एक चपरासी के बनाए ‘फेविकोल’ ने कैसे दी पूरे भारत में जोड़ की गारंटी, पढ़े पूरी दास्तां

सफलता कहीं जमीन में दफ्न नहीं होती. ऐसा भी नहीं होता कि, पलभर में आप सफलता के मुकाम को पा लें. जब कभी हम कुछ अलग करने की कोशिश करते हैं तो, हमें हज़ारों दुश्वारियां रोकती हैं. कई बार ऐसा होता है कि, परिस्थितियां हमारे विपरीत होती हैं. लेकिन इन सबसे लड़कर आगे बढ़ने वाला इंसान ही एक न एक दिन सफलता की इबारत लिखता है. एक ऐसी ही कहानी बलवंत पारेख (Balvant Parekh) की है. बलवंत पारेख एक ऐसा नाम जिनका नाम भले ही. आज भारत के लोग न जानते हों लेकिन उनका बनाया प्रोडक्ट आज हर एक भारतवासी जानता है.

जिस समय भारत में टेलीविजन का दौर शुरू हो रहा था. हर घर में टेलीविजन पहुंच रहा था. उस वक्त हमारे टेलीविजन पर हमने एड का एक दौर देखा था. उन्हीं एड में हमने फेविकोल के जोड़ पर बने अनेकों प्रचार अपने टेलीविजन पर देखा होगा. जिसमें हमने फेविकोल का जोड़. Fevicol- वही जोड़ पानी में भी. अनेकों प्रचार देखे.

हाल ही में टीवी पर शर्माइन का सोफ़ा एड Fevicol का सबसे चर्चित एड बना था. जोकि शर्माइन अपने ससुराल लेकर जाती है. उसके बाद वही सोफ़ा मिश्राइन का मिला. उसके बाद फिर कलक्ट्राइन का हुआ और फिर वही सोफा बंगालन का हो गया. यानि की 60 साल तक एक ही सोफ़ा पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा. फेविकोल का जोड़ होने की वजह से, उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा. आज हकीकत भी यही है. भले ही हमने सालों साल हर काम को करने के अनेकों विकल्प खोज लिए. लेकिन आज भी फेविकोल का विकल्प हमें नहीं मिल सका है. इसकी वजह है फेविकोल का जोड़, फेविकोल की मजबूती.

चलिए अब हम आपको बतातें हैं कि, आखिर फेविकोल का यह सफर कैसे यहां तक पहुंचा.

एक चपरासी बन गया ‘Fevicol Men’

Balvant Parekh

फेविकोल को बनाने वाली कंपनी का नाम है पिडिलाइट कंपनी. जिसे बलवंत पारेख ने शुरू की थी. आज यह कंपनी फेविकोल के अलावा एम-सील, फेवि क्विक साथ ही डॉ फिक्सइड जैसे प्रोडक्ट तैयार करती है. लेकिन जो सफलता दशकों पहले पिडिलाइट कंपनी को फेविकोल से मिली. आज भी ठीक उसी तरह ही बरकरार है.

बलवंत पारेख (Balvant Parekh) का जन्म साल 1925 में गुजरात के भावनगर जिले के महुवा नामक जगह पर हुआ था. एक सामान्य परिवार में जन्मे बलवंत पारेख कि, प्राथमिक शिक्षा उन्हीं के कस्बे में शुरू हुई. शुरुवात से ही बलवंत पारेख चाहते थे कि, बड़ा होकर वो एक बिजनेस मैन बने. हालांकि उनका परिवार चाहता था कि, वो पढ़ लिखकर एक वकील बनें. यही वजह रही कि, बलवंत पारेख को अपने परिवार की चाहतों के आगे झुकना पड़ा. प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद वकालत की पढ़ाई के लिए वो मुंबई आ गए. जहां उन्होंने सरकारी लॉ कालेज में दाखिला लिया और अपनी आगे की पढ़ाई शुरू की.

