वो दौर जब अपने स्तन ढ़कने के लिए औरतों को देना पड़ता था “स्तन कर”

आज के वक्त में जहां औरतों के क्लिवेज का दिखना भी उन्हें चरित्रहीन का सर्टीफिकेट थमाने के लिए काफी होता है, तो वहीं हमारे इतिहास में एक वक्त पर औरतों को अपने स्तन ढ़कने के लिए भी कर चुकाना पड़ता था। ये बात सुनकर हैरान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि शायद ही केरल के बाहर का कोई व्यक्ति इस बात से वाकिफ होगा।

ये 19वीं सदी की बात है जब दक्षिण भारत के ज्यादातर हिस्सों में त्रावणकोर यानि की केरल के राजा का शासन था। उस समय वहां की महिलाओं पर स्तन कर लगाया जाता था। स्तन कर यानि की उस समय की महिलाओं और लड़कियों को अपने स्तन ढ़कने के लिए टैक्स देना पड़ता था। तो वहीं नीची जाति के पुरूषों को अपने पूरे तन पर कपड़े पहनने की अनुमति नहीं थी।

अगर नीची जाति का कोई पुरूष या महिला अपने तन को कपड़े से ढ़कने की जरूरत भी करता था तो उनके कपड़ों को फाड़ कर फेंक दिया जाता था। किसी भी लड़की के स्तनों का विकास होने पर भी उसके परिवार को स्तन कर अदा करना पड़ता था। इस कर को मुलाकरम भी कहा जाता था।

जहां एक तरफ पिछड़ी जाति की महिलाओं को अपने स्तन किसी के भी सामने ढ़कने के अनुमति नहीं थी। तो वहीं ऊंची जाति की महिलाओं को अपने पति के सामने कपड़े पहनने की अनुमति नहीं थी। इसके अलावा मंदिर में प्रवेश करते ही ऊंची जाति की महिलाओं को भी अपने स्तनों से कपड़ा हटाना पड़ता था।

Channar Revolt- जब नंगेली ने अधिकारियों के सामने काट कर रखे अपने स्तन

साल 1813 में पहली बार परंपरा के नाम पर चल रहे इस जातिय भेद का विरोध किया गया। जब केरल के चेरथला की रहने वाली नंगेली ने बिना किसी राजा की इजाजत के अपने स्तनों को कपड़ों से ढ़कना शुरू कर दिया लेकिन जब इस बात की भनक सरकारी अधिकारियों को हुई तो वो तुंरत नंगेली के घर उससे कर वसूलने के लिए पहुंच गए मगर अपने शरीर पर अपना हक समझने वाली जाबांज नंगेली ने अधिकारियों को कर देने से साफ इंकार कर दिया।

स्तन कर के विरोध में साहसी नंगेली ने अधिकारियों के सामने अपने स्तन काटकर केले के पत्तों पर सजाकर रख दिए। नंगेली की इस साहस को देखकर अधिकारी हैरान रह गए, मगर ज्यादा खून बहने से नंगेली की मौके पर ही मौत हो गई। नंगेली की मौत का सदमा उसके पति चिरूकंदन से बर्दाश्त नहीं हुआ जिसकी वजह से नंगेली की चिता में कूदकर उसके पति ने भी अपनी जान दे दी। तो वहीं इसी के साथ चिरूकंदन भारत का पहला पुरूष सती बन गया। नंगेली जहां रहती थी उस जगह को बाद में मुलच्छीपुरम यानी स्तन का स्थान कहा जाने लगा, मगर अब इस इलाके का नाम बदलकर मनोरमा जंक्शन रखा दिया गया है।

स्तन कर

इस घटना के बाद त्रावणकोर की प्रमुख दो दलित जातियों एरावा और पन्नयेरी नाडर की औरतों ने सड़क पर निकलकर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने मांग की कि, उन्हें कुप्पायम पहनने की अनुमति दे दी जाए। आपको बता दें कि, कुप्पायम एक तरह की बनियान थी, जो कि, उस दौरान मुस्लिम और ईसाई धर्म की महिलाएं पहना करती थी। दलित जाति की महिलाओं का ये विरोध तकरीबन 5 साल तक यूं ही चलता रहा मगर त्रावणकोर के राजा पर इस विरोध का कोई असर नहीं हुआ। बल्कि महाराजा मूलम तिरूनल राम वर्मा ने दलित महिलाओं के प्रदर्शन को नकारते हुए एक फरमान जारी किया कि, नीची जाति की महिलाओं को कपड़े पहनने का कोई अधिकार नहीं है।

महाराजा के फरमान के बाद दलित महिलाएं बहुत निराश हुई हालांकि, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना विरोध जारी रखा। जिसके नतीजतन अगले साल 1820 में त्रावणकोर के दरबार में एक ब्रिटिश दीवान ने कदम रखा, जिसका नाम कर्नल जॉन मुनरो था। मुनरों ने आते ही त्रावणकोर की महिलाओं के लिए फरमान जारी किया। जिसमें कहा गया कि, जो महिलाएं अपना धर्म बदलकर ईसाई बनने को तैयार हो जाएंगी उन्हें वो कपड़े पहनने की इजाजत दे देंगे।

