सर जॉर्ज एवरेस्ट ने नहीं, राधानाथ सिकदर ने मापी थी एवरेस्ट की ऊंचाई

जब भी हम दुनिया की सबसे ऊंची चोटी की बात करते हैं तो, सबके दिमाग में ‘माउंट एवरेस्ट’ का नाम आता है. जिसकी ऊंचाई के बारे में सबको मालूम है. ऐसे में जब भी हमसे कोई सवाल करता है कि, माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई सबसे पहले किसने मापी तो अधिकतर लोगों का जवाब होता है ‘सर जॉर्ज एवरेस्ट.’ हालांकि यह सही नहीं है. जिसकी वजह है, राधानाथ सिकदर.

1865 में भले ही माउंट एवरेस्ट का नाम सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखा गया है. लेकिन हकीकत में माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई की गणना गणितज्ञ राधानाथ सिकदर ने की थी. जिन्होंने सबसे पहले बताया था कि, माउंट एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है. ऐसे में एक कहावत है कि, “बनाए कोई, खाए कोई.”

राधानाथ सिकदर

1813 में कोलकाता के जोरासांको में स्थित एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे राधानाथ सिकदर. बचपन से ही अग्रणी युवा थे. जो बाद में चंदननगर चले गए. जोकि कोलकाता से उत्तर में डेढ़ घंटे की दूरी पर मौजूद है. यहीं से उन्होंने अपनी शिक्षा की शुरुवात की. बचपन से ही राधानाथ गणित में सबसे अग्रणी थे.

राधानाथ सिकदर बने ‘चीफ कंप्यूटर’

Radhanath Sikdar
Radhanath Sikdar

जिस समय देश में अंग्रेजी हुकूमत थी. उस समय देश में पहली बार 1806 में सर जॉर्ज भारत आए थे. जहाँ उन्हें शुरुवाती समय में कोलकाता और बनारस के मध्य संचार व्यवस्था कायम करने की खातिर टेलीग्राफ को स्थापित करने और संचालित करने का कार्यभार दिया गया था. उस समय तक माउंट एवरेस्ट को लोग ‘पीक-15’ के नाम से पहचाना जाता था. जबकि तिब्बत इस पहाड़ को ‘चोमोलुंग्मा’ व नेपाली ‘सागरमाथा’ कहते थे.

भारत आने के बाद साल 1820 में दक्षिण अफ्रीका की समुद्री यात्रा के दौरान बीमारी के चलते सर जॉर्ज चलने फिरने में असमर्थ हो गए. जिसके चलते उन्हें व्हील चेयर का सहारा लेना पड़ा. दूसरी ओर बीमारी का इलाज चलता रहा.

उन दिनों कंप्यूटर लोगों की पहुंच से कोशों दूर था. यही वजह थी कि, सर जॉर्ज को गणना करने की खातिर ऐसे इंसान की जरूरत थी. जो सही आंकड़े जुड़ा सके. सर जॉर्ज के साथ काम करते हुए राधानाथ सिकदर ने सबसे पहले पीक-15 की सही ऊंचाई का पता लगाया. ये कारनामा राधानाथ ने साल 1852 में किया था. गणना में माहिर गणितज्ञ राधानाथ सिकदर ने इस दौरान अपने सर्वेक्षण के दौरान अनेकों आंकड़े जुटाए. साथ ही इस चोटी के अलावा अनेकों और भी पहाड़ों की जानकारी जुटाई. जिसके चलते उन्हें ‘चीफ कंप्यूटर’ का पद दिया गया. हालांकि उनकी असल खोज उनसे छीन ली गई.

इस दौरान भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. यही वजह थी कि, 1852 में सिकदर की खोज को ब्रिटिश सर्वेक्षक एंड्रयू वॉ ने सर जॉर्ज को दिलवा दिया दिया. दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ को अब तक जो लोग पीक-15 कहते थे, ऐसे में उसका नाम बदलकर ‘माउंट एवरेस्ट’ रखा दिया गया.

Radhanath Sikdar

राधानाथ सिकदर बीमारी के चलते किया धर्म परिवर्तन

जिस समय सिकदर अपनी गणनाओं में हिमालय से लेकर अनेकों पहाड़ों पर जाया करते थे. उन दिनों उन्हें फ्रॉस्ट बाइट्स (बर्फ की वजह से अंग गलन) रोग हो गया. जिससे पीड़ित सिकदर को उन्हीं के लोगों ने अपने से दूर कर दिया.

चूकिं उस समय लोगों की इस बीमारी के बारे में मालूम नहीं था. ऐसे में हिंदू समाज मानने लगा कि, उन्हें कुष्ठ रोग हो गया है.

बीबीसी के एक लेख के अनुसार फादर ऑरसन वेल्स बताते हैं कि, “कुष्ठ रोग को लेकर भारत में उस समय अलग ही भावना थी. लोग कुष्ठ रोग को कलंक की भावना से देखते थे.”

ऐसे में सिकदर की देखभाल ईसाइयों ने की उनके स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रखा. यही वजह थी कि,उन्होंने अपना धर्म छोड़कर इसाई धर्म अपना लिया.

आज भी राधानाथ सिकदर की कब्र चंदननगर के रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान में मौजूद है. ऐसे में फादर ऑरसन वेल्स कहते हैं कि, “भारतीय अपने इतिहास व महत्वपूर्ण शख्सियतों, धरोहरों व विरासतों को सहेजने को लेकर कभी गंभीर नज़र नहीं आते.”

Radhanath Sikdar

जहाँ प्रार्थना हॉल में सिकदर की एक तस्वीर लगी हुई है. जिसमें एक इंसान को पहाड़ पर चढ़ते हुए दिखाया गया है. साथ ही वहां लिखा है कि, उन्होंने ही माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई नापी थी.

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