इसके उलट गुलामी की जंजीरों में लिपटे भारत में, यह एक ऐसा दौर था. जिस समय महात्मा गांधी के विचारों का रंग लोगों पर चढ़ा हुआ था. हर तरफ लोग भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ रहे थे. अनेकों युवा अपने भविष्य की कुर्बानी देते हुए देश को आजाद कराने की दिशा में काम कर रहे थे. उन्हीं युवाओं में से एक युवा थे “Balvant Parekh”. जिन्होंने इस आंदोलन में अपना योगदान देने के खातिर अपनी पढ़ाई छोड़ दी. फिर बाद में अपने गृहनगर आ गए. जहाँ उन्होंने अनेकों आंदोलनों में हिस्सा लिया. हालांकि लगभग एक साल बीत जाने के बाद बलवंत ने एक बार फिर से पढ़ाई शुरू की और वकालत की डिग्री पूरी की.

वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद, जब बात लॉ प्रेक्टिस की आई तो, बलवंत पारेख ने मना कर दिया. जिसकी वजह ये थी कि, वो कभी वकील नहीं बनना चाहते थे. इसके साथ ही महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित पारेख मानते थे कि, सत्य को हमेशा आगे रखना चाहिए. उनकी नज़र में अहिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी. जबकि वकील के पेशे में झूठ का धंधा चलता है. यही वजह रही कि, वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उन्होंने कभी लॉ प्रेक्टिस तक नहीं की.

हालांकि मुंबई जैसे शहर में रहने के दौरान जीवनयापन करने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही थी. यह वो दौर था. जिस समय उनकी शादी भी हो गई थी. अपना और अपनी पत्नी का पेट भरने के लिए बलवंत पारेख पर काफी जिम्मेदारियां आ गई थी. जिसके चलते उन्होंने एक डाइंग और प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी की शुरुवात की. लेकिन यह काम उनके कभी मन को नहीं भाया. जिसकी एक वजह यह थी कि, पारेख हमेशा से चाहते थे की वो अपना खुद का बिजनेस शुरू करें. हालांकि उनकी पारिवारिक स्थितियां और परिस्थितियां इसकी इज़ाजत नहीं दे रही थीं.

इस दौरान उन्होंने वहां से नौकरी छोड़कर एक लकड़ी व्यापारी के यहां चपरासी की नौकरी की शुरूवात की. जहां उन्हें कार्यालय के ही गोदाम में रहना पड़ता था. इस दौरान उनकी पत्नी हमेशा उनके साथ रही. चपरासी के नौकरी के बाद Balvant Parekh ने अनेकों नौकरियां की. इन सभी जगह पर काम करते हुए उन्हें अनेकों लोगों से मिलने का मौका मिला. यही वजह रही कि, पारेख को अपने संपर्कों की वजह से ही जर्मनी जाने का भी मौका मिला. जहां उनकी किस्मत ने पलटा मारना शुरू किया. दूसरी ओर बलवंत की मेहनत रंग लाती रही.

देश की आजादी ने बदली बलवंत पारेख की किस्मत

जिस समय बलवंत जर्मनी गए. वहां उन्होंने अपना बिजनेस करने का विचार किया. इस दौरान उन्हें अपने आइडिया पर काम करने के लिए निवेशक भी मिल गए. यही वजह रही कि, उन्होंने पश्चिमी देशों से साइकिल, एक्स्ट्रा नट्स, पेपर और अनेकों चीजों के आयात का बिजनेस शुरू किया. जिसकी बादौलत पारेख के बिजनेस की शुरुआत हुई. साथ ही उनका बुरा वक्त बदलना शुरू हो गया. इस बिजनेस के बादौलत ही उन्होंने किराए के घर से निकलकर अपना फ्लैट ले लिया.

इस दौरान भारत आज़ादी की दहलीज पर था. पारेख की जिंदगी में बड़ा बदलाव भी भारत की आजादी के बाद आया. जिस वक्त आज़ादी के बाद भारत आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. उस समय अनेकों भारतीय व्यवसाइयों ने इस मौके का फायदा उठाते हुए. विदेशों से आने वाले सामान को देश में बनाने की शुरुवात की. जिसने देश की स्थिति ही बदल दी.

