तवायफ गौहर जान : गुलाम भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार

गौहर यानि की मोती. मोती की चमक हमेशा इंसान को लुभाती रही है. ऐसे में हर महफ़िल से लेकर शादी में भी दुल्हनों की चमका इन्हीं से बनती है. यही वजह है कि. आज हम आपको ठीक उसी तरह चमकने वाली भारत की ‘पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार गौहर जान’ के बारे में बताने वाले हैं. जिन्हें भारत की पहली ‘रिकॉर्डिंग सुपरस्टार’ के नाम से पहचाना जाता है. उन्होंने ने भारत में सबसे पहले उनके गाए गानों को 78 आरपीएम पर रिकॉर्ड किया गया था. जिसे भारत के प्रसिद्ध ग्रामोफोन कंपनी ने रिलीज किया था. जिसकी वजह थी उनकी गायकी.  यूँ तो गौहर जान के बारे में कई लेखकों ने लिखा है. जहाँ गौहर जान की जीवनी पर विद्या शाह ने ‘जलसा’ नामक किताब लिखी थी. वहीं विक्रम संपथ ने ‘माई नेम इज गौहर खान’ लिखी. ऐसे में उन सभी ने गौहर जान के जीवन के अनेकों किस्सों को अपनी लेखनी में उतारा है.

गौहर जान पहली गायिका सुपरस्टार

gauhar jaan

26 जून 1873 में जन्मी गौहर जान, का बचपन का नाम ‘एंजेलिना येओवर्ड’ था. गौहर जान के पिता विलियम रोबर्ट येओवर्ड आजमगढ़ के रहने वाले थे. जोकि एक ड्राई आइस फैक्ट्री में काम करते थे. जबकि उनकी माँ विक्टोरिया हम्मिंग भारतीय संगीत और नृत्य में पारंगत थी. माता-पिता की ठीक से न बनने के चलते दोनों के बीच 1879 में तलाक हो गया. इस बीच एंजेलिना येओवर्ड अपनी माँ के साथ रहने लगी. ऐसे में उनकी माँ का रिश्ता उनके एक दोस्त खुर्शीद के साथ हो गया, बनारस के रहने वाले खुर्शीद के साथ एंजेलिना की माँ बनारस चली गई और अपने साथ अपनी बेटी भी ले गई. जहाँ जाने के बाद एंजेलिना की माँ विक्टोरिया हम्मिंग ने इस्लाम धर्म कबूलकर लिया. यही वजह रही कि, एंजेलिना को भी इस्लाम धर्म कबूल करना पड़ा और उनका नाम बदलकर गौहर जान रख दिया गया. और उनकी माँ का नाम मलका जान रखा गया. बचपन में गौहर जान को उनके घर वाले प्यार से ‘गौरा’  बुलाया करते थे. अपनी भारतीय संगीत की रुचि और गायिकी के चलते जल्द ही ‘मलका जान’ पूरे बनारस में मशहूर हो गई. लोग उन्हें मशहूर हुनरमंद गायिका और कत्थक डांसर के तौर पर पहचानने लगे. इस समय तक लोग उन्हें ‘बड़ी मलका जान’ के नाम से जानते थे. जिसकी वजह थी, उन्हीं की समकालीन तीन और प्रसिद्धमलका जान थीं. और गौहर जान की माँ इनमें सबसे बड़ी थी. ऐसे में गौहर की माँ मलका जान अपनी बेटी के साथ कलकत्ता चली गईं. जहाँ उन्होंने उस समय के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में अपनी अदायगी की शुरुवात की. इस बीच 1883 में गौहर जान ने भी संगीत की कलाएं सीखनी शुरू कर दी. इस दौरान गौहर जान ने रामपुर के उस्ताद वज़ीर खान और कथक के महान महाराज बिंदद्दीन से गायन प्रशिक्षण लिया. इसके अलावा उन्होंने श्रीजनबाई से ध्रपुद, जबकि धामर और चरन दास से बंगाली कलाएं और कीर्तनों के बारे में प्रशिक्षण लिया.

जब शुरू हुआ गौहर जान का सफर

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सभी गुरुओं से कलाएं सीखने के बाद गौहर जान ने 1887 में अपनी प्रस्तुति मात्र 14 साल की उम्र में दी. इस समय गौहर जान की अदायगी और कला से प्रभावित उस समय के महाराज ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उसी उम्र में उन्हें अपने दरबार में संगीतकार के तौर पर नियुक्ति दे दी. अपनी कलाओं से सबका दिल जीतने वाली गौहर जान ध्रुपद और ठुमरी की भी मल्लिका मानी जाती थीं. जबकि उनकी गायकी का अंदाज ऐसा था कि, उसी समय गौहर जान को लोगों ने महान ख्याल गायिका घोषित कर दिया था. उनकी आवाज़ से लेकर उनकी कला का ही जादू था कि, जिस समय पुरुष को अधिक महत्वा दी जाती थी. उस समय गौहर जान का नाम काफी मशहूर हो चला था.ऐसे में साल 1896 में उन्होंने कलकत्ता में प्रदर्शन करना शुरू किया. जिसके बाद तो गौहर जान के नाम की चर्चे पूरे देश में होने लगे. यही वजह थी कि, दिल्ली में किंग जॉर्ज वी की ताजपोशी के दौरान गौहर जान को अपना हुनर दिखाने की खातिर आमंत्रित किया गया था. ऐसे में उन्होंने पूरे देश में अपने हुनर को बिखेरने की खातिर प्रदर्शन करने की शुरूवात की. गौहर जान ने ‘हमदम पेन’ के नाम से अपनी अनेकों गजलें लिखी.

