काँच की बोतल में दूध का सफर, लोगों को सेहतमंद बनाना सपना

चुनौतियां कभी किसी आसमान से कम नहीं होती, कुछ होते हैं जो आसमान से ऊपर उठ अपनी पहचान को नया रूप दे देते हैं…तो कुछ आसमान के सामने घुटने टेक हार मान लेते हैं. जो इंसान जिंदगी में आई मुश्किलों से भिड़कर आगे निकल जाते हैं. फिर उन्हीं का मिसाल लोग अपने बच्चों से लेकर हर इंसान तक को देने लगते हैं. आज महिलाओं की बात होती है, महिलाओं से कहा जाता है कि, वे हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर समाज में चले. लेकिन कहीं न कहीं ये समाज ही उन्हें ठीक तरह से अपना नहीं पाता. क्योंकि सोचने वाली बात है न…अभी भी घर से निकलने वाली पत्नी, बेटी, बहू पहले सभी के लिए नाश्ता बनाती है, लंच रखती है. फिर कहीं जाकर बाहर निकलती है. हालांकि इंदौर शहर की रहने वाली पल्लवी व्यास की दास्तां शायद इन सबमें सबसे अलग है…तभी तो वो एक अनोखी पहचान और मिसाल बन गई हैं.

पल्लवी व्यास,शांता फार्म

पल्लवी की ये कामयाबी की कहानी, जिसका ताना-बाना पल्लवी ने खड़ी अपने दम पर बुना है. आज यही वजह है कि, पल्लवी खुद लोगों के लिए उदाहरण बन गई हैं. हालांकि उदाहरण बनने से पहले पल्लवी ने अपनी जिंदगी में वो सब देखा जो किसी भी सफल कहानी में होती है. बचपन से लेकर शादी फिर वही गृहस्थ संभालने वाली पल्लवी एक समय था, जब महज़ अपनी दिनचर्या के साथ, इसे ही वो खुद अपनी पहचान बना चुकी थी. लेकिन जिंदगी में आई अचानक एक घटना ने, पल्लवी को इस तरह बदला कि, आज वो एक एंटरप्रेन्योर होने के साथ-साथ एक अनोखी पहचान बन चुकी हैं. जिनकी मिसाल आज लोगों के साथ-साथ सारा जमाना तक देता है. 

हर कोई जानता है कि, किसी डेयरी फार्म की शुरूवात करना कितना चुनौतीपूर्ण होता है. क्योंकि इस काम को पुरुषों का कार्यक्षेत्र माना जाता है. हालांकि पल्लवी व्यास ने लीक से हटकर शांता फार्म की नींव रखी….न सिर्फ नींव रखी, उसको ऊँचाइयों के सबसे ऊंचे आयाम पर ले गई. यही वजह है कि, समाज के साथ लोगों की मानसिकता को पल्लवी ने बदल ड़ाला है. इन सबके अलावा पल्लवी ने देश की लाखों महिलाओं की तरक्की के लिए एक अलग राह खोल दी. साथ ऐसे सैकड़ों महिलाऐं हैं जिन्हें पल्लवी अपने यहां सशक्त कर रही हैं. 

लेकिन शुरुवाती सफर में पल्लवी ने भी वो सब किया और देखा, जो एक घरेलू महिला करती है. जहां हमारे समाज में महिलाऐं अलग-अलग सांचों में ढ़लकर अपना रूप बदल कभी पत्नी, बेटी, बहू, सास, दोस्त, बहन का किरदार निभाती है. वहीं इन सभी रूपों में पल्लवी भी ढ़ली. लेकिन उन्होंने इन सबसे बीच अपना एक अनोखा हक भी बनाया, मालिकाना हक…

