1967 का भारत – चीन युद्ध : जब भारतीय सैनिकों ने चीनियों की ‘नाक से खून’ निकाल दिया था

भारत चीन के बीच बढ़ता तनाव अब एक नया रूप ले चुका है। पिछले 45 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है जब इस सीमा पर दोनों तरफ के जवान शहीद हुए हैं। 15/16 जून को लद्दाक के गालियां वैली में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच जो खूनी संघर्ष हुआ उसके कारण दोनों देशों के बीच के रिश्ते भारी तनाव में हैं। भारत सरकार ने बताया है कि, उसने इस संघर्ष में अपने 20 जवान खोए हैं वहीं चीन के 43 से ज्यादा सैनिकों के मारे जाने और घायल होने की खबर है, वहीं यूएस इंटेलिजेंस की मानें तो ये संख्या 35 है। लेकिन चीन की सरकार ये जानकारी नहीं दे रही। वहीं इस संघर्ष में जहां गलती चीन की थी। वहीं वो हेकड़ी दिखाने से भी बाज नहीं आ रहा है। उसने इस पूरे मामले को भारत पर मड़ दिया है। लेकिन भारत ने भी उसे उसके ही शब्दों में जवाब दिया है।

चीन और भारत के बीच जब भी जंग की बात होती है तो बात सबसे पहले बात 1962 की होती है। चीन हमेशा से इस इस जंग को लेकर भारत को आंख दिखता है और भारत को 1962 याद दिलाने की कोशिश करता है। इस जंग में भारत की हार हुई थी। लेकिन क्या भारत चीन के बीच हुई जंग में भारत हमेशा हारा है? जवाब है नहीं। भारत और चीनी सेनाएं 1962 के बाद दो बार आमने सामने हुई और इसमें भारतीय सेना ने चीनी सेना को उसकी औकात बता दी। इसी में से एक टकराव 1962 के 5 साल बाद 1967 में सिक्किम के नाथुला में हुई। इस जंग में भारत के 65 जवान शहीद हुए वहीं 300 चीनी सैनिक मारे गए। आइए आपको भारतीय सैनिकों के इस पराक्रम की गाथा से अवगत कराते हैं।

चीन ने शुरू की 1967 की जंग

1962 की जंग के बाद दोनों देशों ने अपने-अपने राजदूत वापस बुला लिए थे, लेकिन दोनों तरफ एक मिशन काम कर रहा था। चीन ने इसी मिशन के दो भारतीयों पर भारत के लिए जासूसी करने का आरोप लगाते हुए भारतीय दूतावासों को घेर लिया। इसके जवाब में भारत ने भी दिल्ली के चीनी दूतावास के साथ भी ऐसा ही किया। ये 3 जुलाई 1967 की बात है।

चीन ने एक और अजीबों-गरीब आरोप भारत पर लगाया। चीन का आरोप था कि, भारतीय सैनिक चीनी भेड़ों के झुंड को हांक कर भारत ले गए। चीन के इस आरोप पर उस समय विपक्ष के नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी  इसके विरोध स्वरूप भेड़ों का झुंड लेकर दिल्ली के चीनी दूतावास में घुस गए।

इस लड़ाई की एक पटकथा 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध से भी जुड़ी है। जब भारत इस युद्ध में भारी पड़ने लगा तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान गुप्त रूप से चीन गए और चीन से भारत पर सैनिक दबाव बनाने को कहा। इसके बाद चीन ने भारत को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि, वो सिक्किम का नाथुला और जेलेप ला पोस्ट खाली कर दे। इस समय भारत की मुख्य सुरक्षा लाइन छंगू पर थी। कोर मुख्यालय से जनरल सगत सिंह को आदेश मिला कि वो ये चौकियां खाली कर दें, लेकिन उन्होंने ये कहते हुए मना कर दिया कि, नाथुला का फैसला उन्हें करना है, ये जगह ऊंचाई पर है और अगर हमने ये जगह छोड़ी तो चीन इस जगह पर कब्जा कर लेगा।

