उत्तराखंड का माणा गांव है स्वर्ग जाने का रास्ता

भारत के कई ऐसे राज्य है जो विभिन्न प्रकार के रहस्यमयी घटनाओं से भरे पड़े हैं । इनमें से एक भारत के उत्तराखंड राज्य के समीप स्थित एक रहस्यमई गांव है, जहां पर पांडवों ने स्वर्ग जाने का मार्ग चुना। यह घटना बहुत ही रहस्यमयी एवं प्रसिद्ध है। भारत के ऐसे कई सारे राज्य हैं, जहाँ पर बहुत से ऊंची एवं लंबे पहाड़ हैं। उन राज्यो में से एक उत्तराखंड भी है, जिसकी खूबसूरती अद्वितीय है। परंतु उत्तराखंड के बारे में एक अत्यंत रोचक घटना है जिसके पीछे एक राज छिपा हुआ है। यदि आप भी जानना चाहते हैं एक रोमांचक पौराणिक कथा के बारे में तो आइए शुरुआत करते हैं उत्तराखंड के माणा गांव से-

आज हम एक ऐसी रोचक पौराणिक कथा के बारे में आपको बताने वाले हैं, जो केवल एक घटना या कहानी ही नहीं बल्कि सच्चाई भी है। इस घटना के कई साक्ष्य भी मिले हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि उत्तराखंड के पास एक माणा नामक गांव है, जिसके विषय में यह बात काफी प्रसिद्ध है कि वहां से होकर पांडव स्वर्ग की ओर गए थे। इस मार्ग को स्वर्गारोहिनी के नाम से भी जाना जाता है।

कहाँ है, स्वर्ग जाने का रास्ता ?

भारत के उत्तराखंड के चमोली में और बद्रीनाथ से लगभग 3 किलोमीटर से आगे समुद्री तल से लगभग 17000 फुट की ऊंचाई पर बसा माणा गांव काफी खूबसूरत दिखाई देता है। यह गांव भारत और तिब्बत सीमा के पास में स्थित है । इस गांव को देश का सबसे आखिरी गांव माना जाता है। महाभारत के अनुसार कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडव जब स्वर्ग जाना चाहते थे, तो इसी गांव से होते हुए स्वर्ग की ओर गए थे।

आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि इस गांव के बीच में दो पहाड़े थी और बीच में खाई थी, जिसे पार करना सब लोगों के बस की बात नहीं थी। जब इस रास्ते से पांडव स्वर्ग की ओर जा रहे थे तो उन्होंने सरस्वती नदी से आगे जाने का रास्ता मांगा लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। भीम ने दो बड़े चट्टानों के टुकड़ों को उठाकर यहां पर एक पुल का ही निर्माण कर दिया। बता दें कि इसी पुल से होकर पांडव स्वर्ग की ओर गए थे। इसलिए आज भी इसे “स्वर्ग का मार्ग” कहा जाता हैं। यह मार्ग पूर्ण रूप से बर्फ से ढका हुआ है जिससे इसकी खूबसूरती और अधिक बढ़ जाती है।

क्या हुआ था जब सरस्वती नदी को गणेश जी ने दिया था श्राप ?

माणा गांव में जब प्रवेश किया जाता है, तो सबसे पहले वहां गणेश जी के नाम से एक गणेश गुफा नजर आती है। लोगों का मानना है कि बहुत पुराने समय में गणेश जी द्वारा यहां पर वेद की रचना की जाती थी । जब गणेश जी द्वारा वेदों की रचना की जा रही थी, तो पास से सरस्वती नदी पूरे वेग के साथ बह रही थी और इस नदी की आवाज गुफा तक बहुत तेजी से जा रही थी जिसके कारण गणेश जी को कार्य करने में बाधा उत्पन्न हो रही थी।

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इस कारण से गणेश जी ने सरस्वती नदी से आग्रह किया कि वह अपनी गति धीमी कर ले लेकिन सरस्वती नदी ने उनकी बात नहीं मानी। इससे गणेश जी क्रोध में आ गए और उन्होंने सरस्वती नदी को श्राप दे दिया, जिसकी वजह से सरस्वती नदी वहीं रुक गयी और कुछ दूरी पर जाकर अलकनंदा नदी में मिल गई।

क्या वास्तव में स्वर्ग जाने का मार्ग है सतोपंथ झील ?

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित सतोपंथ नामक एक झील है, जिससे होकर ही स्वर्ग की ओर जाया जाता है। लोगों का मानना है कि इसी रास्ते से होकर पांडव स्वर्ग की ओर गए थे। बताया जाता है कि जब पांडव इस सतोपंथ नामक झील से आगे स्वर्ग की ओर जा रहे थे तो एक-एक करके इनकी मृत्यु हो रही थी और यहीं पर भीम की मृत्यु हो गई। इसलिए इस जगह का महत्व और भी बढ़ गया है। इस कारण सतोपंथ नामक झील को स्वर्ग जाने का एकमात्र रास्ता बताया जाता है। इसे इतने विश्वास के साथ कहा जाता है क्योंकि कई ऐसे प्रमाण हैं जो इसे सच साबित करते हैं।

सतोपंथ झील का आकार है रहस्यमय :

आपने अक्सर झीलों को गोल या फिर लंबे आकार में देखा होगा लेकिन सतोपंथ झील इन झील से बिल्कुल ही अलग है क्योंकि सतोपंथ झील का आकार तिकोना है। कहा जाता है कि एकादशी के अवसर पर त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने इस झील में आकर एक एक कोने पर स्नान किया था। इसलिए इसका आकार त्रिकोण है। इस झील के आकार को लेकर भी कई सारी मान्यताएं हैं।

इसमें से एक मान्यता यह मानी जाती है कि सतोपंथ में जब तक स्वच्छता रहेगी तब तक इसका पुण्य प्रभाव रहेगा और जब इस झील की स्वच्छता समाप्त हो जाएगी तब इसका पुण्य प्रभाव समाप्त हो जाएगा। इसीलिए इसी वजह से यहां के लोग मिलकर रखरखाव खासतौर पर करते हैं।

क्या कारण था कि केवल युधिष्ठिर ही शरीर स्वर्ग जा पाए थे?

स्वर्ग की ओर जाने के लिए जब पांचों पांडवों के साथ-साथ द्रौपदी और उनका कुत्ता भी आगे बढ़ रहे थे तब एक-एक करके द्रौपदी, नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर एवं यहां तक की भीम जमीन पर गिर गए। सभी अपने अपने गुणों पर काफी घमंड करते थे जिसके कारण उनकी यह स्थिति हुई थी। परंतु युधिष्ठिर अपनी बातों पर सदैव कायम रहते जिसके कारण उन्हें सशरीर स्वर्ग जाने का मौका मिला। स्वयं देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ से स्वर्ग की ओर लेकर रवाना हुए।

स्वर्ग की ओर जाने का मार्ग पांडवों द्वारा तैयार किया गया था जिसके साक्षी आज भी मौजूद है। उत्तराखंड एक ऐसी धार्मिक जगह है, जहां से विभिन्न प्रकार के पौराणिक देवी-देवताओं से संबंधित कथाएं जुड़ी हुई है। यही कारण है कि उत्तराखंड “देव भूमि” के नाम से भी प्रसिद्ध है।

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