भारतीय हरित क्रांति के मसीहा ‘एम एस स्वामीनाथन’

जब भी देश में कोई किसान नेता या किसानों का समूह आंदोलन की बात करते हैं तो, उनकी मांग होती है. स्वामिनाथन कमेटी की रिपोर्ट को किसानों की खातिर लागू किया जाए. ऐसे में अनेकों बार अब तक इस मांग को लेकर किसान आंदोलन कर चुके हैं. सड़कों पर उतर चुके हैं. लेकिन क्या आपको मालूम है स्वामीनाथ रिपोर्ट आखिर है क्या. या इसे कब बनाया गया.

हमने अपने पिछले लेख में हरित क्रांति के जनक नॉर्मन बोरलॉग के बारे में जानकारी दी थी. चलिए आज हम आपको स्वामीनाथन रिपोर्ट तैयार करने वाले भारतीय के मशहूर कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन के बारे में आपको बताते हैं.

जिन्हें लोग भारत की हरित क्रांति का जनक कहते हैं.

ऐसे में जहां पिछले लेख में हमने बताया था की कैसे बोरलॉग ने मैक्सिको में इजाद की गेहूं की बीजों के चलते मैक्सिको को गेहूं का निर्यातक बना दिया था. वहीं भारत में ये एक ऐसा दौर था. जिस समय भारत में एक ओर जनसंख्या बढ़ रही थी. दूसरी ओर भारत में अकाल यानि की सूखा पड़ा था. यही वजह थी कि, एम एस स्वामीनाथन ने सबसे पहले मैक्सिको में रह रहे नॉर्मन बोरलॉग से बात की थी. ताकि वो अपने यहां विकसित गेहूं की प्रजाति भारत भेजें और उन बीजों से भारत में मैक्सिको जैसी क्रांति शुरू की जा सके.

इस बीच एम एस स्वामीनाथन (m s swaminathan) ने मैक्सिको से आई बीजों को पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ मिश्रित करके संकर प्रजाति विकसित की थी. जिसने कुछ ही सालों में भारत में गेहूं किसानों की तकदीर ही बदलकर रख दी. ऐसे में भारतीय किसानों के खेतों में बोई गई इन किस्मों ने आने वाले महज़ 25 सालों में भारत को दुनिया में खाद्यान्न की सर्वाधिक कमी वाले देश के कलंक से निकाल कर आत्मनिर्भर भारत में शामिल कर दिया.

एम एस स्वामीनाथन

m s swaminathan

भारत के महान कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन (m s swaminathan) का जन्म 7 अगस्त 1925 में कुंभकोणम में हुआ था. महज़ 10 साल की ही उम्र में स्वामीनाथन ने अपने पिता को खो दिया. हालांकि अपनी पढ़ाई पर उन्होंने कभी कोई आंच नहीं आने दी. यही वजह रही कि, साल 1944 में उन्होंने त्रावणकोर विश्वविद्यालय से बी.एस.सी की डिग्री हासिल की. उसके तीन साल बाद 1947 कोयमंबूटर कृषि कॉलेज से कृषि के क्षेत्र में बी.एस. सी की डिग्री हासिल की.

ऐसे में जहां एक ओर हमारा देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. उस समय भी हमारे यहां लोगों का मुख्य आय और पेट भरने का जरिया खेती ही थी. उसके बावजूद भी उन दिनों में हमारे भारत में सूखे की समस्या सबसे बड़ी समस्याओं में से एक थी. साथ ही, अंग्रेजों के शासन काल में किसानों को लगान देना पड़ता था. जिससे किसानों की स्थिति दयनिय बनी रहती थी.

इसी तरह साल 1943 में जिस समय बंगाल में भयानक सूखा पड़ा था. जहां एक ओर लोग भूख की वजह से दम तोड़ रहे थे. वहीं अंग्रेज भारत का उगाया अन्न अपने देश भेज रहे थे. ऐसे में लगभग 3 लाख लोग बंगाल में भुखमरी की वजह से मारे गए थे. जिसको देखकर एम एस स्वामीनाथन (m s swaminathan) ने किसानों की खातिर कुछ करने का उद्देश्य बनाया था. और 1944 में बी.एस.सी करने के बाद 1947 में कृषि से बी. एस.सी की थी. ताकि किसानों की खातिर कुछ बदला जा सके.

ऐसे में एम एस स्वामीनाथन (m s swaminathan) ने 1952 में कैंब्रीज स्थित कृषि स्कूल में पी एच डी करते हुए आलू पर शोध किया. और डिग्री हासिल करने के बाद मद्रास के एग्रीकल्चर कॉलेज में एक बार फिर दाखिला लिया. जहाँ उन्होंने बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री हासिल की. इस बीच उन्होंने निदरलैंड के विश्वविद्यालय में जेनेटिक्स विभाग के यूनेस्को फैलो के रूप में लगभग तीन साल काम किए. इसके बाद अमेरिकी में मौजूद विस्कोसिन विश्वविद्यालय के जेनेटिक्स विभाग में रिसर्च असोसीयेट के तौर पर काम किया.

