जिसने बेटा छीना, मैं उसे खत्म कर दूंगा- Pothole dada

कभी कभी वक्त कितना बेगैरत हो सकता है, हर इंसान इससे भलिभांति वाकिफ है. तभी तो आज के समय में जब एक इंसान अपने घर से निकलता है तो उसके घर वाले उसकी सलामती की दुआ मांगते हैं. रात में अगर पापा घर से थोड़ी देरी से लौटते हैं तो सभी परेशान हो उठते हैं और ये परेशानी होनी भी लाजिमी है. क्योंकि घर से निकलने के बाद किसे कब और क्या हो जाए मालूम नहीं होता, दुनिया से लेकर देश में हर जगह ऐसे न जानें कितने ही परिवार वाले हैं जो इसी तरह अपनो को खो देते हैं और उसके बाद कुछ दिनों तक उसकी याद में खोए रहते हैं. लेकिन एक बार फिर जिंदगी करवट लेती है. चीजें सही पटरी पर आने लगती है और हम उसे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं. क्योंकि दस्तूर तो यही.

इसी तरह आज के लगभग 4 साल पहले 28 जुलाई 2015 को एक घटना मुंबई की सड़क पर घटी थी. जिसमें एक पिता ने अपना बेटा खोया था, 16 साल का बेटा. बारिश का समय था. बारिश इतनी ज्यादा हो रही थी की हर तरफ पानी था. सड़क पर बने गड्ढ़ों के बीच भी पानी यूं आकर रूका था मानें किसी तालाब में पानी. उस समय एक बेटा अपने घर से अपने कजिन राम के साथ निकला की मां मैं अपना एडमिशन कराने जा रहा हूं और एडमिशन कराकर वो दोनों बाईक पर वापस आ रहे थे की तभी सड़कों पर भरे पानी के गड्ढे में उनकी बाईक चली गई, राम ने बाईक सम्भालने की कोशिश की…लेकिन दोनों वहीं सड़क पर गिर पड़े. और थोड़ी देर बाद, राम जब उठा तो उसने अपना हेलमेट निकाला. राम ठीक था. लेकिन उसके साथ उसके पीछे बैठा प्रकाश शांत था, एकदम शांत क्योंकि वो वहीं इस दुनिया से जा चुका था.   

प्रकाश जो अभी थोड़ी देर पहले मां को जल्दी आने को कहकर गया था. वो परिवार से काफी दूर जा चुका था. उस समय प्रकाश के पिता रोए बहुत रोए मां भी बिलखती रही, रात यूं ही गुजर गई. लेकिन जब नई सुबह आई तो प्रकाश के पिता ने अपने ठान लिया कि, जिस चीज ने उनसे उनके बेटे को छीन लिया था वो उसी वजह को खत्म कर देने की.

सड़कों से गड्ढे खत्म करना मकसद-Pothole dada

प्रकाश के पिता बिल्होरे ने अगली सुबह एक मुहिम छेड़ दी…सड़क पर बने गड्ढे को खत्म करने की. अकेले हर सुबह वो सड़क पर बने गड्ढों को भरने के लिए निकल जाते थे और उनकी मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी. आज दादाराव बिल्होरे की टीम बन गई है. जो उनके साथ मिलकर गड्ढे भरने का काम करती है.

ताकि फिर को दूसरा प्रकाश इस तरह अपने घरवालों को छोड़कर ना चला जाए. ईंट, पत्थर, बजरी के छोटे-छोटे टुकड़ों से रोड के गड्ढे भरने वाले दादाराव को आज के समय में लोग पॉटहोल दादा के नाम से जानते हैं.

मेरे बेटे के बाद, लोग मुझे पागल समझने लगे थे- Pothole dada

बिल्होरे कहते हैं कि, “मेरे आस-पास रहने वाले लोगों को लगता था कि, जब मेरा बेटा मुझे छोड़कर गया तो मैं पागल हो गया हूं. लेकिन मैं अपने बेटे को जानता हूं उसके रग-रग में भरपूर जिंदगी जीने की तमन्ना थी. मेरा बेटा कभी नहीं चाहता था कि, उसके साथ कभी ऐसा हो.”

46 साल के बिल्होरे बताते हैं कि, आज के समय में मैं सड़कों पर गड्ढे ढूंढता हुआ चलता हूं. जहां भी ये नजर आते हैं, मैं वहीं ठहर जाता हूं. उसको भरने की जुगत करता हूं. फिर आगे बढ़ता हूं. पिछले 4 सालों में दादाराव 600 से ज्यादा गड्ढे भर चुके हैं.

चाहे बांद्रा हो या अंबरनाथ, अंधेरी ईस्ट, गोरेगांव मुंबई की कोई भी सड़क क्यों न हो, बिल्होरे से आज अछूती नहीं है.

साल 1974 में मुंबई आए बिल्होरे बताते हैं कि, पहले ज्यादा लोड लेकर ट्रकें नहीं चलती थी तो सड़के सुरक्षित रहती थी. उन पर गड्ढे कम होते थे. लेकिन आज के समय में 50-50 टन से ज्यादा माल लेकर ट्रकें सड़कों पर दौड़ती हैं. जिससे सड़के धंस जाती हैं और गड्ढे बन जाते हैं. जिनमें गिरकर लोगों की जान चली जाती है.

इसी मुहिम को देखते हुए मुंबई के एक एनजीओ ने भी फिल इन द पॉटहोल्स प्रोजक्ट की शुरूवात की है. जिसका उद्देश्य सड़को पर मौजूद गड्ढों को खत्म करना है. इसके लिए एक मोबाइल एप भी तैयार की गई है. जिसमें सड़क में मौजूद किसी भी गड्ढे की फोटो कोई भी इंसान डाल सकता है. इसके बाद प्रोजेक्ट से जुड़े लोग वहां जाकर उस गड्ढे को भर देते हैं.

जाहिर है, दुनिया के सबसे बड़े दुश्मन कहे जाने वाला आतंकवाद भी आज उतनी जान नहीं ले पाता जितना सड़कों पर मौजूद ये गड्ढे ले लेते हैं. हां माना की आंतकवाद खतरनाक है. लेकिन शायद ये गड्ढे भी किसी आतकंवाद से कम नहीं क्योंकि आंतकवाद का हम ठीकरा किसी के सर फोड़ सकते हैं लेकिन इन गड्ढों का नहीं फोड़ सकते. क्योंकि साल 2017 में आतंकवाद के चलते हमारे देश में 803 मौतें हुई थी, वहीं गड्ढ़ों के चलते देशभर में 3597 मौतें हुई थी. जबकि साल ये आंकड़ा साल 2018 में इसी के करीब था. यानि की हर दिन 10 मौतें इसी के चलते, तो आप खुद सोच सकते हैं की खतरनाक कौन है… लेकिन बिल्होरे जैसे ही कुछ लोग हैं जिन्होंने एक बेटा, एक अपना परिवार तो खो दिया लेकिन वो नहीं चाहते की कोई और इसी तरह किसी अपने से बिछड़ जाए. तभी तो हर दिन सूरज की किरण के साथ वो गड्ढे भरने की मुहिम में लग जाते हैं.

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