सरदार उधम सिंह, जिन्होंने जलियांवाला हत्याकाण्ड का बदला इंग्लैंड जाकर लिया

भारत को आजादी दिलाने वाले अनेकों क्रांतिकारियों के नाम अक्सर हमारी जुबां पर रहते हैं. अनेकों क्रांतिकारियों की कहानियां हमें रटी रटाई हैं. उन्होंने कैसे अंग्रेजों से मोर्चा लिया, कैसे देश को आजाद कराने की खातिर अपनी जान गंवा दी सब कुछ. लेकिन हमारे भारतीय इतिहास में एक ऐसा नाम भी रहा है. जिसने अपनी जान न तो भारत में गंवाई, न ही किसी सत्याग्रह में शामिल हुआ मगर उनकी शौर्यगाथा पूरा भारत जानता है.

जिसकी कहानी शुरू हुई थी 1919 में, बैसाखी वाले दिन जहां अमृतसर के जलिया वाला बाग में हजारों की संख्या में लोग जमा हुए थे ताकि अंग्रेजों के लाए रॉलेट एक्ट का विरोध कर सकें. वहीं इसी एक्ट के तहत ही अंग्रेजों ने कांग्रेस के सत्य पाल और सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया था. ऐसे में अंग्रेजों के खिलाफ हजारों लोग बैसाखी के दिन इकट्ठा होकर शांति से प्रोटेस्ट कर रहे थे. उसी समय जनरल डायर ने अपनी फौज को आदेश दिया था कि, वहां इकट्ठा हुए निहत्थों को गोली से भून दिया जाए. इस बीच पार्क में मौजूद प्रदर्शनकारियों को न तो जाने की अनुमति दी गई थी और न ही कोई वार्निंग. जनरल डायर ने बस आदेश दिया था वहां मौजूद लोगों को गोलियों से भून देने का, साथ ही पार्क में मौजूद इकलौता एक्जिट गेट भी पूरी तरह सील कर दिया गया था, ताकि कोई वहां से भाग न सके. 

उस नरसंहार में जहां अनेकों भारतीय क्रांतिकारी शहीद हो गए. वहीं पूरा देश इस नरसंहार से गुस्से में था. उस दिन बंदूक से निकली गोलियों ने न तो बच्चे की फ्रिक कि, न किसी बड़े बुजुर्ग की. बस मंजर कुछ यूं था की पार्क में मौजूद सभी लोगों को गोलियों से भून दिया जाए. ऐसे में अपनी जान बचाने की खातिर जहां अनेकों लोग वहां मौजूद कुएं में कूद गए तो न जानें कितने ही लोग दीवार फांद कर भागने की कोशिश में मारे गए. घटना पूरे देश को आहत करने वाली थी. मगर इस बीच कोई सबसे ज्यादा आहत हुआ तो वो था “सरदार उधम सिंह”.

इस नरसंहार को देखकर सरदार उधम सिंह ने अपने अंदर ही अंदर ऐसा प्रण ले लिया था. जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो.

सरदार उधम सिंह

उधम सिंह
उधम सिंह

26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में पैदा हुए. सरदार उधम सिंह के पिता का नाम सरदार तेहाल सिंह था. जो उस समय जम्मू के उपल्ली गांव में एक रेलवे चौकीदार थे. उधम सिंह के पैदा होने पर उनके पिता ने उनका नाम रखा शेर सिंह, जबकि इन्हीं के बड़े भाई का नाम मुख्ता सिंह रखा गया. हालांकि बचपन के शुरूवाती समय में ही उधम सिंह ने अपना माँ को खो दिया और ठीक सात साल की उम्र आते-आते उधम सिंह ने अपने पिता को भी खो दिया. जिसके चलते उधम और उनके भाई अनाथ हो गए. माता-पिता को खो देने के बाद उन दोनों को अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में भेज दिया गया ताकि उनकी देखभाल हो सके.

यहां पहुंचने के बाद दोनों ही भाईयों को वहां मौजूद लोगों ने नया नाम दे दिया. मुख्ता सिंह को लोगों ने साधु सिंह कहना शुरू कर दिया. जबकि शेर सिंह को लोगों ने उधम सिंह कहना शुरू कर दिया. ऐसे में हमेशा से उधम सिंह भारतीय समाज की एकता पर जोर देते थे. यही वजह रही कि, उधम सिंह ने अपना नाम बदलकर “राम मोहम्मद सिंह आजाद” कर लिया. जिसकी वजह थी, इस नाम में सभी तीन प्रमुख धर्मों के प्रतीक का होना.

हालांकि अपने मैट्रिक के पास करने के पहले ही उधम सिंह ने अपने बड़े भाई साधु सिंह को 1917 में खो दिया. अकेले बचे उधम सिंह ने साल 1919 आते-आते अनाथालय भी छोड़ दिया.

उधम सिंह की प्रतिज्ञा

उधम सिंह
उधम सिंह

13 अप्रैल 1919, जिस रोज भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन था. उस दिन को उधम सिंह ने अपनी आंखों से जनरल डायर की करतूत देखी थी. हजारों भारतीय क्रांतिकारियों की लाश देखी थी. साथ ही उन्होंने खून से सनी दिवारें देखी थी. यही वजह थी कि, उन्होंने उसी समय जनरल डायर और उस समय के तत्कालीन पंजाब के गर्वनर माइकल ओ ड्वायर को मारने का फैसला ले लिया था.

