Mohapatra Brahmin: वो अछूत कम्यूनिटी, जिसे लोग ‘मौत का व्यापारी’ कहते हैं।

भारत, कल्चरर्स के फ्यूजन का एक अनोख रंग यहां देखने को मिलता है। परंपराएं और रीति-रिवाजों का जो भंडार यहां है वो शायद ही कहीं होगा। भारत के कल्चर में जन्म से लेकर मौत तक के लाइफ प्रोसेस को एक अलग ही रंग से सेलिब्रेट किया जाता है। यहां बच्चे के जन्म को लेकर संस्कार करने की बातें हैं तो वहीं इंसान के मरने पर भी कुछ कर्म कांडों को उनके वंशजों को पूरा करना होता है। लेकिन बदलते जमाने में, वक्त के साथ ये चीजें जैसे-जैसे मार्केटाइजेशन से जुड़ी हैं, लोगों के बीच इन कर्मकांडो को लेकर एक नेगेटिव बात जाने लगी है और वो ये है कि यह सब बिजनेस है।

‘बिजनेस’ यह एक शब्द लोग इस तरह से बोलते हैं कि, जैसे कोई इन कर्मकांडो को करके अगर अपने परिवार के लिए दो पैसे कमा रहा है तो अपराध या धोखा—धड़ी जैसा कोई काम कर रहा है। पूर्वी यूपी, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में कुछ ब्राह्मणों द्वारा ऐसे ही कुछ कर्मकांड होते हैं जो सालों की परंपरा का हिस्सा है। ये कर्मकांड इंसान की मौत से जुड़ा हुआ है और इस लिए इसे कुछ इंटेलेक्चुअल ‘बिजनेस ऑफ डेथ’ कहते हैं।

Mohapatra Brahmin

Mohapatra Brahmin- जो करते हैं ‘बिजनेस ऑफ डेथ’

कइयों को आपने एक कहावत कहते हुए सुना होगा कि, ‘एक ही ब्राह्मण शादी भी कराता है और श्राद्ध भी। इस एक वाक्य से सभी ब्राह्मणों को एक ही कैटेगरी में रख दिया जाता है। लेकिन यह कहावत सही नहीं है। क्योंकि शादी कराने वाला पंडित और श्राद्ध कराने वाला ब्राह्मण दोनों अलग होते हैं। पूर्वी यूपी, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ इलाकों की अगर बात करें तो हमे पता चलता है कि, श्राद्ध कराने की जिम्मेदारी ‘मोहप्रात्र ब्राह्मण’ की होती है। ब्राह्मणों का यह वर्ग सबसे निम्न कोटी का माना जाता है। हालांकि शास्त्रों में ऐसा कुछ कहा नहीं गया है। लेकिन समाज में यह मान्यता बरसों से चली आ रही है। महापात्र ब्राह्मण सिर्फ श्राद्ध के अलावा और कोई काम नहीं करते। वो न तो कोई मामूली सी पूजा करवा सकते हैं न ही किसी के घरों में कथा का वाचन कर सकते हैं। लोगों की मौत के समय ही एक ऐसा समय आता है तब महापात्र को कुछ कमाने का मौका मिलता है। 

मौत के बाद क्या होता है Mohapatra Brahmin का काम

हिन्दू रीति रिवाजों की बात करें तो मौत के बाद 13 दिनों तक का कर्मकांड होता है। इन तेरह दिनों तक जिसके घर में किसी की मौत हुई होती है कि उसे कई तरह के नियमों को मानना पड़ता है। सबसे पहले तो उस घर के उस व्यक्ति को जिसने अग्नि दी हो, उसे मुंडन कराना होता है। दाह संस्कार के बाद तीसरा मनाते हैं, जिसे उठावना कहते हैं। इसके बाद 10वें दिन मुंडन करवाकर शांतिकर्म किया जाता है। 12वें दिन पिंडदान आदि कर्म करते हैं। तेरहवें दिन मृत्युभोज होता है। इसके बाद सवा महीने का कर्म होता है, फिर बरसी मनाई जाती और मृतक को श्राद्ध में शामिल कर उसकी तिथि पर श्राद्ध मनाते हैं। तीन वर्ष बाद उसका गया में पिंडदान होता है।