गौहर जान की सुपरस्टार बनने की कहानी

जिस समय भारत गुलामी की जंजीरों में लिपटा था. उस समय भारत में गौहर जान के नाम के चर्चे खूब थे. ऐसे में ये वो दौर था, जिस समय भारत में ग्रामोफ़ोन का दौर शुरू हुआ. जिससे लोगों की संगीत को रिकॉर्ड किया जा सकता है. जिसे फिर बाद में सुना जा सकता था. साथ ही उसे बेचा भी जा सकता था. हालांकि ये वो दौर था जिस समय गायक और गायिकाओं को संगीत रिकॉर्ड के लिए मनाना सबसे बड़ा टास्क हुआ करता था. तब के पुरुष प्रधान देश भारत में किसी स्टूडियो में जाकर महिला गायिकाओं और गायकों का संगीत रिकॉर्ड करना मर्यादाओं के बाहर माना जाता था. हालांकि साल गुजरते-गुजरते सन 1902 में भारतीय संगीत क्षेत्र के ऐतिहासिक पल की शुरुआत हुई. जिसकी शुरूवात गौहर जान ने की. भारत की ग्रामोफ़ोन कंपनी ने उस समय गौहर जान को संगीत रिकॉर्डिंग करने का प्रस्ताव दिया. जिसे गौहर जान ने स्वीकार करते हुए अपना पहला रिकॉर्डिंग डिस्क तैयार किया. जिसकी अवधि 3 मिनट की थी. जिसके बाद गायन के क्षेत्र में शुरू हुआ गौहर जान का सफर फिर साल 1920 तक चला.

इस दौरान उन्होंने इन 18 सालों में 10 से ज्यादा भाषाओं में 600 से ज्यादा गीत रिकॉर्ड किया. जिसके चलते गौहर जान भारत की पहली “रिकॉर्डिंग सुपर स्टार” बन गई. अपने हर गाने के आखिर में गौहर जान ‘माई नेम इस गौहर जान’ कहकर साइन ऑफ करती थीं. जोकि उनकी पहचान बन गई. अपनी जीवन शैली की विशेषता में अलग पहचान रखने वाली गौहर जान के बारे में उस समय ग्रामोफोन कंपनी केएफ डब्ल्यू गैसबर्ग ने एक बार कहा था कि,

“जब भी गौहर जान रिकॉर्डिंग के लिए आती थीं. वो हमेशा सुंदर गाउन में होती थीं. आभूषणों से लदी होती थीं. उन्होंने जिन कपड़ों को एक बार पहना दोबारा वो पहन कर कभी स्टूडियो नहीं आई.”

 ऐसे में एक बार गौहरजान को दतिया में एक प्रदर्शन की खातिर जाना था, जिसमें उन्होंने निजी रेल की मांगकर ड़ाली थी. इस दौरान उनकी माँग थी कि, उनकी रेल में उनके मददगार, निजी हकीम,धोबी और अन्य नौकरों को ही जानें की इजाजत होगी.

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एक बार गौहर जान ने अपने कला की प्रस्तुति उस समय की समकालीन प्रसिद्ध तवायफ बेनजीर के साथ दी थी. जिसमें बेनजीर ने गौहर जान से पहले महफिल में प्रस्तुति दी थी. जिसमें वो पूरी तरह सुंदर गहनों से लदी हुई थी. इस दौरान गौहर जान सभा में अपनी प्रस्तुति खत्म कर बेनजीर के पास गई और उन्होंने कहा कि, “भले ही तुम्हारे आभूषणों की चमक कितनी ही तेज क्यों न हो. लेकिन पूरे महफ़िल में तुम्हारी कला ही चमकती है.”  जिससे प्रभावित होकर बेनजीर जब वापस आई तो उन्होंने अपने सभी गहनों को अपने गुरु को दे दिया और शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरुआत कर दी. और लगभग 10 साल बाद जब गौहर जान के साथ उन्होंने अपनी एक और प्रस्तुति दी तो, गौहर जान ने उनसे कहा था कि, खुश रहो, वाकई तुम्हारे गहनों में तुमसे ज्यादा चमक है.

इस बीच साल 1928 में गौहर को कृष्ण राजा वाडियार चतुर्थ ने निमंत्रण भेजा. जिनके बुलावे पर गौहर जान शाही महल चली गईं. जहाँ 1 अगस्त 1928 को उन्हें शाही संगीतकार नियुक्त किया गया. हालांकि गौहर जान ज्यादा दिनों तक शाही संगीतकार नहीं रह सकी. जिसकी वजह थी 17 जनवरी 1930 को उनकी मृत्यु. महज़ 58 साल की उम्र तक जीने वाली गौहर जान तब तक उन बुलंदियों को छू चुकी थीं. जहाँ पहुंचना अनेकों लोगों को ख्वाब होता था. उनकी बनाई विरासत जो उनके जाने के बाद छूट गई आज भी जितनी सहेजी जाए कम है.

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