इस बीच जेलेप ला पोस्ट खाली हो गया और चीनी सेना ने आगे बढ़कर उसपर कब्जा कर लिया। ये चौकी आज तक चीन के नियंत्रण में है. इसके बाद चीनियों ने 17 असम रायफ़ल की एक बटालियन पर घात लगाकर हमला कर दिया, जिसमें उसके दो सैनिक मारे गए. सगत सिंह इस पर बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वो मौक़ा आने पर इसका बदला लेंगे।

भारतीय सेना के बीच धक्का – मुक्की

इंडियन डिफेंस रिव्यू के 22 सितंबर 2014 के एक में इस बात का जिक्र करते हुए मेजर जनरल शेरू थलियाल लिखते हैं कि सुबह की शुरूवात भारतीय और चीनी सेना की गश्त से होती थी और इस दौरान दोनों के बीच कहासुनी होती थी। ये तू – तू मै-मै 6 सितंबर को धक्का मुक्की में बदल गई। भारतीय सेना के जवानों ने इसमें चीनी सेना के राजनीतिक कमिसार को धक्का देकर गिरा दिया जिससे उसका चश्मा टूट गया।

इस घटना के बाद दोनों तरफ तनाव बढ़ गया। सीमा पर तनाव कम करने के लिए भारतीय सेना ने सीमा पर नाथुला से सेबू ला तक डीमार्केट तार की एक बाड़ लगाएंगे। 11 सितंबर की सुबह ये काम 70 फील्ड कंपनी के इंजीनियर्स और राजपूत जवानों ने ये काम शुरू कर दिया। वहीं सेबुला और 2 ग्रेनेडियर्स से आब्जर्वेशन अर्टिलियरी को स्थिति पर नजर रखने को कहा गया।  जैसे ही काम शुरू हुआ चीनी राजनीतिक कमिसार ने अपने सैनिकों के संग 2 ग्रेनेडियर्स के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह के पास पहुंच कर काम को बंद करने को कहा। राय ने उसकी बात को मना कर दिया और काम जारी रखा। इसके बाद अचानक कामिसार के वापस लौटते ही चीनियों ने मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी।

जब भारतीय सेना ने तोपो से चीनियों पर बरसाए गोले

लेफ़्टिनेट कर्नल राय सिंह को जनरल सगत सिंह ने आगाह किया था कि वो बंकर में ही रहकर तार लगवाने पर निगरानी रखें, लेकिन अपने सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने के लिए वे  खुले में ही खड़े होकर ये काम करवा रहे थे। 7 बजकर 45 मिनट पर अचानक एक सीटी बजी और चीनियों ने हमला कर दिया। राय सिंह को तीन गोलियां लगीं। इतने में तेजी से उनके मेडिकल अफ़सर उन्हें खींचकर सुरक्षित जगह पर ले गए।

जनरल वी के सिंह अपनी किताब में लिखते हैं कि, जैसे ही ग्रेनेडियर्स ने अपने सीओ राय सिंह को गिरते हुए देखा, वो गुस्से से पागल हो गए। सैनिक अपने बंकरों से बाहर निकले और चीनियों पर टूट पड़े। उन्होंने कैप्टन पी.एस. डागर के नेतृत्व में चीनी ठिकानों पर हमला बोल दिया, इस एक्शन में  कैप्टन डागर और मेजर हरभजन सिंह दोनों शहीद हो गए। इसके बाद तो पूरे स्तर पर लड़ाई शुरू हो गई जो तीन दिन तक चली।

चीनी सैनिकों की गोलीबारी में बाहर खड़े और काम कर रहे भारतीय सैनिक शहीद हो गए। ये नुकसान इस लिए भी अधिक था क्यूं कि भारतीय सैनिक बाहर थे और उनके पास आड़ लेने के लिए कोई जगह नहीं थी। भारतीय सेना को अपने हताहत सैनिकों की बॉडी उठाने तक का समय नहीं मिला।

