Smokeless Chulha – सेहत और पर्यावरण दोनो का रखेगा ध्यान

1 मई 2016 को जब मोदी सरकार ने उज्जवला योजना को लांच किया ताकि देश के हर घर में एलपीजी गैस से खाना बने और महिलाओं और बच्चों को खतरनाक धुएं से मुक्ति मिल सके। तब पीएम मोदी ग्रामीण महिलाओं के लिए एक सुपरहीरो बनकर उभरें। लेकिन एक प्रॉब्लम अभी भी रही और वो थी रीफिलिंग की जिसका खर्चा उठा पाना हर भारतीय परिवार के बस में नहीं है। एलपीजी भले ही दुनिया का सबसे ज्यादा लोकप्रिय रसोई गैस है। लेकिन इसकी कीमतों के कारण आम लोगों तक इसकी पहुंच आज भी उतनी नहीं है। कई परिवारों में एलपीजी गैस चूल्हा सिर्फ शोभा की वस्तु या एक स्पेशल ओकेजन पर यूज होने वाली वस्तु भर है।

भारत में अभी भी करीब 20 प्रतिशत घर ऐसे हैं जहां एलपीजी रसोई के काम में यूज नहीं होता है क्योंकि इन लोगों को अपनी कमाई का 25 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा इस पर खर्च करना होगा। ऐसे में सरकार का सुपर प्लान भी कही न कहीं फेल ही दिखा। एक ओर एलपीजी महंगा है तो पारंपरिक चूल्हे के लिए लकड़ियां और बॉयो प्रोडक्टस आसानी से उपलब्ध होते हैं। ऐसे में आज भी कई घरों में धुएं वाले चूल्हें ही यूज होते हैं। मसलन धुंए से बच्चों और महिलाओं की मौतों में बढ़ोतरी। ऐसे में एक ऐसे उपाय की जरूरत है जो चीप, एक्सेसिबल और इको फ्रेंडली यानी थ्री इन वन प्रोडक्ट हो।

बात अगर चूल्हें की करें तो इसका इतिहास बहुत ही पुराना है। कोई फिक्स ईयर नहीं पता है कि खाना बनाने के लिए इसे पहली बार कब बनाया गया। लेकिन इसका यूज आज भी हो रहा है। लेकिन ये लोकप्रिय चूल्हा जल्द ही इंसानों के लिए बीमारियों और मौत का कारण बन गया। इसकी बड़ी वजह थी इससे निकलने वाला धुआं। किसी ने इस धुंए को रोकने के लिए इस चूल्हें में कोई नया इनोवेशन नहीं किया बल्कि इसे सीधे एलपीजी से रिप्लेस कर दिया गया। जो थ्री इन वन तो नहीं था।

Smokeless Chulha – वी. जयप्रकाश ने किया बिना धुएं वाले चूल्हे का इनोवेशन

लेकिन केरल के एक शख्स ने इस बारे में कुछ करने की सोची और एक इनोवेशन किया। जिसमें पारंपरिक चूल्हे का धुंआ छूमंतर हो गया। यह कमाल करने वाले सुपरहीरो हैं केरल के वी. जयप्रकाश। जयप्रकाश कोई खूब पढ़े लिखे इंजीनियर नहीं हैं बल्कि ये एक डेली वेज पाने वाले वर्कर हैं। जयशंकर ने एक बार अपने घर में खाना पकाने के लिए यूज होने वाले चूल्हें में एक छोटा सा इनोवेशन किया और इसे चीप, एक्सेसिबल और इकों फ्रेंडली, यानी थ्री इन वन काम वाला चूल्हा बना दिया। फिर क्या था मेहनत करते रहे और बना दिया कम्यूनिटी चूल्हा।

उनका यह इनोवेशन सचमुच बड़े कमाल का है। इसमें कोई बाहरी खर्चा नहीं है जलाने के लिए आप लकड़ी, नारियल के छिलके या उपले तक यूज कर सकते हैं। लेकिन धुआं आपकी आंखों को छू भी नहीं सकेगा। जितना आश्चर्य यह जानकर हुआ उतना ही हैरान करने वाली बात इस चूल्हें का प्राइस रेट है। इस चूल्हे को आप केवल 3000 रूपये खर्च कर खरीद सकते हैं। एक और हैरान करने वाली बात यह है कि जितना पैसा एलपीजी से खाना बनाने में हम खर्च करते हैं उसका 5 गुणा भी पैसा आपको इसमें खर्च नहीं करना पड़ता। इसे एक उदहारण से समझ सकते हैं कि जयप्रकाश के इस चूल्हें पर अगर आपको 40 किग्रा चावल बनाना है तो बस 75 नारियल के छिलकों काफी हैं। जबकी एलपीजी पर इसके लिए आपको 10 किलोग्राम गैस खर्च करना होगा। अब खर्च का अंदाजा आप खुद से लगा सकते हैं।

