अपने हुक्के के धुएं से राजनीति की गद्दी हिलाने वाले महेंद्र सिंह टिकैत

सरकार की गलत नीतियों और सरकार की वजहों से ही किसान कर्जदार है….शुद्ध और ठेट लहजे में ऐसा बोलने वाले बाबा को कौन नहीं जानता. किसानों का मसीहा, एक ऐसा किसान जिसने देश में किसानों के आंदोलन की पूरी नींव बदल दी…

चलिए आज हम आपको भारतीय इतिहास के उस खास किसान से मिलाते हैं, जिन्होंने पूरे देश में किसानों को इस कदर एकजुट किया की….सत्ता की कुर्सियों पर काबिज लोगों की जमीन तक हिलने लगी.

साल था 1935 का दिन था 6 अक्टूबर का. शामली से लगभग 17 किलोमीटर दूर सिसौली गाँव में एक बच्चे का जन्म हुआ. जिसका नाम रखा गया महेंद्र सिंह टिकैत.

महज़ 8 साल की उम्र में अपने पिता चौहल सिंह टिकैत  को खोने वाले महेंद्र सिंह टिकैत को जल्द ही खालियान खाप का चौधरी नियुक्त कर दिया गया.

वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री कहते हैं कि, महेंद्र सिंह टिकैत कभी भी किसान नेता नहीं होना चाहते थे. वो बस सयोंगवश किसान नेता बने गए. चौधरी चरण सिंह की मौत के बाद जब उत्तर प्रदेश के सूबे में कोई खास बड़ा किसान नेता नहीं रह गया था. उसी समय उत्तर प्रदेश की सरकार ने बिजली के दामों में इजाफा कर दिया था. जिसने किसानों की समस्याऐं बढ़ा दी थी. ऐसे में जहाँ एक और किसान नाराज थे. वहीं उन्हें भी कोई ऐसा नेता चाहिए था. जो उनकी आवाज बन सके.

farmer leader mahendra singh tikait

किसानों के मसीहा महेंद्र सिंह टिकैत

ऐसे में महेंद्र सिंह टिकैत खालियान खाप के चौधरी थे. यही वजह थी कि, लोगों ने उन्हें आगे किया. जिस समय करमूखेड़ी किसानों का आंदोलन शुरू हुआ. और किसानों की भीड़ को रोकना मुश्किल हो गया था. उस समय किसानों को हटाने के लिए गोली चलाई गई और उसमें दो किसान अकबर और जयपाल सिहं की मौत हो गई. और इस मौत ने महेंद्र सिंह टिकैत को पूरी तरह बदल कर रख दिया. फिर जो जनसैलाब महेंद्र सिंह टिकैत के साथ जुड़ा उसका अंदाजा भी लगाना किसी के हक की बात नहीं थी.

एक ओर महेंद्र सिंह टिकैत जहां देश के सभी किसानों की आवाज बन गए. वहीं लोग उन्हें बाबा कहकर पुकारने लगे. भले ही बाबा महेंद्र सिंह टिकैत किसानों के मसीहा बन गए. लेकिन इस बीच उन्होंने कभी राजनीति को अपना दांव नहीं बनाया.

एक ऐसी ही घटना तब की है. जब बाबा मंच से किसानों को संबोधित कर रहे थे. उस समय स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह और चौधरी चरण सिंह की पत्नि गायित्री देवी वहां पहुंचे थे. भले ही चौधरी चरण सिंह का उस समय देहांत हो चुका था, लेकिन तब भी उनकी जड़े राजनीति में ही थी. ऐसे में जब माँ बेटे दोनों महेंद्र सिंह टिकैत से मिलने और प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे तो, महेंद्र सिंह टिकैत ने हाथ जोड़कर उन्हें मंच पर चढने से मना कर दिया. ताकि राजनीति की विरासत उनके मंच तक ना पहुंचे.

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एक ओर महेंद्र सिंह टिकैत पूरे भारत के किसानों की बुलंद आवाज बन चुके थे, वहीं दूसरी ओर उनकी खासियत में कभी कोई बदलाव नहीं आया था. क्योंकि किसानों के अगुवा किसान नेता होने के बाद भी, वो अपने खेतों में जाकर गन्ना काटते थे. खेतों की बुवाई खुद करते थे.

यही वजह थी कि, 12 लोक सभा और 35 विधानसभा के क्षेत्रों में रह रहे लगभग 3 करोड़ जाट नेताओं और लोगों के बीच उनका वर्चस्व था.

जब दिल्ली पहुंचे, महेंद्र सिंह टिकैत

लेकिन उनकी जिंदगी का सबसे अहम मोड़ तब आया. जब 28 अक्टूबर 1988 को दिल्ली के मशहूर बोट क्लब मैदान में लगभग पाँच लाख किसानों को एक साथ उन्होंने इकट्ठा किया. उनकी मांग थी कि, गन्ने का मूल्य अधिक दिया जाए. पानी और बिजली की दरों को कम किया जाए. किसानों के कर्जों को खत्म किया जाए. दिल्ली आने से पहले उन्होंने शामली, मुजफ्फर नगर और मेरठ में धरना प्रर्दशन किया था. मेरठ में उन्होंने लगभग 27 दिनों तक कमीश्नरी का घेराव किया था.

इसमें एक खास वजह ये भी थी कि, सिसौली में हर महीने की 17 तारीख को किसानों की पंचायत होती थी. जहां महेंद्र सिंह टिकैत अपनी घोषणाएं करते थे. इसी पंचायत में दिल्ली आने से पहले महेंद्र सिंह टिकैत ने घोषणा की थी कि, आने वाले दिनों में वो दिल्ली कूच करेंगे. जिसमें बग्गी से बग्गी जोड़ी जाएगी. ये दौर था 1988 का. जब देश में न तो चार पहिए की गाड़ियां ज्यादा दौड़ा करती थी और न ही हमारे पास उतने संसाधन होते थे. ऐसे में बग्गी सबसे बेहतर विकल्प होता था. इसलिए उन्होंने कहा था कि, पूरे रास्ते इतनी बग्गीयां हो की…सिसौली से दिल्ली तक केवल बग्गियां ही नज़र आनी चाहिए.

