Mccluskieganj – एंग्लो इंडियंस का बसाया हुआ छोटा सा गांव

जब भी हम किसी ऐसी जगह जाते हैं जिसका अतीत से गहरा रिश्ता होता है। हम खो जाते हैं ये सोचकर कि आज से कई साल पहले ये जगह यहां के लोग कैसे हुआ करते होंगे। आज ऐसी ही एक जगह के बारे में हम आपको बता रहे हैं जिसके बारे में सुनकर सिहरन सी पैदा हो जाती है। क्योंकि इस जगह पर कभी हज़ारों की संख्या में एंग्लो इंडियन रहा करते थे। उनका पहनावा उनका खान पान बोलचाल सबकुछ एक दम अलग था कल्चर भी ऐसा जो हमारे कल्चर से बिल्कुल अलग था। घरों को देखकर तो यक़ीनन ऐसा ही लगता था जैसे कि ये इंडिया नहीं बल्कि लंदन हो। सोचिए हमारे देश में एक ऐसा गांव हो जो लंदन जैसा लगता हो और जहां के लोग भी ब्रिटिशर्स हो तो ऐसी जगह को देखने के लिए आप कितने एक्ससाइटेड हो जाएंगे। इस छोटे से कसबे का नाम है मैक्लुस्कीगंज। झारखंड की राजधानी रांची से करीब 65 किलोमीटर दूर जंगलों और आदिवासी गांवों के बीच 1933 में बसाया गया ये कस्बा एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए एक छोटी सी दुनिया थी जिसे लोग मिनी लंदन कहते हैं।

Mccluskieganj को अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की ने बसाया था

इस कसबे को बसाया था अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की नाम के एक एंग्लो इंडियन व्यवसायी ने जो कोलकाता में प्रॉपर्टी डीलिंग के पेशे से जुड़े थे। मैकलुस्की के पिता आइरिश थे और रेल की नौकरी में रहे थे। नौकरी के दौरान बनारस के एक ब्राह्मण परिवार की लड़की से उन्हें प्यार हो गया। समाज के विरोध के बावजूद दोनों ने शादी की। ऐसे में मैकलुस्की बचपन से ही एंग्लो-इंडियन समुदाय की छटपटाहट देखते आए थे। उस वक़त अंग्रेज सरकार ने एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए किसी भी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया था। पूरे एंग्लो-इंडियन समुदाय के सामने खड़े इस संकट को देखते हुए मैकलुस्की ने तय किया कि वो अपने समुदाय के लिए एक गांव इसी भारत में बनाएंगे। अपने समुदाय के लिए कुछ कर गुजरने का सपना शुरू से उनके मन में था। एक बार जब काम के सिलसिले में वो इस इलाके में आए तो यहां की आबोहवा ने उन्हें यहाँ रुकने पर मजबूर कर दिया। यहां के गांवों में आम, जामुन, करंज, सेमल, कदंब, महुआ, भेलवा, सखुआ और परास के मंजर, फूल या फलों से लदे सदाबहार पेड़ उसे कुछ इस कदर भाए कि उन्होंने भारत के एंग्लो-इंडियन परिवारों के लिए एक अलग ही दुनिया बसाने के बारे में सोचा। फिर उन्होंने रातू महाराज से लीज पर 10 हजार एकड़ जमीन ली और इसकी नींव रखी। इसके बाद यहां एक से एक खूबसूरत बंगले बनने का सिलसिला शुरू हुआ। देखते ही देखते देशभर से काफ़ी एंग्लो इंडियन परिवार यहां आकर बसने लगे। क्योंकि खुद के साथ होने वाली उपेक्षाकी वजह से सब लोग अपनी अलग ही दुनिया बसाना चाहते थे जहां वो सुकून की सांस ले सकें। वो लोग ज़मीन खरीदते और उनपर खूबसूरत बंगले बनवाते। इस तरह इस कसबे में 365 बंगले बन कर तैयार हुए। पश्चिमी संस्कृति के रंग-ढंग हर तरफ़ फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते गोरे लोगों की वजह से ही ये क़स्बा लंदन जैसा लगता था। इस जंगली इलाके में अंग्रेजी रहन सहन, उनका अंदाज अपने दौर में देश के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र था।

