तनोट माता मंदिर : जहां पाकिस्तान के गिराए हज़ारों बम हुए बेअसर

आपने अब तक लगभग हर मंदिर में पुजारी को ही भगवान् की आरती करते देखा होगा। यही नहीं मंदिर के रखरखाव और मंदिर परिसर से जुड़ी हर बात की जिमेदारी पुजारी की होती है। मगर हमारे देश में एक ऐसा भी मंदिर है जहां आरती से लेकर मंदिर का रखरखाव तक बीएसएफ जवान करते हैं। ये राज्य का पहला मंदिर है, जिसमें सभी व्यवस्थाएं बीएसएफ के जिम्मे हैं। जी हाँ, जैसलमेर जिले में पाकिस्तान बॉर्डर के पास तनोट माता भारतीय सीमा सुरक्षा बल की आराध्य देवी हैं। तनोट माता के मंदिर के रखरखाव और आरती से लेकर मंदिर की पूरी जिम्मेदारी बीएसएफ के जवान ही संभालते है। मंदिर की साफ सफाई के अलावा मंदिर में होने वाली तीन समय की आरती बीएसएफ के जवान ही करते हैं। मातेश्वरी तनोट राय मंदिर में प्रतिदिन सीमा सुरक्षा बल के जवानों द्वारा की जाने वाली आरती में भक्ति भावना के साथ जोश का अनूठा रंग नजर आता है। बीएसएफ जवानों को जोश में आरती करते देख कोई भी खुद को झूमने से नहीं रोक पाता है।

जानिए तनोट माता मंदिर का इतिहास

इस मंदिर का इतिहास काफ़ी पुराना है। इस मंदिर परिसर में लगे शिलालेख के अनुसार जैसलमेर क्षेत्र के निवासी मामडियांजी की पहली संतान के रूप में विक्रम संवत् 808 चैत्र सुदी नवमी तिथि मंगलवार को भगवतीश्री आवड़देवी यानी तनोट माता का जन्म हुआ था। माता की 6 बहनें आशी, सेसी, गेहली, होल, रूप और लांग थीं। देवी मां ने जन्म के बाद क्षेत्र में बहुत से चमत्कार दिखाए और लोगों का कल्याण किया। इस क्षेत्र में राजा भाटी तनुरावजी ने वि.सं. 847 में तनोट गढ़ की नींव रखी थी। इसके बाद यहां देवी मां का मंदिर बनवाया गया और वे तनोट राय माता के नाम से प्रसिद्ध हुईं। ऐसी मान्यता है कि तनोट माता का मंदिर बलूचिस्तान स्थित माता हिंगलाज का ही रूप हैं। यहां देवी के दर्शन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

ये मंदिर सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों और जवानों के साथ देश प्रदेश के हजारों लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। जैसलमेर और इसके आसपास के लोगों के मन में देवी मां के लिए गहरी आस्था है। तनोट माता मंदिर में हर साल दो बार नवरात्र के दौरान मेला लगता है। इसके अलावा रोज सुबह शाम मंदिर में विधि पूर्वक आरती होती है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां आने वाले सभी भक्त मन्नत मांगकर एक रुमाल में कुछ रुपए बांधते हैं और रुमाल यहां रख जाते हैं। इसके बाद जब मन्नत पूरी हो जाती है तो भक्त देवी दर्शन के लिए आते हैं और रुमाल में रखे रुपए यहां चढ़ा देते हैं।

सिर्फ इतना ही नहीं इस मंदिर से जुड़ी एक और दिलचस्प कहानी है। दरअसल 1965 में भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था। युद्ध में पाकिस्तानी सेना की ओर से माता मंदिर के क्षेत्र में सैकड़ों बम गिराए थे, मगर हैरानी की बात ये कि मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ। मंदिर की इमारत वैसी की वैसी रही। जबकि मंदिर के आस पास के क्षेत्र को काफ़ी नुकसान पहुंचा था। कुछ लोग शायद इस बात पर यकीन ना भी करें इसलिए तनोट माता मंदिर परिसर में अभी भी पाकिस्तानी के कई बम आम लोगों के देखने के लिए रखे हुए हैं। ये वही बम हैं जो मंदिर परिसर में फेंके गए थे मगर ये सभी बम उस समय फटे ही नहीं थे। तब भारतीय सेना और यहां के लोगों ने इसे देवी का ही चमत्कार माना था। ये बात जब पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान को पता चली तो वो भी खुद माता तनोट के दर्शन करने से ख़ुद को नहीं रोक पाया था। 1965 के युद्ध के दौरान माता के चमत्कारों के आगे नतमस्तक हुए पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने भारत सरकार से यहां दर्शन करने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। करीब ढाई साल की जद्दोजहद के बार भारत सरकार से अनुमति मिलने पर ब्रिगेडियर खान ने न केवल माता की प्रतिमा के दर्शन किए, बल्कि मंदिर में चांदी का एक छत्र भी चढ़ाया जो आज भी मंदिर में है और इस घटना का गवाह है।
इसलिए आजतक लोगों में इस मदिर को लेकर गहरी आस्था है। यहां भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद में एक विजय स्तंभ का भी निर्माण किया गया है। ये स्तंभ भारतीय सेनिकों की वीरता की याद दिलाता है।

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