Ritesh Agarwal : 23 साल की उम्र में कैसे बनाई करोड़ों की कंपनी OYO

जिनके अंदर सफल होने की हसरत हो और संघर्ष का हौसला जीवन में कभी भी कुछ भी उनके लिए असंभव नहीं रहता। 25 साल के रितेश अग्रवाल की सफलता की कहानी सुनने के बाद भी कुछ ऐसा ही लगता है। सफ़ल होने के लिए जो पहली सीढ़ी मानी जाती है वो है शिक्षा वाकई में बिना डिग्री हासिल किए आपको नॉलेज कैसे होगी। कुछ ऐसा ही रितेश के साथ भी हुआ जब रितेश ने कॉलेज की पढ़ाई करने से अपने घरवालों को मना कर दिया। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वो एक दिन अरबपति बन जाएगा। दुनिया में ऐसे बहुत कम ही लोग हुए हैं जिन्होंने कम उम्र में भेड़चाल का हिस्सा बनने से इंकार करके अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्ही में से एक हैं रितेश अग्रवाल। ये ‘ओयो रूम्स’ के फाउंडर हैं। वही ओयो जो आजकल आपकी ज़िंदगी का हिस्सा सा बन गया है अगर आप कहीं जाते हैं और रूम बुक करते हैं तो।

Ritesh Agarwal : एक मामूली लड़के से OYO के मालिक बनने तक की कहानी

रितेश के पापा का एक छोटा सा बिज़नस हैं और रितेश की माँ एक हाउसवाइफ हैं। असल में ये मारवाड़ी परिवार से हैं। इनके परिवार की पीढियां सदियों से व्यापार और कारोबार करती आ रही थीं। इसलिए इनके माता पिता चाहते थे कि ये भी कोई दुकान खोल लें। रितेश ने अपनी इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई स्केयर्ड हार्ट स्कूल से पूरी की और आगे की पढाई पूरी करने के लिए रितेश ने दिल्ली के इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नस एंड फाइनेंस में एडमिशन लिया। यहां तक तो सबकुछ वैसा ही था जैसा सबके साथ होता है मगर उन्होंने बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी। मगर घरवालों को उनके इस फैसले से बहुत गुस्सा आया ख़ुद रितेश को भी समझ नहीं आया कि वो क्या कर रहे हैं। इसलिए कुछ साल पहले रितेश ओडिशा में एक छोटे से कस्बे में सिम कार्ड बेचते लगे लेकिन आज वो किस मुक़ाम तक पहुंचे हैं ये बताने की जरूररत है नहीं।

Ritesh Agarwal

Ritesh Agarwal : एक छोटे से आईडिया ने दी रितेश के सपनों के पंखो को उड़ान

जब भी कोई अपना बिज़नेस करने की बात करता है और किसी से सलाह लेता है तो ज्ञान बांटने वाले सबसे पहले यही कहते हैं कि बिज़नस करने के लिए बिज़नस माइंड होना जरूरी हैं और बिज़नस का एक्सपीरियंस भी होना जरूरी हैं। या फिर वही लोग ज्यादा अच्छे से बिजनेस कर सकते हैं जिनका खानदानी बिजनेस हो। मगर ये सब बाते बिलकुल भी सच नहीं हैं और इस बात को रितेश ने गलत साबित कर दिया। रितेश एक कम उम्र का लड़का जिसने युवाओं के अंदर ये भरोसा पैदा किया कि भई बिना पैसा और बिना माईबाप के आप खुद अपने दिमाग से ही बिजनेस खड़ा कर सकते हो। रितेश ने इतनी कम उम्र में सफलता पाकर सबको अपना मुरीद बना दिया हैं। आज रितेश को कई लोग अपना आइडियल मानते हैं।

