‘Live in Relationship’ : भारत के आदिवासियों में कई सालों से चली आ रही है यह परंपरा

‘लिव इन रिलेशनशिप’, अंग्रेजी का छोटा-सा वाक्य है, लेकिन हमारे सामाज में जैसे ही इसके बारे में लोग सुनते हैं यह छोटा सा वाक्य उनके गुस्से में उबाल का कारण बन जाता हैं। भारतीय संस्कृति पर हमला  सीधे ध्यान यहीं जाता है। भारतीय संस्कृति में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का कोई कॉन्सेप्ट और मीनिंग नहीं है। इसलिए जब इसकी बात आती है तो इसे इंडियन कल्चर पर हमले और वेस्टर्नाइजेशन के रूप में देखा जाता है। लिव इन रिलेशनशिप का सीधा और सपाट सा मतलब होता है कि, ‘बिना शादी के लड़के और लड़की का, बिना अपने गार्डियन के जाने या जानते हुए भी साथ रहना। इसमें नोट करने वाली बात है ‘बिना शादी’। शादी उस लाइसेंस की तरह है जिसके बाद ही हमारा सामाज लड़का और लड़की के रिश्ते को स्वीकार करता है। अब यह अच्छा है या बुरा है ये हम आप पर छोड़ते हैं। लेकिन युवा पीढ़ी की बात करें तो ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को लेकर एक अलग सा क्रेज दिखता है और उनके हिसाब से यह एक फैंटसी जैसा है। जहां लड़का—लड़की शादी से पहले एक दूसरे को अच्छी तरीके से जान पाते हैं।

‘लिव इन रिलेशनशिप’ का भूत बड़े शहरों में ज्यादा और ग्रामीण इलाकों में आते ही शून्य तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि, इस चीज़ को लेकर एक बराबर जानकारी पूरे देश में देखने को नहीं मिलेगी। लेकिन जो लोग इस क्रिया को बड़े शहरों के चोंचले के रूप में देखते है उन्हें भी यह जान लेना चाहिए कि, लिव इन रिलेशनशिप जैसी चीज सिर्फ शहर में नहीं है। यह हमारे देश के कई ग्रामीण हिस्सों में है और कई शदियों को देख चुकी है। यहीं कारण है कि, इन जगहों पर ‘लिव इन रिलेशनशिप’ एक कल्चर या परंपरा की तरह है। हाल ही, में झारखंड में एक साथ कई जोड़ों के सामूहिक विवाह कराए गए। इस विवाह कार्यक्रम की सबसे रोचक बात यह थी कि, इसमें मां, बेटी, बाप और बेटे तक की शादियां एक साथ हुई! लेकिन यह पॉसिबल कैसे है? यह सवाल आपके भी मन में होगा तो चलिए आपको बताते हैं भारत में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कल्चर के बारे में।

Live in Relationship

राजस्थान का ‘Live in Relationship’ कल्चर

भारत के कई हिस्सों में शहरी ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को छोड़कर एक अलग तरह का ‘लिव इन रिलेशनशिप’ देखने को मिलता है। देश के कई राज्यों जैसे कि, राजस्थान, झारखंड और दूसरे कई हिस्सों में आदिवासी सामाज के लोगों में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का इंडियन स्टाइल देखने को मिलता है। इन जगहों पर आपको कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में 40 से 45 सालों से रह रहे हैं और कुछ की तो शादी अब जाकर उनके बच्चों ने करवाई है। दरअसल राजस्थान में गरासिया जनजाति हजारों वर्षों से इस परंपरा को फॉलो करते हुए आ रही है। आदिवासी प्रथाओं का अध्ययन करने वाले सोशल रिसचर्स कहते हैं कि, गरासिया लोगों की मुख्य आय का श्रोत खेती और मजदूरी करना है। ऐसे में इनके पास पैसे की कमी होती है। भारत में शादी करने के लिए पैसे तो खर्च होते ही हैं, ऐसे में इस सामाज में लोग अपना जोड़ा चुन लेते हैं और बिना शादी के ही उसके साथ रिलेशन में रहते हैं। जब पैसा होता है, तो ये जोड़े शादी कर लेते हैं। लेकिन इस समय तक वक्त इतना बीत जाता है कि, इनके बच्चे तक बड़े हो जाते हैं।

