Shaniwar Wada – इस महल से आती है बच्चों के रोने की आवाज

भारत में कई किले पुरानी इमारतें आज भी सीना ताने खड़ी हैं जो आज भी अपना इतिहास कहती हैं। भारत में कई पुराने और रहस्यमयी किले हैं। महाराष्ट्र के पुणे में भी एक मशहूर किला है, जो मराठा साम्राज्य की शान कहा जाता है। इस किले को ‘शनिवारवाडा’ के नाम से जाना जाता है। इस किले की नींव शनिवार के दिन रखी गयी थी, इसलिए इसका नाम ‘शनिवारवाडा’ पड़ गया।

हर रात इस महल के अंदर से बच्चों के रोने और चिल्लाने की आवाज़ें आती है। पूर्णिमा की रात महल और भी ज्यादा डरावना और भुतहा लगता है। इसी कारण ये महल भुतहा जगहों में शामिल है। यहां सुबह से शाम तक तो पर्यटक आ सकते है, लेकिन शाम होने के बाद इस महल को बंद कर दिया जाता है। उसके बाद ना यहां किसी को आने दिया जाता है और ना ही यहां आने की गुस्ताख़ी कोई कर पाता है।

Shaniwar Wada – जिसे कहा जाता है मराठा सम्राज्य की शान

वर्ष 1746 ईसवी में बाजीराव ने अपने महल शनिवारवाडा का निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि बाजीराव की मृत्यु के पश्चात शनिवाडा में अधिकार को लेकर लड़ाई-झगड़े शुरू हो गए थे। नारायण राव, नानासाहेब पेशवा के सबसे छोटे बेटे थे। अपने दोनों भाइयों की मौत के बाद नारायण राव को पेशवा बना तो दिया गया लेकिन उम्र काफी कम होने की वजह से सत्ता रघुनाथ राव और उनकी पत्नी आनंदी को ही सौंपी गई।

रघुनाथ राव यानि राघोबा और उनकी पत्नी को सत्ता की भूख थी। वो साम्राज्य की देखभाल नहीं उसे हथियाने के सपने देख रहे थे। दोनों कुछ भी करके नारायण राव को अपने रास्ते से हटाना चाहते थे। मगर नारायण राव को भी अपने चाचा की मंशा पता चल गई। उन्होंने अपने चाचा रघुनाथराव को महल के अंदर नजरबंद करवा दिया। जिसके बाद रघुनाथ राव और उनकी पत्नी ने भील सरदार, सुमेर गर्दी को पत्र लिखकर नारायण राव की हत्या करने का हुक्म जारी कर दिया।

Shaniwar Wada – महल से आती हैं ‘काका माला वचावा’ चीखनें की आवाज़ें

सुमेर सिंह और नारायण राव के संबंध पहले से ही अच्छे नहीं थे, इसलिए सुमेर सिंह ने नारायण राव पर जरा भी रहम नहीं बरता, उसने शनिवारवाडा में घुस कर नारायण राव पर हमला कर दिया। नारायण राव अपनी जान बचाने के लिए महल के कोने-कोने में भागे, “काका माला वचावा” चिल्लाते हुए वो अपने चाचा को पुकारते रहे, लेकिन मदद के लिए कोई नहीं आया और इस तरह से केवल 18 साल की उम्र में ही नारायण राव मारे गए।

जिसके बाद 1828 ई. में इस महल में आग लग गई थी और महल का बड़ा ह‌िस्सा आग की चपेट में आ गया था। ये आग कैसे और क्यों लगी, ये बात आज तक रहस्य बनी हुई है। कहते है जब महल में आग लगी थी, उस वक्त वहां कुछ बच्चों की आग में जलने से मौत हो गई थी। लेकिन इस बात को दबा दिया गया था।

कहा जाता है कि महल में राजकुमार की आज भी आत्मा भटकती है। अंधेरी रातों में महल में से ‘काका माला वचावा’ चीखने की आवाज़ें आती है। आज भी राजकुमार बदले की आग में झुलस रहे हैं। आज भी उस मौत का दर्द लिए उनकी आत्मा वहां रोती बिलखती भटकती रहती है। तभी तो अन्धेरा होते ही शनिवारवाड़ा में कोई नहीं जाता।

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