लेकिन उनकी जिंदगी की असल शुरूवात हुई, उस समय जिस समय उनकी सास को ब्लड कैंसर हुआ. इस बीच पल्लवी और उनके पति एडवोकेट संजय व्यास ने मिलकर अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. ताकि मां का इलाज हो सके. हालांकि डॉक्टर उनकी मां को बचा नही सके. ये घटना पल्लवी के परिवार को इस तरह लगी. इसने सब कुछ बदल दिया. क्योंकि ब्लड कैंसर के अध्ययन के दौरान पल्लवी को पता चला कि, उनकी मां को कैंसर होने की सबसे बड़ी वजह दूध-सब्जी जैसे खाने-पीने के सामान से हुई. साथ खाने-पीने के सामान में होने वाले इस्तेमाल होने वाले घातक केमिकल और पेस्टीसाइड से ब्लड़ कैंसर हुआ. ये एक वजह थी कि, पल्लवी व्यास को भरोसा इन सभी चीजों से उठ गया. हालांकि मजबूरी के चलते उस समय वो कुछ नहीं कर सकीं. तब पल्लवी की उम्र 35 साल थी. हालांकि इस बीच पल्लवी और उनके परिवार को खेती के बारे में न तो जानकारी थी और न ही वो कोई किसान थे. साथ में वो अपने बेटी और बेटी को भी बेहतर फ्यूचर देना चाहती थी. जिसके चलते वो उन्हें बेहतर एजुकेशन देना चाहती थी. लेकिन मां के कैंसर के चलते उन्हें अपने पूरे परिवार की चिंता होने लगी, और ये चिंता पूरे परिवार के साथ-साथ हर इंसान में बदल गई.

यही वजह रही की पल्लवी के दिमाग में आया कि, क्यों न हम कुछ ऐसा काम करें…जिससे परिवार के साथ-साथ लोगों को भी शुद्ध दूध और हाइजैनिक सब्जी खाने में दी जा सके. बस इसी सोच को साकार करने के लिए पल्लवी व्यास ने साल 2016 में अपने पति की मदद से अपनी मां के नाम पर शांता फार्म की नींव रखी. इस दौरान उन्होंने सबसे पहले लोगों तक पहुंचने वाले दूध को कांच की बोतल में भेजना शुरू किया, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया.

वहीं पल्लवी पुराने दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि, वो वक्त 2007-2009 के बीच का था. जिसमें मेरे छोटे बेटे की डिलेवरी के समय ही मेरी सांस हमारे साथ रहने इंदौर आई थी. तभी मेरी मां को कैंसर डिटेक्ट हुआ था, उस समय तक मेरा बेटा एक साल का हो चुका था. यही वजह थी कि, बेटी के साथ मां और पूरे परिवार की जिम्मेदारियां मुझपर आ गई थी.  मैंने सबको संभालने की कोशिश कि, संभाला भी. लेकिन घर में तब अचानक दुखों का पहाड़ टूट गया और मैं यही वजह थी की डिप्रेशन तक में चली गई थी. इस दौरान की चुनौतियों ने हमारे परिवार के साथ मुझको इस तरह जकड़ा की सब तरफ अंधेरा छा गया था. लेकिन धीरे-धीरे फिर उजाला भी हुआ. क्योंकि मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी.

क्योंकि जिस समय मैंने शांता फार्म की नींव डाली थी. उस समय मेरी उम्र चालीस के आस पास थी. उम्र के इस पड़ाव में इस कंपनी को शुरू कर लीक से हटना मेरे लिए भी किसी जोखिम से कम नहीं था. हालांकि दूसरी तरफ मुझे समाज में रह रहे लोगों के साथ-साथ अपने परिवार को शुद्ध खाद्य सामग्री देनी थी. इन सबके साथ पल्लवी के साथ सबसे बड़ी परेशानी ये थी कि, उन्होंने कभी भी खेती-बाड़ी के बारे में पढ़ा नहीं था. क्योंकि वो बीएससी और टैक्सटाइल केमिस्ट्री और एमबीए की छात्रा थी. जिससे उन्हें इसके बारे में बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी.

यही वजह रही कि, इस क्षेत्र में जाने से पहले पल्लवी व्यास ने खुद को तैयार किया. उन्होंने देश के बड़े फार्म्स में जाकर प्रोसेस स्टडी की साथ ही उन्होंने बड़ी बड़ी डेयरी फार्म पर जाकर उन्हें देखा. इस दौरान उन्होंने वहां गायों की देखभाल से लेकर सभी जानकारियां ली और साथ ही फार्मिंग के बारे में जानकारी ली. उसके बाद उन्होंने अपने एडवोकेट पति संजय व्यास के साथ मिलकर अपने फार्म की शुरुवात की.

