हाइटेक खेती के उस्ताद सुधांशु कुमार, जिनकी कमाई जान दंग रह जाएगें आप

जब भी हम किसी किसान की आर्थिक स्थिति की बात करते हैं तो, हमें लगता है कि खेती से बेहतर मुनाफा नामुमकिन है. ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकतर लोग आज भी परंपरागत खेती ही करते हैं. उन्हें न तो अन्य खेती के बारे में ज्यादा जानकारी है. न ही वो कभी अलग तरह की खेती चुनते हैं. उन्हें डर होता है. वो इस चक्कर में अपने आज की खेती भी खो देंगे. लेकिन जो किसान इन सब चीजों से हटकर खेती करता है. वो खेती से बेहतर मुनाफा कमाता है. अब चाहे आप बिहार के समस्तीपुर में रहने वाले सुधांशु कुमार को ही देख लो.

सुधांशु कुमार एक सफल किसान हैं. जो अपने खेतों से हर साल लगभग 80 लाख रूपये कमाते हैं. वजह उनकी मेहनत नहीं, बल्कि उनका दिमाग है.1990 में अपने घर की खेती की बागडोर संभालने वाले सुधांशु कुमार ने हमेशा ही वैज्ञानिक तरीके पर खेती में जोर दिया.

आज उनकी दिनचर्या ऐसी है कि, वो पूरी तरह से Fully Automated Farm वाली खेती करते हैं. जहाँ एक ओर वो अपनी बाईक पर अपने खेतों में जाते हैं. और अपने शेड में अपनी बाईक पार्क करते हैं. इसके बाद हर रोज़ अपने खेत में बनाए कंट्रोल रूम में जाते हैं. ऐसे में एक फिल्म का चयन करते हैं. उसके बाद अपने रूम में लगाई कुर्सी पर बैठते हैं. और एक बटन दबाकर अपने खेतों की, फलों की, बागों की सिंचाई और फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं. जितनी देर में एक फिल्म खत्म होती है. उतनी देर में सुधांशु के 35 एकड़ खेतों में सिंचाई की प्रक्रिया भी पूरी हो जाती है. और सुधांशु अपना सिस्टम बंद करते हैं. बाईक स्टार्ट करते हैं और अपने घर को वापस लौट आते हैं.

जरा सोचिए आखिर बिहार के रहने वाले सुधांशु किस तरह की खेती करते हैं. आज सुधांशु पूरी तरह से टेक्नोलॉजी पर बेस्ड खेती कर रहे हैं. जिसमें खेतों की कम निगरानी और कम श्रमिकों की जरूरत से ही मुनाफे वाली खेती कर रहे हैं. यही वजह है कि, खेती के माध्यम से ही सुधांशुकुमार हर साल लाखों की कमाई करने के साथ-साथ गुणवत्ता से भरपूर अन्य और फल उगा रहे हैं. आज सुधांशु के 60 एकड़ खेत में, केला, अमरूद, लीची, जामुन, आम, ब्राजील के मौसम्बी और ड्रैगन फ्रूट के लगभग 28 पेड़ हैं.

ऐसे शुरू हुआ सुधांशु का Fully Automated Farm

Farmer Sudhansu Kumar

खेती के बारे में सुधांशु बताते हैं कि, “ये सब सालों पहले ही शुरू हुआ था. जिस समय मैंने ‘टाटा टी गार्डन’ की पहली नौकरी ठुकरा दी थी. क्योंकि मुझे खेती करने का मन था. मेरे पिता और मेरे दादा जी चाहते थे कि, मैं सिविल सर्विसेज की तैयारी करूं. जबकि मुझे खेती करनी थी. यही वजह थी कि, उस समय मुझे मेरे पिता ने पांच एकड़ की बेकार पड़ी जमीन दी थी. ताकि मैं उस पर खेती कर सकूं.”

दरअसल, सुधांशु के पिता ने उस समय उनको वो बेकार पड़ी जमीन इसलिए दी थी. ताकि वो देख सकें कि, उनका बेटा खेती करने लायक है या नहीं. सुधांशु बताते हैं कि, “जो खेत मेरे पिता ने मुझे दी थी. वो जंगली पौधों से भरी हुई थी. यही वजह थी कि, उस समय मैंने पूसा के डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से सलाह ली कि टेक्नोलॉजी की मदद से मैं इस खेत को कैसे खेती के लिए उपयोगी बनाऊ. ऐसे में उन सबके बताए रास्ते पर मैंने महज़ 25 हजार रुपये खर्च कर एक साल के अंदर 1.35 लाख रुपये कमाए. जोकि काफी ज्यादा थे. क्योंकि हमारे पूरे परिवार ने कभी उस जमीन से 15 हजार से ज्यादा नहीं कमाए थे.”

अपनी कमाई के ही दम पर सुधांशु कुमार ने सबसे पहले ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रयेर खरीदा. जिसकी कीमत उस समय बाजार में 40 हजार रुपये थी. यही वो समय था. जहां से सुधांशु ने एक ऐसी राह पकड़ी की आज वो टेक्नोलॉजी वाले किसान बन  गए. क्योंकि आने वाले कुछ ही सालों में उन्होंने उसी पांच एकड़ जमीन से, हर साल 13 लाख रुपये कमाने शुरू कर दिए.  

आज सुधांशु के पास लगभग 200 एकड़ खेत है. जिसमें उन्होंने 60 एकड़ खेत में माइक्रो-इरिगेशन लगाया हुआ है तो 35 एकड़ भूमि उनकी पूरी तरह से ऑटोमेटेड है. और बाकि अन्य जमीनों पर सुधांशु गेहूं, मक्का, मसूर आदि की फसलें उगाते हैं.

