Sindhutai Sapkal – हजारों बच्चों की एक माई।

अपने बचपन को याद करें तो  गुड्डे गुड्डियों का खेल, दादी नानी की कहानियां,  और स्कूल कॉलेज में हुई गलतियों को याद करके अक्सर हम लोग खिलखिला कर हंस देते हैं। लेकिन सिंधुताई  के लिए बीता बचपन कड़वे स्वाद को याद करने जैसा रहा है। उनको बचपन के नाम पर ऐसी जिम्मेदारिया मिली, जिसका हम अंदाजा भी नहीं लगी सकते। 14 नवंबर 1948 को जन्मीं सिंधुताई  के पिता उनको पढ़ाना चाहते थे लेकिन उनकी मां नहीं चाहती थी कि वे पढ़े। फिर भी उनके पिता उनके साथ खड़े रहे और सिंधुताई ने जैसे तैसे करके चौथी तक पढ़ाई पूरी की। उनकी मां ने इसके आगे उनको पढ़ने ना दिया। अब इस बच्ची के कंधों पर पूरा घर संभालने की बड़ी जिम्मेदारी भी लाद दी गई। सिंधुताई की शादी एक ऐसे आदमी से कर दी गई जो उनसे उम्र में बहुत बड़ा था। 10 साल की उम्र में उनकी शादी 30 साल के व्यक्ति से कर दी गई। उनका पति उनको गालियां देता और मारता था।

मां तो मां होती है। चाहे जन्म देने वाली हो चाहे पालने वाली। मां की ममता का आंचल आसमान से भी बड़ा होता है। इसकी जीती जागती मिसाल हैं सिंधुताई सपकाल। सिंधुताई सपकाल समाज में ठुकराई गई वो लड़की है, जिसे नाम दिया गया था ‘चिंधी’। आसान भाषा में बोलें तो चिंधी का मतलब है कपड़े का फटा टुकड़ा जिसकी कोई जरूरत ना हो। लेकिन साहसी सिंधुताई की उड़ान बहुत लम्बी निकली । लगभग 1400 अनाथ बच्चों को गोद ले चुकी ये मां सबका पेट भर रही है। 70 साल की सिंधुताई आज ‘माई’ नाम से जानी जाती है। सिंधुताई के परिवार में  207 जमाई है। उनकी 36 बहुएं और 1000 से अधिक पोते-पोतियां हैं। इतना बड़ा परिवार तो आजतक किसी का भी नहीं हुआ होगा। उनके गोद लिए हुए कई बच्चे वकील और डॉक्टर हैं। उनकी अपनी बेटी भी अनाथालय चला रही हैं।

Sindhutai Sapkal –  वो सड़कों पर भीख मांगती है ताकि अनाथ बच्चों का पेट भर सकें

शादी के बाद वो मुंबई के वर्धा जिले के जंगली इलाके में पति के साथ रहने लगी। जंगल में काम करने वाले वन अधिकारी और इलाके के जमींदार पीछड़ी जात की औरतों के साथ बदसलूकी करते थे। सिंधुताई महिलाओं पर हो रहे इस शोषण को बर्दाश्त नहीं कर सकी और उन्होनें इन औरतों के हक के लिए लड़ना शुरू कर दिया। गांव के सभी ठेकेदार और अधिकारी उनसे गुस्सा हो गए। उस समय वे गर्भवति थी। अपने अपमान का बदला लेने के लिए एक ठेकेदार ने गांव में अफवाह फैला दी कि सिंधुताई के पेट में उसका बच्चा है। जिसके कारण  सिंधुताई को समाज से अलग कर दिया गया। अब उनकी शादीशुदा ज़िंदगी बद से बदतर हो गई। समाज में अपने सम्मान को वापस बनाने के लिए उनके पति ने गर्भ के नौवें महीने में उन्हें छोड़ दिया।

एक गौशाला में बच्चा पैदा करने के बाद सिंधुताई अपने मायके वापस चली गई, लेकिन उनके मायके वालो ने उन्हे अपनाने से साफ इंकार कर दिया, और घर में आने ही नही दिया। इसके बाद सिंधुताई ने गाड़ियों में और सड़कों पर भीख मांगना शुरू कर दिया। वह अपने और अपनी बेटी के हक के लिए लड़ती रही। उन्होंने ट्रेन स्टेशन,गौशाला और कब्रिस्तान को अपना घर बना लिया।

सिंधुताई जिन मुश्किलों से लड़ रही थी उनसे अक्सर इंसान टूट जाता है। सिंधुताई को अगर कभी कोई सहारा मिला भी तो वो खुद का ही। उनको ऐसा कोई कंधा नहीं मिला जिस पर वो सर रखकर रो सके , अपना अकेलापन बांट सके।  सिंधुताई के साथ तो इतना कुछ हो चुका था कि एक टाईम ऐसा आ गया कि उन्होने suicide करने का फैसला तक कर लिया। लेकिन स्वाभिमान की पककी सिंधुताई ने उस अकेलेपन से लड़कर एक बार फिर चुनौती को कबूला। इस बार वो लड़ रही थी उस बच्ची के उज्जवल भविष्य की खातिर।

Sindhutai Sapkal –  राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से मिले है 270 पुरस्कार

भीख मांगते हुए सिंधुताई आ पहुंची थी महाराष्ट्र के अमरावती जिले में। जहां बाघ संरक्षण परियोजना के कारण 84 आदिवासी बेघर हो चुके थे। यही वह जगह थी जहां सिंधुताई का अच्छा वक्त उन्हें पुकार रहा था। अब सिंधुताई को लड़ने के लिए एक और मकसद मिल गया। निर्भय सिंधुताई ने आदिवासियों के पुनर्वास के लिए वन मंत्री से गुहार लगाई। एक और जहां वो आदिवासियों के पुनर्वास के लिए लड़ रही थी वही सिंधुताई ने धीरे धीरे अनाथ बच्चों और औरतों को पढ़ाना भी शुरू कर दिया। अपनी बच्ची के साथ साथ उन बच्चों के लिए भी खाना और भीख मांगने चली जाती। वन मंत्री भी उनके साहस के आगे झुक गए और उन आदिवासियों के पुनर्वास के लिए उपयुक्त  व्यवस्था की। सालों की मेहनत के बाद सिंधुताई ने चिकलदरा में अपना पहला आश्रम खड़ा किया।

सिंधुताई सपकाल को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से लगभग 270 पुरस्कार मिले हैं। एक मराठी फिल्म “मी सिंधुताई सपकाल” भी उनकी बायोपिक के रूप में 2010 में रिलीज हुई थी। उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में कई संगठनों की स्थापना की है जो हजारों अनाथ बच्चों को शिक्षा और आश्रय देते  हैं।  अनाथों और महिलाओं जिन्हें समाज नहीं अपनाना चाहता था उनके लिए सिंधुताई आदर्श बन गई। उनका मानना है कि वंचित बच्चे का मतलब वंचित राष्ट्र है।

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