जिस समय राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे. और महेंद्र सिंह टिकैत की इस घोषणा ने पूरे देश के नेताओं से लेकर पूरे प्रशासन के हाथ पैर फुला दिए. उस समय महेंद्र सिंह टिकैत को समझाने की खातिर देश के तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बूटा सिंह, राजेश पायलट, नटवर सिंह..बलराम जाकड़ को लगाया गया. ताकि वो दिल्ली न आए. हालांकि वो माने नहीं. ऐसे में पहले सभी ने ये कायास लगाए की महेंद्र सिंह टिकैत किसानों के साथ दिल्ली आकर…दो से तीन दिनों में वापस लौट जाएगें. लेकिन जब महेंद्र सिंह टिकैत किसानों के साथ दिल्ली पहुंचे….तो पूरी दिल्ली किसानों से सन गई. चाहे लाल किला हो, इंडिया गेट हो…या दिल्ली का कोई भी कोना क्यों न हो. हर ओर किसानों का डेरा था.

दिल्ली में इसके पहले इस तरह किसानों का डेरा कभी हुआ था. और न ही कभी हो पाया. हर तरफ बैलगाडी में बैठे किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते वक्त अपना एक-एक हफ्ते का राशन लेकर आए थे. ताकि बहरी हो चुकी सरकार से अपनी बात मनवाई जा सके. ऐसे में किसानों ने अपना स्थाई डेरा बनाया दिल्ली का बूट हाउस. लेकिन तब की राजीव गांधी सरकार ने लगभग दो दिनों तक देखा नहीं. लेकिन जिस समय किसानों ने अपना डेरा राजपथ की सड़कों के आस पास लगाना शुरू किया. पूरा प्रशासन सदमे में चला गया.

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जिसकी वजह थी कि, किसानों के साथ आए मवेशी और किसानों की भीड़, एक ओर जहां बूट हाउस और राजपथ के आस पास के मैदानों, घासों को मवेशियों ने चरना शुरू कर दिया तो अपने साथ एक हफ्ते का राशन लेकर आए किसानों ने अपने कच्चे चूल्हे जलाने शुरू कर दिया. और उससे उठता धुआं उस समय ऐसा कह रहा था कि, मानों ये लड़ाई सत्ता से किसान की नही, बल्कि अपने अधिकार की है.

पूरी दिल्ली में हर ओर किसानों की पुआलें बुछाई होती थी. रात के वक्त में किसानों का गाना बजाना होता था. और दिन के समय में किसान राजीव चौक और अन्य जगहों पर लगे फुव्वारों में नहाते थे. ये मंजर किसानों के लिए जितना सुखद था. सत्ता के लिए सांस रोक देने वाला.

इस बीच महेंद्र सिंह टिकैत टस से मस तक नहीं हुए…और सरकारों की नींदें यूँ ही हराम होती रही. महेंद्र सिंह टिकैत अपने हुक्के साथ बैठते और हर रोज अपनी रणनीतियां बनाते.

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इस बीच सरकार ने भी मैदान के आस पास के इलाके में पानी की सप्लाई, बिजली की यहां तक की खाने पीने तक की सप्लाई रोक दी. रात के समय में किसानों की नींद खराब करने की खातिर लाउडस्पीकरों में संगीत बजाए जाते. ताकि किसान सो न सकें. उनके मवेशी परेशान होते रहे.

ये वो दौर था जिस समय किसानों का पूरी दिल्ली में बोलबाला था. सत्ता परेशान थी. ऐसे में किसानों के हक में दिल्ली के सभी वकीलों ने भी अपना प्रर्दशन शुरू कर दिया. और फूड सप्लाई बंद होने के बाद किसानों की खातिर नैनीताल के कई अमीर किसानों ने सेब से भरे ट्रक और हलवे भेजे.

ये वो समय था, जिस समय देश में बोर्फस घोटाले के चलते राजीव सरकार कटघरे में खड़ी थी. और इस समय पूरी दिल्ली में किसानों का डेरा, यही वजह थी कि, राजीव के सलाहकारों ने उन्हें महेंद्र सिंह टिकैत से न उलझने की सलाह दी थी.

इस बीच, रामनिवास और श्याम लाल यादव किसानों से बात कर रहे थे. जिस पार्क में किसानों का आंदोलन चल रहा था. वहां इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी आयोजित होनी था. हालांकि सरकार और किसानों के बीच बात न बनने के चलते इस जगह को बदलकर बाद में शक्ति स्थल कर दिया गया था.

सब कुछ किसानों के हक में था, बस कुछ रह गया था तो वो सरकार से अपनी मांगे मनवाना, इस बीच 30 अक्टूर को शाम चार बजे महेंद्र सिंह टिकैत ने ऐलान किया था की भाईयों दिल्ली आए हमको काफी वक्त हो चुका है. हमें अपने घरों को चलना चाहिए. खेती करनी चाहिए. महेंद्र सिहं टिकैत ने ऐसा तब किया था. जिस समय उनकी मांगों को सरकार ने पूरी तरह से माना तक नहीं था. हाँ मगर अनऔपचारिक तरीके से हाँ जरूर कहा गया था.

इस ऐलान के बाद से ही किसानों ने दिल्ली के हर किनारों से अपना सामान बांधना शुरू कर दिया और अपने घरों को वापस चले गए.  

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