ऐसे में जहां एक ओर देश के भारतीय क्रांतिकारी एक-एक कर देश को आजाद कराने की खातिर अपनी जान गंवा रहे थे. वहीं दूसरी ओर उधम सिंह दोनों लोगों से बदला लेने की खातिर चंदा इकट्ठा कर रहे थे. इस बीच उधम सिंह भारत के बाहर चले गए. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा कर डाली. ताकि पैसे इकट्ठा किए जा सकें. जिस समय जनरल डायर और माइकल ओ ड्वायर को अंग्रेजी हुकुमत ने वापिस बुला लिया. उस समय अपनी प्रतिज्ञा से प्रतिबद्ध उधम सिंह हर रोज उन्हें मारने की खातिर दिन रात काम कर रहे थे. ऐसे में जनरल डायर की बीमारी के चलते मौत हो गई उधम सिंह की प्रतिज्ञा का एक अंश खत्म हो गया. जिसके चलते उन्होंने अपना पूरा फोकस माइकल ओ ड्वायर को मारने पर लगा दिया.

भगत सिंह के फैन थे, उधम सिंह

देश की खातिर अपनी जान गंवाने वाले भगत सिंह उस समय पूरे देश की पहली पंसद थे. शायद यही वजह थी कि, उधम सिंह भी भगत सिंह को बहुत पंसद करते थे. यहां तक की उधम सिंह उन्हें अपना गुरु मानते थे. इसके साथ ही राम प्रसाद बिस्मिल को भी उधम सिंह अपना आर्दश मानते थे. साल 1935 में जिस समय उधम सिंह कश्मीर गए थे. उस समय उन्हें भगत सिंह के पोट्रेट के साथ देखा गया था. वहां से लौटने के कुछ ही समय बाद उधम सिंह विदेश चले गए.

माइकल को मारने वाले उधम सिंह

वक्त ने जहां एक तरफ देश में क्रांतिकारी गतिविधि बढ़ा दी थी. वहीं जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड लोगों की आंखों में धूमिल हो चुका था. हालांकि उधम सिंह की आंखों में फिर भी वही प्रतिज्ञा घूम रही थी. 1927 में जिस समय ब्रेन हेमरेज के चलते जनरल डायर की मौत हो गई. उस समय, उनके निशाने पर हत्याकाण्ड के दौरान पंजाब के गवर्नर रहे माइकल फ्रेंसिस ओ ड्वायर आ गए. जिन्होंने इस हत्याकाण्ड को उचित ठहराया था. ऐसे में इंग्लैण्ड पहुंचे उधम सिंह ने उन्हें मारने का दिन चुना 13 मार्च 1940. रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हॉल में उस रोज बैठक होने को थी. जहां माइकल ओ ड्वायर स्पीकर के तौर पर भाषण देने वाला था. इस बैठक में शामिल होने की खातिर उधम सिंह भी वहां पहुंचे.

वर्षों से अपनी आंखों में प्रतिज्ञा को पालने वाले उधम सिंह ने उस समय एक मोटी किताब अपने हाथ में ले रखी थी. और इस किताब में था माइकल ओ ड्वायर की मौत का समान. उधम सिंह ने उस किताब के अंदर रिवॉल्वर के शेप में कंटिग की थी. जिसमें वो अपनी रिवॉल्वर आसानी से छिपा सकें. बैठक शुरू होने के बाद जिस समय माइकल ओ ड्वायर आए तो ठीक दीवार के पीछे खड़े हुए उधम सिंह ने उन पर दो गोलियां चला दी. दोनों गोलियां लगने के बाद माइकल की तुरंत उसी सभा में मौत हो गई. और उधम सिंह की वर्षों की प्रतिज्ञा पर पूर्ण विराम लग गया. इस मौत ने पूरी दुनिया को बता दिया कि, भारतीय वीर अपनी प्रतिज्ञा कभी नहीं भूलते.

इस दौरान उधम सिंह ने उस सभा से भागने की कोशिश तक नहीं कि, उन्हें अरेस्ट कर लिया गया. बाद में उन पर मुकदमा चलाया गया. उनकी कोर्ट में पेशी की गई. जहां जज ने उनसे सवाल किया की उन्होंने वहां मौजूद अन्य लोगों में से केवल ओ ड्यवायर को ही क्यों मारा?

उधम सिंह ने जवाब दिया की वहां महिलाएं थी. हमारी संस्कृति में महिलाओं पर हमला कर उन्हें मारना पाप है.

उधम सिंह के आखिरी दिन

उधम सिंह पर जहां अंग्रेजी कोर्ट ने मुकदमा चलाया साथ ही उन्हें दोषी भी ठहराया. यही वजह रही कि, हत्या में दोषी उधम सिंह को 4 जून 1940 में दोषी करार ठहराया गया. और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई. इसी तरह भारतीय इतिहास का एक क्रांतिकारी हमेशा के लिए इतिहास में अमर हो गया.

बाद से साल 1974 में अंग्रेजों ने ब्रिटेन में मौजूद उधम सिंह के अवशेषों को भारत को सौंप दिया. एक तरफ अंग्रेजों के घर में घुसकर जलियांवाला हत्याकाण्ड का बदला लेने वाले उधम सिंह अपनी वीर गाथा लिख चुके थे. वहीं आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी उनकी तारीफ कर कहा था कि, ‘माइकल ओ ड्वायर की हत्या पर अफसोस है. हां मगर ये बेहद जरूरी थी.’

जिस समय भारत को आजाद कराने की खातिर भगत सिंह फांसी के फंदे पर झूलकर शहीद-ए-आजम बने, ठीक उसी तरह ही उधम सिंह को भी शहीद-ए-आजम कहा गया. आज भले ही ये बाद इतिहास के किसी पन्ने में मौजूद हो. हालांकि उधम सिंह की ये वीरगाथा हर भारतवासी के दिल में है.

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