चीनियों के असरदार और अंधाधुन फायरिंग को देखते हुए सगत सिंह ने तोप से फ़ायरिंग करने का हुकुम दे दिया। ये बड़ा फैसला था क्योंकि उस समय तोप से फायरिंग करने का  हुक्म केवल प्रधानमंत्री दे सकते थे। लेकिन जब ऊपर से कोई हुक्म नहीं मिला और चीनी दबाव बढ़ा तो सगत सिंह ने तोपों से फ़ायर खुलवा दिए। इससे चीन को बहुत नुकसान हुआ और उनके 300 से अधिक सैनिक मारे गए।

मध्यम दूरी की तोपों से चीनी ठिकानों पर ज़बरदस्त गोलाबारी शुरू हुई। भारतीय सैनिक ऊँचाई पर थे और उन्हें चीनी ठिकाने साफ़ नज़र आ रहे थे, इसलिए उनके गोले निशाने पर गिर रहे थे।

भारतीय सैनिकों

भारतीय सैनिकों के अंदर से 1962 का डर खत्म

तीन दिनों की इस लड़ाई के बाद युद्ध विराम हो गया। चीन ने आरोप लगाया कि भारतीय सेना उनके इलाके में घुसी थी। ये एक लिहाज से सही इसलिए था क्योंकि भारतीय सेना के जवान चीनियों की फायरिंग का जवाब देते हुए चीनी सीमा में घुस गए थे और वहीं लड़ते हुए शहीद हो गए थे। भारतीय सेना का ये काम उच्च अधिकारियों को पसंद नहीं आया और इसी कारण जनरल सुगत सिंह का तबादला हो गया। लेकिन इस लड़ाई में मिली जीत से भारतीय सेना को सबसे बड़ा मानसिक बल मिला।

1962 के बाद जिन चीनियों से मुकाबला करना भारी माना जाता था और उन्हें सुपरमैन जैसा माना जाता था 5 साल बाद ये सारे मन के वहम दूर हो गए। भारतीय सैनिकों को पता लग गया था कि वे चीनियों को मार सकते हैं और मारा भी। किसी विश्लेषक ने इस लड़ाई के बाद चीन पर एक टिप्पणी करते हुए कहा था “This Was the First Time, the chinese had got a bloody nose”.

भारत के कड़े प्रतिरोध का असर इतना हुआ कि, चीन ने वायु सेना का इस्तेमाल करने की धमकी दी, लेकिन भारत पर इसका कुछ असर नहीं हुआ। नाथुला के 15 दिनों बाद 1 अक्टूबर 1967 को सिक्किम के चो ला में भारत और चीन के सैनिकों के बीच एक और भिड़ंत हुई, इसमें भी चीन को मुंह की खानी पड़ी। भारतीय सैनिकों ने चीनियों को तीन किलोमीटर अंदर ‘काम बैरेक्स’ तक ढकेल दिया।

सात सितंबर 2018 को नाथुला की इस लड़ाई पर आधारित फिल्म ‘ पलटन ‘ रिलीज हुई थी। जिसमें जैकी श्रॉफ मेजर जनरल सुगत सिंह, रामपाल लेफ्टिनेंट जनरल राय सिंह, सोनू सूद मजोर बिशन सिंह, हर्षवर्धन राणे मेजर हरबजन सिंह, गुरमीत सिंह कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर के किरदार में दिखे थे। 1967 की ये जंग ही थी। जिससे मिले आत्मविश्वास के कारण आज भारतीय सेना चीन को हर मोर्चे पर बराबरी का टक्कर देती है। चीन जब भी 1962 का जिक्र करता है तो भारतीय 1967 की याद दिलाकर ये कहते हैं कि, हमने तो 1967 में ही चीनी भूत को भगा दिया था। आज तो 2020 है, चीन भूल कर भी गलती मा करे, वरना अंजाम बुरा ही होगा।

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