इसमें 12वीं या 13वीं के दिन महापात्र की मौजूदगी में दाह संस्कार होते हैं। जिसमें चढ़ावे के लिए बहुत सी चीजें होती हैं। कहा जाता है कि चढ़ावे में सिर्फ महिला को छोड़ एक इंसान के उपभोग की सभी चीजें होती हैं, फिर चाहे वो किचेन की चीजें हो, बेड या बिस्तर हो या कपड़े हो। चढ़ावे की चीजें महापात्र बाहम्णों को दान में दी जाती हैं और इसी में से एक पार्ट नाई यानि हजाम का भी होता है। इस दोरान महापात्र के खाना खाने के बाद ही घर के लोग और आस पड़ोस के लोग खाना खाते हैं और फिर मृत्यु भोज होता है।

Mohapatra Brahmin

सिर्फ एक दिन की चांदनी, फिर दुनिया से दुत्तकार

ब्राह्मण शब्द सुनते ही हमे लगता है कि यह वह वर्ग है जो समाज का बड़ा तबका है, जिसमें दलितों को दबाया, जातिवाद फैलाया, इसके अलावा कुछ पॉजिटिव काम भी किए। लेकिन क्या सामाज में ब्राह्मण भी छूआछूत और जातियता का शिकार होते हैं? इस सवाल का जवाब महापात्र ब्राह्मणों के अलावा और कोई नहीं दे सकता है। मौत के कर्म कांड करके अपने घर लौटने के बाद जब अगले दिन ये ब्राह्म्ण ही गांव समाज में निकलते हैं तो लोग खुदको इनसे दूर रखने की कोशिश करते हैं। इनकी छाया से भी दूर रहने की बात कहते हैं। महापात्र ब्राह्मण को लेकर कई लोग कहते हैं कि, ‘ये लोग दिन भर कहीं न कहीं से मौत की खबर सूनने का इंतजार करते हैं। बनारस में एक बात कही जाती है कि, अगर ‘लोटे को घुमाएं तो एक आत्मा आपके आस-पास गिरती है, महापात्र भी दिनभर अपने लोटे को घुमाते रहते हैं क्योंकि किसी के मरने पर ही इन्हें दिन का एक निवाला मिल पाता है। मौत को लोग अपने आप से दूर रखना चाहते हैं। ऐसे में लोग सुबह में या शाम में महापात्र ब्राह्मण का चेहरा देखने से भी बचते हैं। वहीं अगर ये किसी के दरवाजें पर चले जाएं और वहां से लौटने लगें तो लोग पीछे से कोई पत्थर उस रास्ते पर फेंक देते हैं ताकी वो या मौत उनके दरवाजे पर नहीं आए।

ऐसे में इन ब्राह्मणों को दुनिया उस व्यक्ति की तरह देखती है मौत को लेकर उनके दरवाजे पर आता है। लेकिन असल में ये ब्राह्मण इंसान की आत्मा के सकुशल शरीर त्याग में मदद करते हैं। वहीं जो लोग इसे सो कॉल्ड बिजनेस के रूप में देखते हैं, उन्हें इस बारे में डीप नॉलेज नहीं होती। इसे बिजनेस कहने के बजाय एक व्यक्ति के आय के साधन की तरह समझें तो हम शायद इसमें कल्चर के उस रूप को समझ सकते हैं जिसमें यह बात निहित है कि, एक इंसान जो प्रकृति का हिस्सा है वो मरने पर भी किसी रूप में इस प्रकृति के ही काम आ रहा है। इसे हम प्रकृति या धर्म के अपने संस्टनेबल फार्म के रूप में समझ सकते हैं। ऐसे में हमें इस परंपरा को समझने के लिए सोच को थोड़ा बदलने की जरूरत है। न तो महापात्र कोई मौत का दूत है और न ही ये परंपरा किसी प्रकार का बिजनेस है। यह हमारे लाइवलीहुड का एक हिस्सा भर है।

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