Balvant Parekh से ‘फेविकोल मैन’ बनने की कहानी

Balvant Parekh

ठीक यही हुआ बलवंत के साथ भी. आजादी के बाद जब उन्होंने अपना खुद का भारतीय बिजनेस शुरू करने पर विचार किया तो, उन्हें चपरासी वाली नौकरी याद आ गई. क्योंकि उस नौकरी के दौरान उन्होंने देखा कि, दो लकड़ियों को जोड़ने में कितनी मुश्किलें आती थी. कारीगर लकड़ियों को जोड़ने के लिए जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल करते थे. जिसे काफी देर तक गर्म किया जाता था. जिसमें से बदबू आती थी. इस बदबू की वजह से कारीगरों को सांस लेने में भी काफी समस्या होती थी. यहीं से उन्हें अपना पहला आइडिया आया. उन्होंने सोचा क्यों न कोई ऐसा प्रोडक्ट बनाया जाए. जिसमें से बदबू भी न आए. साथ ही उसे इस्तेमाल करने के लिए इतनी मेहनत न करनी पड़ी.

जिस पर रिसर्च करते हुए. पारेख ने जानकारियां जुटानी शुरू की. काफी खोजबीन के बाद उन्हें सिंथेटिक रसायन के प्रयोग के बारे में मालूम चला. जिससे गोंद बनाया जा सके. इसके बाद इस आइडिया के बारे में उन्होंने अपने भाई सुनील पारेख को बताया और आज़ादी के लगभग 12 साल बाद 1959 में पिडिलाइट ब्रांड की स्थापना की. इस कंपनी ने ही देश में Fevicol गोंद बनाने की शुरुवात की. जोकि दूधिया सफेद रंग की और खुशबूदार गोंद थी.

जिस समय फेविकोल भारतीय बाज़ार में आया. लोगों को यह काफी पसंद आया. जिसकी वजह थी कि, भारत में उस समय ऐसा कोई उत्पाद नहीं था. जो फेविकोल की तरह हो. जो किसी भी चीज को जोड़ने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सके. यही वजह रही कि, फेविकोल के बादौलत पिडिलाइट कंपनी ने वो मुकाम छुआ. जहां अनेकों कंपनियां पहुंचने का बेताब हैं.

फेविकोल का नाम जर्मन भाषा से आया

Balvant Parekh

यूँ तो जोड़ने, चिपकाने से लेकर कई शब्द हमारे हिंदी-उर्दू में हैं. हालांकि जर्मनी की सैर करने वाले बलवंत पारेख ने Fevicol का नाम जर्मन भाषा से चुना. जोकि फेवि का अर्थ जर्मनी भाषा में दो चीजों को जोड़ना होता है. जबकि कोल उस समय कि, जर्मन कंपनी मोविकोल से लिया गया था. जोकि जर्मनी में गोंद बनाता था. यहीं से प्रेरित होकर पारेख ने अपने इस प्रोडक्ट का नाम फेविकोल रखा. जिसके बाज़ार में आने के बाद अनेकों लोगों की समस्याओं का हल मिल गया. फेविकोल की सफलता है कि, आज पिडिलाइट फेवि क्विक, एम-सील जैसे औसतन 200 से ज्यादा प्रोडक्ट तैयार करती है.

इन सबसे अलावा 90 के दशक में दूरदर्शन पर अपने विज्ञापनों के जरिए फेविकोल पूरे भारत के जोड़ की गारंटी देने लगा. कोई भी कैसा भी जोड़ क्यों न हो. हर तरफ फेविकोल सबकी पंसद बन गया. यही वजह रही कि, साल  1993 में पिडिलाइट ने अपने शेयर भारतीय बाज़ार में लांच कर दिए. इसके बाद 1997 आते-आते ‘फेविकोल’ भारत के टॉप 15 ब्रांड्स में एक बन गया. आज के समय में कंपनी अपने प्रोडक्ट्स अमेरिका, दुबई, इजिप्ट, थाईलैंड, बंग्लादेश जैसे अनेकों देशों में बेचती है.

Balvant Parekh

बलवंत पारेख

एशिया के 100 सबसे अधिक धनी लोगों में से 45वें स्थान पर रह चुके Balvant Parekh ने अपने जन्मभूमि के लिए अनेकों काम किए. उन्होंने अपने गांव और कस्बे के लिए दो स्कूल, एक अस्पताल और कॉलेज की स्थापना की. इतना ही नहीं गुजरात की सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन के लिए पारेख ने गैर सरकारी संगठन “दर्शन फाउंडेशन” की शुरुआत की. गुजरात के एक सामान्य परिवार में जन्में बलवंत पारेख ने 25 जनवरी 2013 को दुनिया को अलविदा कह दिया.

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