इन सभी छोटी छोटी नौकरियों से उकता चुके स्वामीनाथन ने अंतर्राष्ट्रीय संस्थान में चावल पर भी शोध किया था. जिसमें उन्होंने जापान और भारत के चावलों की प्रजातियों पर काम किया था. ऐसे में 1965 का दौर आया. जब स्वामीनाथन भारत में थे, उस समय उन्हें कोशा स्थित संस्थान में गेहूं पर शोध करने का दायित्व दिया गया. एक ओर भारत अकाल, सूखा यहां तक की चीन से दो दो हाथ कर रहा था. जिसमें भारत को बुरी तरह मात मिली थी. ऐसे में खाने की भी पूरे देश में कमी पैदा हो गयी थी. 

ऐसे में उन्होंने ही सबसे पहले मैक्सिको में चल रहे गेहूं की नई किस्म को भारत लाने की बात बोरलॉग से कि, साथ ही उन्हें भारत आने का आमंत्रण भी दिया. एक ओर बोरलॉग की इजाद गेहूं की किस्में जहां मैक्सिको की तकदीर बदल चुकी थी. वहीं भारत में गेहूं की पैदावार बढ़ाने की खातिर बोरलॉग ने जो गेहूं की किस्में भारत भेजी. उन पर रिसर्च करते हुए स्वामीनाथन ने पंजाब के गेहूं की किस्मों को मिलाकर संकर प्रजाति तैयार की.

m s swaminathan

जिसके चलते एम एस स्वामीनाथन (m s swaminathan) को पूसा संस्थान का निदेशक बनाया गया. एम एस स्वामीनाथन 1965 से 1971 तक पूसा संस्थान के निदेशक रहे. इस बीच उन्होंने भारत में गेहूं की उपज और चावल की उपज को बढ़ाने की खातिर संकर प्रजाति की किस्मों पर रिसर्च किया.

इस बीच उनके काम को देखते हुए साल 1979 में योजना आयोग का सदस्य बनाया गया. और चार साल के अंदर यानि की 1983 में स्वामीनाथन को अंर्तराष्ट्रीय संस्थान मनिला का महानिदेशक बना दिया गया. जहाँ उन्होंने 1988 तक काम किया.

ऐसे में अपने बेहतरीन कार्य के चलते जहाँ एक समय तक भारत गेहूं दूसरे देशों से मंगाता था. इनकी बादौलत भारत आत्मनिर्भर बन गया. ऐसे में जहाँ एक ओर भारत कृषि क्रांति आंदोलन में अन्य देशों की तुलना में बेहतर बनने लगा. वहीं स्वामीनाथन का नाम पूरी दुनिया में कृषि वैज्ञानिक नेता के रूप में छा गया.

स्वामीनाथन का दुनिया करती थी सम्मान

m s swaminathan

जिसके चलते उन्हें भारत सरकाल ने विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में 1967 में पद्म श्री, 1972 में पद्म भूषण और 1989 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया. ऐसे में अनेकों ऐसे देश थे. जिन्होंने एम एस स्वामीनाथन को अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया.

स्वामीनाथन को साल 1971 में रेमन मैगसेसे पुरस्कार, 1986 में अल्बर्ट आइंस्टीन वर्ल्ड साइंस अवॉर्ड, 1987 में पहला वर्ल्ड फूड प्राइज़, 2000 में प्राइज़ ऑफ यूनेस्को, 2007 में लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अवॉर्ड…इसके अलावा देश के अनेकों यूनिवर्सिटीस ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया.

इतना ही नहीं इंग्लैड, बांग्लादेश, चीन, इटली, स्वीडन, अमेरिका व सोवियत संघ की राष्ट्रीय विज्ञान अकादियों में भी उन्हें शामिल किया गया. इसके अलावा स्वामीनाथन वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज के संस्थापकों में से एक थे. यही वजह रही कि, 1999 में टाइन पत्रिका ने स्वामीनाथन को 20वीं सदी के 20 सबसे प्रभावशाली एशियाई में से एक माना था..  

इन्होंने ही स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट तैयार की थी. जिसे लेकर किसान हर आंदोलन में मांग करते हैं कि, इसे किसानों की खातिर लागू किया जाए.

आखिर क्या है स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट इसके बारे में किसी और दिन बताएगें. जब तक आपको हमारा ये लेख कैसा लगा हमें कमेंट कर जरूर बताएं.

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

नक्सल प्रभावित इलाकों में आठ साल से काम कर रही Doctor Didi, रोज चलती हैं मीलों

Wed May 12 , 2021
Share on Facebook Tweet it Pin it Email कहते हैं, अगर आपको अपना कद बढ़ाना है तो अपने लिए जीना छोड़कर सबके लिए जीना पड़ेगा. तभी आपको लोग अपना मसीहा कहेंगे. नर्स दिवस (nurses day) के मौके पर आज हम आपको छत्तीसगढ़ की एक ऐसा महिला नर्स के बारे में […]
Doctor Didi