Smokeless Chulha

जयप्रकाश को साइंस में पहले से ही इंट्रेस्ट था लेकिन 12वीं के बाद फाइनेंशियल दिक्कतों के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। लेकिन साइंस वाला दिमाग खुरापात तो करता ही है। उन्होंने अपने ही घर की महिलाओं को धुंए वाले चूल्हें से परेशान होते हुए देखा था। एक बार उनके साइंस वाले दिमाग में एक आइडिया आया और उन्होंने चुल्हे में एक छोटा सा पाइप लगाया, जो एक चिमनी की तरह काम करता। इस तरह से उन्हें शुरुआती सफलता मिली। इसके बाद जयप्रकाश ने इसपर और काम किया। इस दौरान ही एक घटना हुई और उनकी एक आंख डैमेज हो गई। लेकिन वे लगे रहे।

एजेंसी फॉर नॉन-कन्वेन्शनल एनर्जी ऐंड रूरल टेक्नॉलजी (एएनईआरटी) के साथ जुड़ने के बाद उनकी किस्तम खुली। एजेंसी के 10 दिनों के एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में उन्हें बहुत कुछ सिखने को मिला। इसी दौरान एक पेपर एड पढ़कर वे एक हॉस्पिटल पहुंचे जिसे अपना वेस्ट मेंटेरियल डंप करवाना था। इसके लिए उन्होंने एक स्टोव बनाया। जिसके लिए उन्हें 20 हजार रूपये मिलें। इसके बाद उन्होंने इसी के अधार पर चूल्हें के छोटे मॉडल बनाएं जो घरों में यूज हो सकते थे।

Smokeless Chulha- स्टेनलेस स्टील और कास्ट आयरन से तैयार हुआ ये चूल्हा

जयप्रकाश ने जो चूल्हा बनाया है वह स्टेनलेस स्टील और कास्ट आयरन से बना है। उनके इस स्टोव मॉडल में, जलने का काम दो स्तर पर होता है, यानि इसमें बर्निंग का टू-टियर सिस्टम हैं। जिसका मतलब है कम से कम धुंआ पैदा होना। पहले स्तर पर पहले सेरेमिक पाइप था लेकिन अब इसकी जगह मेटल लगा है। इसमें छेद होते हैं। ये छेद ही सबसे काम की चीज हैं। जब लकड़ी को जलाया जाता है तो दूसरा चरण शुरू होता है। इसमें लकड़ी के जलने से निकलने वाला धुंआ जिसमें अलग—अलग गैस होत हैं वे उपर आते हैं। ऐसे में इन छेदों के कारण इकठ्ठा हुई पर्याप्त ऑक्सीजन से मिलकर ये गैस फिर से जलते हैं। जिससे धुंआ कम होता है और कंपलीट कंबशन होता है।

जयप्रकाश ने बताया उनका ईको-फ्रेंडली स्टोव बच्चों और महिलाओं के लिए भी पूरी तरह से सुरक्षित हैं. इसे इस्तेमाल करने से उन्हें किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी. साल 1998 में केरल के ऊर्जा प्रबंधन केंद्र से उन्हें इस चूल्हें के लिए ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार और साल 2012 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की ओर से नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। जयप्रकाश का यह अविष्कार की आज बहुत डिमांड है। उनके इस एक अविष्कार ने कई बच्चों और महिलाओं को असाध्य बीमारियो से बचा लिया है।

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

कभी रिक्शा चलाकर करते थे गुजारा, आज बन गए दो स्कूलों के मालिक

Sat Oct 19 , 2019
Share on Facebook Tweet it Pin it Email जब इंसान कुछ करने का पक्का इरादा रख लेता है, तो कोई भी मुश्किल उसे रोक नहीं पाती। जब हमारा हौसला बुलंद होता है तो दुनिया का कोई भी लक्ष्य नामुमकिन नहीं रहता और ऐसे में जब इंसान पर विपरीत परिस्थिति आती […]
Gaji Jalauddin