वेस्ट पड़ी ग्लूकोज की बोतलों से बनाया जुगाडु Drip Irrigation, बदल दी अनेकों किसानों की ज़िंदगी

हमारा देश हमेशा से ही कृषि के लिए जाना जाता है. जहाँ भारत की आधी से ज्यादा आबादी आज भी कृषि पर ही आश्रित है लेकिन इसके बावजूद भी किसानों को हमेशा से कृषि में घाटा सहना पड़ता है. जिसकी मुख्य वजह परंपरागत खेती को माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि किसान हमेशा से ही अपने दादा परदादा की ही तरह खेती करते हुए काट देते हैं. जिससे ना तो उन्हें बेहतर मुनाफा मिल पाता है और न ही उनकी आय बढ़ पाती है.

हालांकि हमारे देश में ऐसे न जानें कितने किसान हैं जो अपनी सोच और अपने हुनर से अलग मुकाम बना रहे हैं. अपनी अलग सोच के ही चलते वो जहाँ अपने आपको अन्य लोगों से अलग और बेहतर बना रहे हैं। तो अनेकों लोगों के लिए मिसाल बन रहे हैं. ऐसे ही किसान हैं मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिला झाबुआ के रहने वाले किसान रमेश बारिया. जो इन दिनों अपनी जुगाडु तकनीक के चलते चर्चा में हैं.

रमेश बारिया

आदिवासी क्षेत्र में रहने के चलते जहाँ रमेश बारिया को खेती करने में हमेशा से दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. वहीं मिट्टी की सतह हमेशा से बारिश में आने वाले पानी पर ही आधारित होती थी. जिससे वहाँ सूखे जैसी समस्या रहा करती थी. हालांकि रमेश बारिया ने अपने दिमाग और जुगाडु तकनीक के चलते वो कर दिखाया जो अन्य इंसान कल्पना भी नहीं करता.

रमेश कहते हैं कि, “मैं हमेशा से ही चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहता हूँ. यही वजह है कि, मैं अपनी खेती को हमेशा से बेहतर बनाना चाहता था.”

Ramesh Bariya ने KVK वैज्ञानिकों की मदद से शुरू की नर्सरी

यही वजह रही कि, रमेश ने साल 2009-2010 के दौरान NAIP (राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना) के तहत KVK के वैज्ञानिकों से संपर्क किया और उन्हीं के बताए रास्ते पर सर्दी और बरसात के दौरान मैंने अपनी छोटी-सी जमीन पर सब्ज़ी की खेती की शुरुवात की. ज़ाहिर है सब्जी की खेती पहाड़ी इलाकों के लिए बेहतर होती है. ऐसे में रमेश ने करेला, लौकी, स्पंज और अन्य तरह की सब्जियां उगाने की शुरुवात की और अपनी मेहनत के दम पर ही जल्द ही उन्होंने एक नर्सरी स्थापित कर दी. हालांकि, पानी की किल्लत की वजह से रमेश मानसून पर निर्भर हो गए. लेकिन मानसून देरी से पहुंचा.

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अपनी सब्जी की नर्सरी खराब होता देख, रमेश ने NAIP की फिर से मदद मांगी. जहाँ मौजूद विशेषज्ञों ने उन्हें सुझाव दिया कि, वो वेस्ट हो चुकी ग्लूकोज की बोतल का इस्तेमाल करें. यानि की ग्लूकोज की बोतल को ऊपर से काटकर उसमें उसकी स्ट्रिप लगाकर बूंद बूंद पानी सब्ज़ी के पौधों के दें.

जिसके बाद रमेश बारिया ने 20 रुपये किलो के हिसाब से ग्लूकोज की वेस्ट हो चुकी प्लास्टिक की बोतलों को इस्तेमाल अपनी सब्ज़ी की पौध को बचाने और उन्हें नियमित तौर पर पानी देने के लिए किया. रमेश ने इन ग्लूकोज की बोतलों को हर सब्ज़ी के पौध के पास बांध दिया और फिर सभी पौध को बूंद-बूंद पानी देने की शुरुवात की और देखते ही देखते पानी की किल्लत दूर हो गई. जबकि पौध को नियमित पर पानी मिलने लगा.

रमेश बारिया

ग्लूकोज की बोतलों के इस्तेमाल से Ramesh Bariya ने कमाया मुनाफा

हर सुबह के वक्त रमेश इन बोतलों में पानी भर देते हैं. जिससे वो पानी बूंद बूंद कर सब्ज़ी की पौध पर गिरता रहता है. यही वजह रही कि, रमेश वेस्ट ग्लूकोज की बोतल का इस्तेमाल कर सब्जियों के सीज़न के खत्म होने तक में उनके पास मौजूद 0.1 हेक्टेयर भूमि पर 15 से 20 हज़ार तक मुनाफा कमाने में सफर रहे. जबकि इसी जुगाडु तकनीक के चलते उनकी खेती भी बेहतर हो सकी.

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रमेश की इसी पहल को देखते हुए, गाँव के अन्य किसानों ने भी इसे अपनाया साथ ही मुनाफा भी कमाना शुरु कर दिया. जिसके चलते रमेश बारिया को ज़िला प्रशासन और मध्य प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री ने सराहना प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया.

आज भले ही रमेश के पास बहुत कम ज़मीन हो, लेकिन अपनी अलग सोच और अपने ज़ज्बे के चलते रमेश ने अपने यहाँ मौजूद अन्य किसानों को एक अनोखी और जुगाडु तरीका सिखा दिया. जिसे अपनाकर अन्य किसान फायदा कमा रहे हैं. इसी तरह अन्य सफर खबरों के लिए हमारे अन्य आर्टिकल जरूर पढ़ें.

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