मुनरों के इस फरमान के विरोध में राज्यसभा में मौजूद ऊंची जाति के सभासदों में हंगामा मच गया। उनका मानना था कि अगर नीची जाति की औऱतें धर्म बदलकर कपड़े पहनने लगेंगी तो उनमें और ऊंची जाति में क्या फर्क रह जाएगा और ये फर्क बरकरार रखना बेहद जरूरी है, उनके अनुसार ऊंची और नीची जाति में भेद ना रहना समाज के लिए हानिकारक है। इसके बाद मुनरों ने अपना फरमान वापस ले लिया। लेकिन दलित महिलाओं का विरोध और तेज हो गया।

विरोध करती महिलाओं का इस दौरान ऊंची जाति के लोगों द्वारा बुरी तरह से शोषण किया गया। ये शोषण सिर्फ मर्दों द्वारा शारीरिक शोषण तक सीमित नहीं था, बल्कि ऊंची जाति की महिलाएं भी किसी ना किसी तरह से दलित महिलाओं को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी।

इसके बाद साल 1822 में जॉन कर्नल ने एक बार फिर वही फरमान जारी किया हालांकि, इस बार ऊंची जाति के विरोध करने पर भी उन्होंने अपना फरमान वापस नहीं लिया। इतने सालों से विरोध कर रही कई दलित महिलाओं ने अपना धर्म बदलकर कपड़े पहनना शुरू कर दिया। मगर ऐसा करने के बदले में उन्हे ऊंची जाति के लोगों से शारीरिक और मानसिक शोषण सहना पड़ा। बीच सड़क कर कहीं भी उनको निर्वस्त्र कर दिया जाने लगा। उस समय ऊंची जाति के पुरूष अपने पास एक भाला रखते थे, जिसकी नोक पर एक नुकीला चाकू बंधा होता था। इसकी मदद से वो दलित महिलाओं के कुप्पायम को फाड़ कर फेंक दिया करते थे।

Channar Revolt के दौरान औरतों को सहना पड़ा शारीरिक शोषण

इसके बाद 1829 तक धर्मांतरण करने वाली ईसाई महिलाओं के साथ दलित जाति की हिंदू महिलाओं ने भी बगावत में शामिल होना शुरू कर दिया और इस बगावत को नाम दिया गया चन्नार क्रांति। चन्नार क्रांति की आग धीरे-धीरे तेज होने लगी। दलित महिलाओं ने कपड़े और कुप्पायम पहनकर बाहर निकलना शुरू कर दिया, साथ ही शारीरिक शोषण का भी मुंहतोड़ जवाब देने लगी। सवर्णों ने महिलाओं की बढ़ती इस क्रांति का जिम्मेदार ईसाई मिशनरियों का ठहराना शुरू कर दिया। उनके मुताबिक ईसाई मिशनरी हिंदू समाज को बर्बाद करने के लिए दलित महिलाओं का धर्मांतरण करा रही है।

स्तन कर

इस बीच साल 1858 में नीची जाति की महिलाओं संग शोषण की सारी हदें तब पार हो गई जब एक सरकारी कर्मचारी ने दो नादर महिलाओं के कुप्पायम अपने हाथों से फाड़कर फेंक दिए, और दोनो औरतों को बांधकर पेड़ से लटका दिया गया। दलित समाज के धीरज की सारी सीमाएं पार हो चुकी थी। चन्नार क्रांति की आग अब अपनी चरम सीमा पर थी। त्रावणकोर के सभी नीची जाति के लोगों ने इस घटना के जवाब में ऊंची जाति के लोगों पर हमला शुरू कर दिया। घर, मौहल्लो में आगजनी होने लगी। खून-खराबे तक हुए, जिन्हें नजरअंदाज करना अब सरकार के लिए नामुमकिन हो चला था। जिसको देखते हुए मद्रास के गर्वनर ने त्रावणकोर के राजा को जल्द से जल्द हिंसा रोकने का आदेश दे दिया।

आदेश के दबाव में आकर 1859 में त्रावरणकोर के राजा मूलम तिरूनल राम वर्मा को दलित समाज की महिलाओं को कपड़े पहनने की इजाजत देनी पड़ी। हालांकि, तब भी महिलाओं को केवल कुप्पायम और मछुआरों के पहने गए कपड़े पहनने की ही अनुमति दी गई थी। ऊंची जाति की महिलाओं की तरह सामान्य कपड़े पहनने का अधिकार उन्हें 1915-16 में जाकर ही मिल पाया।

नंगेली के साहस और चन्नार क्रांति में अपना सहयोग देने वाली हर औरत की कहानी को जहां फेमिनिज्म के लिए सबसे पहले याद किया जाना चाहिए वहीं अफसोस साल 2016 में एनसीआरटी की किताब में लिखे इस क्रांति से जुड़े एक चैप्टर को भी हमेशा के लिए हटा दिया गया। जो कि, ना सिर्फ गलत है बल्कि ऐसा करने से देश की एक पूरी पीढ़ी हमारे इतिहास से जुड़े कुछ अहम पहलुओं से वंचित हो रही है। चन्नार क्रांति भले ही हमारे इतिहास की एक अहम क्रांति रही हो। मगर बहुत ही अफसोस की बात है कि, हमारे इतिहास में औरतों को अपने ही शरीर पर अपने हक के लिए संघर्ष करना पड़ा था।

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