राजस्थान का यह आदिवासी सामाज आबूरोड जो गुजरात तक जाती है, इसके आसपास के क्षेत्र में रहता है। हर साल अप्रैल माह में यहां एक मेला आयोजित होता है। मेले में युवा एक-दूसरे को पसंद करते हैं और साथ भाग जाते हैं। वे इस बात की सूचना अपने परिवार के लोगों को दे देते हैं। परिजन सहमत होते हैं तो 15-20 दिन में शादी हो जाती है और असहमति हुई तो उन्हें गांव के बाहर ही रहना पड़ता है। इस बीच उनकी संतान बड़ी होकर खुद विवाह योग्य होती है तब वह पहले अपने माता-पिता की शादी करवाते हैं। इसके बाद उनके रिश्ते को समाज भी स्वीकार कर लेता है।

झारखंड के आदिवासी और ‘Live in Relationship’

राजस्थान के अलावा झारखंड के आदिवासियों में भी यह ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का कल्चर देखने को मिलता है। यहां के आदिवासी भी राजस्थान के आदिवासियों की तरह ही इस परंपरा को फॉलो करते आ रहे हैं। झारखंड के ओरांव, मुंडा और हो आदिवासियों के बीच शादी के बिना लिव-इन में रहने की परंपरा सामान्य मानी जाती है। दरअसल, इन समुदायों के लोग आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होते और शादी को लेकर परंपरा है ज्यादा खर्च करने की, ऐसे में ये लोग इस तरह का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होते और समय पर अपनी बच्चियों की शादी नहीं करा पाते। इस कारण हजारों युवक-युवतियां लिव इन रिलेशन में रहने को मजबूर हैं। हजारों युवतियों की शादी की उम्र इसी कारण खत्म भी हो जाती है।

Live in Relationship

कोई फैन्टसी नहीं है लिव—इन में रहना

भले ही लिव-इन में रहना शहरों में एक फैंटसी का हिस्सा हो.. लेकिन इन आदिवासियों के लिए यह एक मजबूरी है। क्योंकि सिर्फ शादी की दावत न दे पाने की वजह से इन्हें लिव—इन में रहना होता है और इनका अपना सामाज तब तक इनका बहिष्कार कर देता है जबतक ये लोग शादी नहीं कर लेते। लिव इन में रहने के कारण ये जोड़ा गांव में किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकता। लिव—इन वाली महिला को मुंडारी-संथाली में ढुकू या ढुकनी कहा जाता है। जिसका मतलब होता है – बिना शादी के घर में पुरुष के साथ घुसना या रहना। लिव—इन में रहने के कारण जोड़ों को कठोर सजा मिलती है। महिला को सिंदूर लगाने की इजाजत नहीं होती। वह लोहे या लाह की चूड़ियां नहीं पहन सकती और न ही वे पूजा-पाठ में शामिल नहीं हो सकती हैं। वहीं गांव के मर्द और महिलाएं उन्हें गिरी हुई नजरों से देखती हैं।

मर्द और औरत दोनों को ही सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। किसी के घर शादी-संस्कार, पूजा-त्योहार में इनके जाने पर मनाही होती है। वहीं अगर लिव इन वाले जोड़े ने बिना दावत के शादी कर ली तो माता-पिता, भाई-बहन भी अलग कर देते हैं। लिव—इन में रहते समय जो बच्चे होते हैं उनको पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता है। वहीं बच्चियों की कान छेदनी की रस्म भी नहीं कराई जाती। लिव इन में रहने के दौरान जोड़ों को दिक्कत तो होती ही हैं और अगर बिना शादी किए ही दुनिया से चले गए तो गांव में दो गज जमीन भी नहीं मिलती। शव को गांव के सार्वजनिक कब्रगाह से अलग बाहर दफनाया जाता है। वहीं कब्र पर पारंपरिक पत्थलगढ़ी भी नहीं हो पाती।

शहर हो या गांव ‘लिव इन’ में रहना कही भी अच्छा नहीं माना जाता। एक तरफ जहां शहरों में यह नई पीढ़ी के लिए वो फैंटसी है जिसे वे अपने गार्डियन से ज्यादात्तर छुपा कर करते हैं। वहीं आदिवासी समाज में यही काम सबके सामने होता है। लेकिन गलत दोनो स्तर पर है। हालांकि भारतीय कानून के अनुसार लिव—इन में रहा वैद्या है। लेकिन अभी भी इसी हमारे समाज की ओर से किसी भी तरह की वैद्यता नहीं मिली हुई है।

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