Padbank- गरीब लड़कियों और महिलाओं को मुफ्त पैड बांट रहा पैडबैंक

आपने आज तक कई बैंको के बारे में सुना होगा। होम लोन बैंक, कृषि बैंक, चिल्ड्रन बैंक, और भी ना जाने क्या-क्या। लेकिन क्या आपने कभी पैडबैंक के बारे में सुना है? अगर नहीं तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि, आखिर क्या है पैडबैंक।

दरअसल, ये बैंक महिलाओं और लड़कियों को पीरियड के दौरान होने वाली बीमारियों से बचाने का काम कर रहा है। ये पैड बैंक उन महिलाओं और लड़कियों को फ्री में सैनेटरी पैड देता हैं जो पैड खरीद नहीं पाती।

Padbank- सिर्फ 18 प्रतिशत महिलाएं ही इस्तेमाल करती हैं पैड

आप सभी को ये जानकर हैरानी होगी कि, आज के समय में 18 प्रतिशत महिलाएं और लड़कियां पैड इस्तेमाल करती हैं। जो पैड इस्तेमाल नही करती वो कपड़ा, राख, या घासफूस का इस्तेमाल करती हैं, और इतना ही नहीं, ये सब पीरियड के समय इस्तेमाल करने पर कई महिलाएं बीमार भी हुई हैं। तो कई ऐसी हैं जो अपनी जिंदगियों से से हाथ तक धो बैठी हैं।

ये पैडबैंक गांव के हर स्कूल जा-जा कर महिलाओं और लड़कियों को इसके बारे में जानकारी दे रहें हैं, कि कपड़ा इस्तेमाल करने से महिलाओं को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। इस पैडबैंक की शुरुआत बरेली से हुई। दरअसल, अक्षय कुमार की फिल्म पैडमैन को देखकर बरेली के वीर सावरकर नगर कॉलोनी के रहने वाले बीसीए के स्टूडेंट चित्रांश सक्सेना इतने प्रभावित हुए कि, उन्होंने पैडबैंक बनाने की ठानी और पैडबैंक खोलकर इसकी शुरुआत कर दी।

Padbank- चित्रांश ने पैडमैन देखकर ली पैडबैंक खोलने की प्रेरणा

आपको बता दें कि, डेलापीर के पास वीर सावरकर नगर चौराह पर इस बैंक को खोला गया है। इस ग्रुप में लगभग 15 लोग हैं जिसमें स्टूडेंट्स से लेकर नौकरी करने वाले लोग भी शामिल हैं। चित्रांश का कहना है कि, मैं हमेशा से लोगों की भलाई के लिए कुछ करना चाहता था। मैं चाहता था कि मैं इस समाज को कुछ दूं। पैडमैन फिल्म देखने के बाद लगा कि मुझे कुछ करना चाहिए। फिल्म पैडमैन की कहानी ने मुझे काफी प्रभावित किया और मुझे लगा कि, समाज में पीरियड्स से जुड़ी नेगेटिव बातों को दूर करना चाहिए।

इस बैंक में लड़कियों को एक पासबुक दी जाती है। इस पासबुक के जरिए लड़कियां मुफ्त में सैनिटरी पैड्स पा सकती हैं। हर महीने आठ सैनिटरी पैड्स पहुंचाए जाते हैं। अभी तक 148 लड़कियों को इस पैडबैंक से जोड़ा जा चुका है। इस पहल से महिलाओं में काफी जागरूकता आई है और अब महिलाएं और लड़कियां सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करने लगी हैं। चित्रांश कहते हैं कि जब उन्होंने इस काम को शुरू किया था तो लोगो उन पर हंसते थे, लेकिन अब वही लोग उनके ग्रुप का हिस्सा बनना चाहते हैं, यही उनकी सफलता है। यह पैडबैंक समाज की पिछड़ी और गरीब महिलाओं को मुफ्त में सैनिटरी पैड्स देकर जो काम कर रहें हैं वो वाकई में काबिले तारीफ है 

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