200 एकड़ खेत के मालिक हैं सुधांशु कुमार

Farmer Sudhansu Kumar

टेक्नोलॉजी बेस्ड खेती करने वाले सुधांशु आज 200 एकड़ खेत पर खेती करते हैं. जिस पर बोलते हुए सुधाशुं बताते हैं कि, “टेक्नोलॉजी और उपकरणों ने ही मुझे आज इतना बेहतर बनाया है. इन्हीं की मदद से मैं आज बेहतर गुणवत्ता वाली फसलों और फलों का उत्पादन कर पाता हूँ. लेकिन शुरुवात के समय लगभग तीन साल तक मैं बस फसलें ही उगाता था. हालांकि बाद में मैंने फलों पर ध्यान दिया. जिसके चलते मेरी आय में अधिक इजाफा हो पाया और मेरी आय तीन गुना अधिक हो सकी.”

सुधांशु कहते हैं कि, “अपने पिता और दादा की ही तरह मैंने भी खेती चुनी, लेकिन मैंने उसमें टेक्नोलॉजी जोड़ दी. जिससे सबकुछ बदल गया. आज मैं अपने कंट्रोल रूम से ही ड्रिप-इरीगेशन, माइक्रो-स्प्रिन्क्लर्स की मदद से सिंचाई करता हूँ. अपने खेतों की निगरानी करता हूँ. इन्हीं तकनीकों की मदद से हर चौधे दिन खेतों में सात ग्राम खाद डालता हूँ. जिससे पूरा सिस्टम बेहतर चलता है.”

दरअसल सुधांशु का पूरा फार्म एक वायरलेस ब्रॉडबैंड इंटरनेट नेटर्वक से जुडा हुआ है. जिसके चलते सुधाशुं अपने खेतों की सिंचाई से लेकर निगरानी तक अपने स्मार्टफोन और लैपटॉप से करते हैं. ऐसे में उन्होंने अपने खेतों में सीसीटीवी कैमर लगाए हुए हैं. जिनके जरिए वो अपने खेतों की निगरानी करते हैं.  

नेटवर्क मार्केटिंग के जरिए बेचते हैं अपने फल-फसल सुधांशु

सुधांशु कहते हैं कि, “आज उपज ज्यादा होती है. ऐसे में उस उपज को बेचने की खातिर बाज़ार और बेहतर खरीददार की जरूरत पड़ती है. जोकि मैं नेटर्वक मार्केटिंग के जरिए करता हूँ. जिसके जरिए मैं भारत के संभावित खरीददारों से बात करता हूँ. साथ ही ये तय करता हूँ कि, फसल कटने के महज़ 24 घंटे के अंदर ही मैं अपने फलों की डिलीवरी उन तक कर दूँ. मैंने अपना पहला करार 2012 में इलाहाबाद की एक कंपनी के साथ किया था. जोकि मुझसे लीची खरीदती थी. उसके बाद से मैं आज लगभग पूरे भारत यानि की मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, बेंगलुरू तक में अपने फल भेजता हूँ. इतना ही नहीं, मैं अपने फल दुबई में भी भेजता हूँ. मैंने अपने फल ऑनलाइन बेचने के खातिर ‘Orchards of Nayanagar’ की नाम की एक कंपनी शुरू की है. जिसके जरिए मैं ये सब कर पाता हूँ.”

सुधांशु की इन्हीं उपलब्धियों को देखते हुए, साल 2010 में उन्हें इनोवेटिव फार्मर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था. इसके अलावा 2011 में सुधांशु को सोसाइटी फॉर डेवलप्मेंट ऑफ सबट्रापिकल हॉर्टिकल्चर से सम्मानित किया गया था. इसके अलावा बेस्ट मैंगो ग्रोअर अवॉर्ड भी सुधांशु को मिल चुका है. साथ ही उन्हें साल 2014 में महिन्द्रा समृद्धि इंडिया एग्री अवार्ड् भी दिया गया था.

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हर सब्सिडी का उठाएं फायदा-सुधांशु

Farmer Sudhansu Kumar

सुधांशु कहते हैं कि, मैंने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तो किया है. साथ ही मैं सरकार की योजनाओं पर भी ध्यान रखता हूँ. सब्सिडियों का फायदा उठाता हूँ. अन्य किसानों को भी ऐसा करना चाहिए. साथ ही टेक्नोलॉजी से जुड़ना चाहिए. ताकि अपनी उपज बढ़ाने के साथ गुणवत्ता बढ़ा सकें. सरकारें पॉलीहाउस बनवाने से लेकर कृषि उपकरण पर सब्सिडी देती हैं. लोगों को उनका फायदा उठाना चाहिए. ताकि वो बेहतर खेती कर सकें.

200 एकड़ जमीन पर खेती करने वाले सुधांशु के दादा के पास एक समय में 2700 एकड़ खेत थे. हालांकि सुधांशु कहते हैं कि, भले ही आज मेरे पास उतने खेत नहीं. लेकिन जितने हैं उन्हीं की उपज मेरे लिए बहुत अधिक है.

आज सुधांशु अपने गाँव के मुखिया हैं. जिनसे उनके गाँव के लोग प्रेरणा लेकर उन्हीं की तरह खेती करने की योजना बना रहे हैं. उन्हीं की तरह ही अनेकों किसान इन दिनों पॉलीहाउस, ड्रिप इरिगेशन तकनीक अपना रहे हैं. ताकि पानी को बचाने के साथ बेहतर खेती की जा सके.

सुधांशु कहते हैं कि, “आने वाले दिनों में मैं अपने फल उत्पादन को थोक में बेचने और अधिक रिटर्न पाने के एवज़ में कई कॉरर्पोरेट कंपनियों से बात कर रहा हूँ. ताकि मुनाफा और हो सके.”

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