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रितेश ने पढ़ाई बीच में जरूर छोड़ी पर वो ‘बिजनेस सेमिनार्स’ अटेंड किया करते थे। ये बिजनेस सेमिनार्स बड़े-बड़े शहरों में हुआ करती हैं और कई-कई दिनों तक चलती हैं। इसलिए रितेश को इन महंगे शहरों में रुकना भी पड़ता था। यहाँ ठहरने में उनको बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। क्योंकि उन्हें सस्ते और अच्छे होटल्स ही नहीं मिलते थे। कई बार ज्यादा पैसे देने के बाद भी उन्हें अच्छा कमरा नहीं मिल पाता था। बस फिर तभी रितेश ने सोचा कि जैसी प्रॉब्लम उनको हुई है वैसे ही दूसरे भी फेस करते होंगे। फिर रितेश ने अपना स्टार्टअप शुरू किया और उसको OravelStays नाम दे दिया।

शुरुवात में वो स्टार्टअप्स में निवेश करने वाली एक कंपनी ‘वेंचर नर्सरी’ के पास गए। कंपनी ने रितेश के स्टार्टअप को करीब तीस लाख रूपए का फंड भे दे दिया। इसी समय रितेश को ‘थील फेलोशिप’ के बारे में पता चलता है. यह फेलोशिप बीस वर्ष से कम उम्र के युवाओं को अपना स्टार्टअप आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराती है। रितेश इस फेलोशिप में दसंवा स्थान हासिल करते हैं और उन्हें 66 लाख रूपए की प्रोत्साहन राशि मिलती है। मगर इसके बाद भी ऑरवेल स्टेस’ धीरे-धीरे घाटे में जा रहा था।

मगर OravelStays का ये काम कुछ ख़ास काम नहीं कर पाया। आख़िर इसके बाद रितेश को ये बात पता चली की इंडिया में कमरे मिलना प्रॉब्लम नहीं हैं बल्कि कम कीमत में अच्छे कमरे मिलना प्रॉब्लम हैं और बाद में रितेश ने ऑरवेल का नाम बदलकर एक नए मकसद के साथ ओयो रूम्स की शुरुवात की।ओयो रूम्स ने बुक किए जाने वाले कमरों के कुछ मानक सेट कर दिए. अब होटल वालों को ग्राहक को ओयो द्वारा निर्धारित कम से कम सुविधाएं देना जरूरी हो गया। इसके बाद ओयो रूम्स ने दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ़्तार से प्रगति की। कंपनी की इस प्रगति को देखते हुए 2014 में डीएसजी कंज्यूमर पार्टनर्स ने इसमें चार करोड़ का निवेश किया! वहीं 2016 में जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनी सॉफ्टबैंक ने इसमें सात अरब रूपए का निवेश किया।

आज OYO Rooms एशिया की सबसे बड़ी बजट होटल की श्रृंखला हैं । जब रितेश की कंपनी ऊचाइंयां छूने लगी तब वो एक मात्र ड्रॉपआउट थे, जो आईआईएम के 10-12 लोगों और आईआईटी, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के करीब 200 लोगों की टीम को लीड करते थे। ये सोच कर सच में हैरानी ही हो सकती है। अब हर महीने लगभग एक करोड़ ग्राहक ओयो रूम्स के जरिए कमरे बुक करते हैं। ये एक नई कंपनी के लिए बहुत बड़ी बात है और अब तो OYO Rooms अपना बिज़नस चाइना, नेपाल, UAE, , मलेशिया और इंडोनेशिया में भी कर रही हैं। वाकई में किसी भारतीय कंज्यूमर टेक्नोलॉजी कंपनी का दूसरे देशों खासकर चीन में पहुंच बनाना बड़ी बात है। रितेश अग्रवाल सफलता का एक ऐसा उदाहरण हैं, जो साबित करते हैं कि ऊंचाइयां को हासिल करने के लिए औपचारिक शिक्षा ही सब कुछ नहीं होती। एक समय था जब रितेश सिम कार्ड बेचा करते थे और एक समय आज का है जब वो इंटरनेट स्टार्टअप की दुनिया में अपने आप को सबसे बेहतर साबित कर चुके हैं।

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