़ाशियों को उन्होंने जन्म दिया उसे ही तुमा क्राफ्ट कहा गया। पहले गांवों में बेकार लौकी का यूज इस काम के लिए होता था लेकिन अब तुमा क्राफ्ट के लिए ही लौकी ऊगाई जाने लगी है।

Tuma Craft

वहीं कर्नाटक के मैसूर की रहने वाली सीमा प्रसाद भी इस क्राफ्ट को उसकी पहचान दिला रही हैं। हालांकि सीमा ने इस क्राफ्ट को पहली बार इंडिया से बाहर देखा था, लेकिन जब उन्होंने इसको लेकर काम शुरू किया तो उन्हें भारत के तुमा क्राफ्ट के बारे में पता चला और उन्होंने इसे अपनी संस्था से जोड़ा। 2018 में सीमा ने अपने पति संग मिलकर ‘कृषिकला’ नाम के एक एनजीओ की नींव रखी। यह संगठन न सिर्फ इस कला से लोगों का परिचय करवा रहा है बल्कि किसानों के लिए एक बाज़ार भी तैयार करने का काम कर रहा है। साथ ही, वे ग्रामीण महिलाओं और बेरोजगार लोगों को यह कला सिखाकर उन्हें रोज़गार के नए विकल्प भी दे रहीं हैं।

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पहले जहां लौकी से सिर्फ शोपीस बनाए जा रहे थे वहीं आज इससे कई यूजेबल प्रोडक्ट जैसे कि, पेन होल्डर, टिश्यू होल्डर, की-चैन, डॉल्स, प्लांटर्स, डोर हैंगिंग, वॉल हैंगिंग आदि भी बनाए जाने लगे हैं। 2018 में दिल्ली वर्ल्ड ऑर्गेनिक कांग्रेस के स्टेज पर भी इस क्राफ्ट का जलवा देखने को मिला था। यहाँ की सजावट के लिए इस साल लौकी के हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया गया था। वहीं इस दौरान कृषिकला ने अपने स्टॉल से इसके प्रोडक्टस अच्छी संख्या में बेंचे थे।

आज यह कला देश-विदेश में भारत की एक अनोखी पारंपरिक धरोहर के रंग को बिखेर रही है। वहीं साथ ही साथ यह कई प्लास्टिक की चीजों का रिप्लेसमेंट बन गई है जिससे इकोसिस्टम को भी मदद मिल रही है।

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