पल्लवी व्यास,शांता फार्म

हालांकि इसमें भी पल्लवी के सामने, काफी समस्याऐं थी, क्योंकि पल्लवी और उनके परिवार के पास खुद की जमीन नहीं थी. पल्लवी कहती हैं कि, “उस समय हमारे पास एक आइडिया था. एक ऐसा आइडिया जिसके जरिए हम लोगों को शुद्ध दूध उपलब्ध कराना चाहते थे. इसलिए मेरे पति ने हमारे रिश्तेदारों और बैंक की मदद लेकर इंदौर शहर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव जोकि बड़वाह-महेश्वर के बीच में मौजूद है, वहां जमीन ली. वो एक पहाड़ी इलाका है. जहां पर हमने पहले वहां की मिट्टी बराबर की ताकि वहां का रासायनिक प्रभाव खत्म हो जाए. इसके बाद हमने अपनी गायों के लिए ऑर्गेनिक चारा भी उगाने की शुरुवात की और मुंबई की तर्ज पर हमने प्रदेश का पहला मैकेनाइज्ड शांता डेयरी फार्म की शुरुवात की.”

शांता फार्म मैकेनाइज्ड आधुनिक सुविधाओं से लैस

इस फार्म की खासियतों की मानें तो, यहां बिदाउट ह्यूमन टच के आटोमेटेड तरीके से गायों का दूध निकालने के साथ-साथ, फार्म में चौबीसों घंटे वेटनरी डॉक्टर तक मौजूद रहते हैं. साथ ही बीमार गायों का दूध नहीं निकाला जाता. इस फार्म पर हर तरीके से गायों का ख्याल रखा जाता है. इसके अलावा गायों से दूध निकालने के पहले उन्हें नहलाया जाता है. यहां तक की ये गाय केवल ऑर्गेनिक चारा ही खाती हैं.

यही वजह है कि, आज के समय में जहां शांता फार्म अपनी अलग पहचान बना चुका है. वहीं पल्लवी व्यास ने समाज को बेहतर खाद्य पदार्थ देने के अलावा गायों की नस्ल सुधारने का भी मानों बीड़ा उठाया हुआ है. क्योंकि इन्होंने अपने उसी 50 एकड़ के फार्म पर अलग अलग तरीके के उन्नत किस्म के बुल तक पाले हुए हैं, ताकि उनसे ब्रीडिंग करवाई जा सके.

पल्लवी व्यास,शांता फार्म

वहीं शुरुवात के समय की मानें तो, पल्लवी ने इस फार्म की शुरुवात महज़ 6 गिर नस्ल की गायों के साथ की थी. जिसमें वो लोगों को बेहतर क्वालिटी का दूध मुहैया करा रही थी. हालांकि आज के समय में पल्लवी के यहां 200 से ज्यादा गाय हैं. जिसमें गिर, राठी, निमाड़ी, साहीवाल, हॉलिस्टियन फ्रीशियन और भी किस्में शामिल हैं. इन गायों से पल्लवी के फार्म पर हर रोज 1000 लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन होता है. जिसको वो कांच की बोतल में पैक कर हर रोज सप्लाई करवाती हैं.

पल्लवी का मानना है कि, गाय हमारी माता है और अगर हम ही अपनी मां का ख्याल नहीं रखेगें तो भी हमें बेहतर दूध नहीं दे पाएगी. इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम इनकी देखभाल करें.

लीक से परे सोचा दुनिया ने पहचाना-पल्लवी व्यास

लोगों की बेहतरी को सोचने और उन्हें बेहतर खाद्य पदार्थ मुहैया कराने के चलते ही, आज दुनिया पल्लवी को सलाम कर रही है. तभी तो अब तक पल्लवी को इंडिया एसएमई फोरम, नारी शक्ति अवॉर्ड, वुमेन ऑफ इंदौर-2018, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नारायणी नम: व इंडो ग्लोबल एमलोगोएमई चैंबर के, वुमेन एंड बिजनेस अवार्ड के अलावा तमाम तरह के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. इन सबके अलावा भी पल्लवी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. जिन्होंने उन्हें इंटरनेशनल लेवल से लेकर इंटरनेशनल लेवल तक पहचान दिलाई है.

यही वजह है कि, आज के समय में पल्लवी नारी शक्ति की अनोखी मिसाल कही जाती हैं. उनकी मेहनत और उनका ज़ज्बा ही है कि, आज के समय में लोग उन्हें अहमियत देते हैं.

Indian

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