Mccluskieganj के खूबसूरत बंगले आज भुतहा लगते हैं

मगर कई सालों बाद एक दौर ऐसा भी आया जब वक़्त बदला और मैकलुस्कीगंज को भी बुरे दिन देखने पड़े । एक के बाद एक एंग्लो-इंडियन परिवार ये जगह छोड़कर जाने लगे। दरअसल वक़्त के साथ बड़े शहर तो बदलने लगे मगर ये कस्बा वैसा की वैसा ही रहा। ना रोजगार ना सुख सुविधाएं ना ही कोई मूलभूत सुविधा। इसलिए देखते ही देखते ये कस्बा खाली होने लगा। खूबसूरत बंगले खाली होकर भुतहा से लगने लगे। और अब तो ये दौर है जब गिने-चुने परिवार ही मैकलुस्कीगंज में बचे हैं। जो यहां रह भी रहे हैं उनकी ज़िंदगी अब पहले जैसी नहीं रही। आज वो फर्राटेदार इंग्लिश तो बोलते हैं मगर उनके बदन पर मैले कुचैले से कपड़े ही दिखते हैं। रोजगार के नाम पर या तो रिक्शा चला रहा है या फिर कोई खेती कर अपना गुजारा कर रहा है। बंगले भी अब पहले की तरह शाही नहीं रहे। बंगलो के अंदर भी अँधेरे की काई चढ़ी है। दीवारों पर पुताई की चपड़े छूठ रही हैं। बैठने को चरमराती 1 दो कुर्सियां ही पड़ी हैं बस। आज भारत के एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए बुना ये खूबसूरत घोंसला तिनके-तिनके बिखर रहा है। बची हुई हर कोठी कुछ कहती है। देखेंगे तो भीतर में टीस सी उठेगी। आधुनिक सुविधाओं में रहने वाले गोरे आठ दशक पहले कैसे इस जंगली इलाके में बसे होंगे। और आने वाली पीढिय़ां कैसे अपने बुजुर्गों को छोड़कर गई होंगी।

जिस दौर में मैकलुस्कीगंज बसा, हालात कुछ और थे। तब अंग्रेजों का राज था मगर देश आज़ाद होने के बाद हालत बदल गए। एक गलती इन लोगों ने शायद ये भी कर दी थी कि लगातार आगे बढ़ते महानगरों को छोड़कर ये लोग झारखंड के एक गाँव में आ बसे थे। क्योंकि मैकलुस्कीगंज में जो एंग्लो-इंडियन रहने आए थे उनके पास उनकी बहुत सारी जमापूंजी खर्च करने को थी पर नई पीढ़ी को तो अपने भविष्य की तैयारी खुद ही करनी थी जो समझदार थे वो इस छोटे से कसबे को छोड़कर चले गए। आज शायद वो मैक्लुस्कीगंज की दशा देखकर अपने फैसले पर खुश भी होंगे। जो यहां रह गए वो अपने यहां की ज़मीन से जुड़ नहीं पाए। ना उन्हें कोई ढंका काम मिला और ना उनकी ज़िंदगी पहले की तरह ठाठ बाट वाली रही। इसलिए इनकी ज़िंदगी बद से बदतर होती चली गई।

मैकलुस्कीगंज टिमोथी का सपना था। काश कि उनका ये सपना सिर्फ सपना ही बनकर ना रह जाए बल्कि ज़माने के हिसाब से इस कसबे में भी बदलाव की बयार चल पड़े। 1997 में खुले डॉन बॉस्को स्कूल की वजह से ये इलाका थोड़ा ही सही मगर गुलजार होने लगा। जिसकी वजह से यहां हॉस्टल भी खुले। इस कस्बे ने कभी इस देश से ज़्यादा कुछ नहीं माँगा और ना ही यहां के परिवारों की कोई खास मांग हैं ये तो आज भी बस मूलभूत सुविधाएं ही चाहते हैं। सरकार को मैकलुस्कीगंज को एक एजुकेशनल हब के तौर पर और आगे बढ़ाना चाहिए और यहां रोजगार के साधन बढ़ाए जाने चाहिए। लोग इस गांव को और उन बंगलों को आज भी देखना चाहते हैं इसलिए सरकार इसे टूरिस्ट प्लेस के तौर पर फिर से भरा जा सकता है। कम से कम एंग्लो इंडियन परिवार ना सही लेकिन उनके बंगलों को ऐतिहासिक विरासत के तौर पर और उसमें बसी उनकी यादों को तो हमेशा के लिए ज़िंदा रखा जा ही सकता है ना।

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