Launda Naach – जब रातों को थिरकते हैं मर्द

छकरबाजी या लौंडा नाच जो बिहार और मिथिलांचल में काफी चलन में है। आज से नहीं बल्कि दशकों से बिहार में ये लौंडा नाच होता आ रहा है। इस डांस में लड़के लड़कियों की तरह कपड़ें पहनकर मेकउप कर के खूब लटके झटके से डांस करते हैं। मिथिलांचल में इसे छकरबाजी तो भोजपुरी में इसे लौंडा नाच कहते हैं। इस डांस को करने वाले लड़कों को छकरबाज कहा जाता है। इन छकरबाजों की की उम्र 12 से 19 के बीच होती है। लौंडा नाच के लिए लड़कों को ये देखकर चुना जाता है कि लड़का खूबसूरत हो और लड़कियों की तरह कमर मटकाने में माहिर हो। जब भी गांवों में कहीं मेला लगता है, शादियां होती हैं, तब लौंडा नाच रखा जाता है।

Launda Naach – सस्ते मनोरंजन का सबसे पुराना तरीका

मनोरंजन का ये भी एक तरीका है जो काफी पुराना है। पहले नामचीन तवायफों का दौर होता था। वो सिर्फ राजा-महाराजाओं के महलों तक सीमित थीं। उस वक़्त राजा महाराज ही इन्हे बुला कर नचवा और गवा सकते थे। तवायफों के बाद बाईजी युग की शुरुआत हुई। तब जमींदार और धनाढ्य लोग इनका प्रदर्शन देखते थे। वो खुले तौर पर उनके हाथ या गाल छू लेते थे। मगर आम आदमी कभी इसका हिस्सा नहीं था और ना उन्हें इसका हिस्सा बनने का अधिकार था। तो जो लोग तवायफों के नाच नहीं देख पाते थे उन्होंने विकल्प के रूप में छकरबाजी नाच खोज लिया। उसी समुदाय के लड़के खुद छकरबाज बनकर आम लोगों का मनोरंजन करने लगे और इस तरह एक नाच कला छकरबाजी की शुरुआत हो गई। तब पुरुष ही स्त्री बनकर नाचने लगे। लोग जनाना बने पुरुष को देखकर सीटियां बजाने लगे। उस पर भी पैसा उड़ाया जाने लगा। देखते ही देखते इस नाच की कला ने आकार में बाईजी और तवायफ को भी पीछे छोड़ दिया।
उस वक़्त दो तरह के लौंडा नाच हुआ करते थे पहला, धार्मिक आयोजनों में. जैसे – रामलीला, रासलीला, यक्षगान तो दूसरा जिसमें आम जन-जीवन का मनोरंजन, हंसी-ठिठोली होती थी। तो उस समाय नौटंकी, तमाशा, नाचा, माच, खयाल इस तरह के नाच होने लगे। फिर तो ये परम्परा जैसे आगे बढ़ती गई और लौंडा नाच हर आयोजन की रौनक बनने लगा।

Launda Naach – के नाम पर लड़कों के साथ अश्लीलता क्यों

मगर अब पिछले कुछ सालों में लड़को के साथ छेड़छाड़ और बदतमीजी होने लगी है। जब ये लड़के स्टेज पर उतरते हैं तो ‘लड़कियों’ की तरह लगने की कोशिश करते हैं। कभी कभी लोग बेकाबू हो जाते हैं। ज्यादातर छकरबाज कम उम्र के होते हैं, इसलिए कई बार उनके साथ छेड़छाड़ की जाती है, पैसे भी ऑफर किए जाते हैं। कुछ छकरबाज हैं, जो समलैंगिक हैं तो ये उनके मिजाज पर निर्भर करता है कि वो किसी के साथ सम्बन्ध बनाना चाहते हैं या नहीं। मगर जो समलैंगिक नहीं हैं शोषण उनका भी होता है। इनका यौन शोषण अधिकतर मामलों में पार्टी वाले ही करते हैं। वो रात में कलाकारों को अपने साथ सुलाते हैं। बहला-फुसलाकर उनके साथ संबंध बनाते हैं। कई बार जबरदस्ती भी करते हैं। जिसके चलते अब लड़कों का इस पेशे में बने रहना बहुत ही मुश्किल होता जा रहा है। क्योंकि डांस करने वाले लड़के और उनके बेंड प्रोग्राम करते वक़्त नियमों का पालन करते नहीं हैं इसलिए ये छेड़छाड़ की शिकायत पुलिस में करने से डर जाते हैं कि कहीं पुलिस उन्हें ही ना गिरफ्तार कर ले। इसके अलावा डर ये भी होता है कि अपने बेंड से ना निकाल दिए जाएं या जिसकी शिकायत करें वो कहीं कोई दबंग ना हो जा बाद में परेशान करे। इसकी वजह से कई लड़के अब इस पेशे से दूर होते जा रहे हैं।

एक टाइम ऐसा भी था जब बिहार में छकरबाजी नाच कंपनिययां खूब चलती थी। मगर अब हालात बदल चुके हैं। साल 2000 के बाद नाच कंपनियां बंद होती गईं और ऑर्केस्ट्रा का बोलबाला हो गया। अब तो इसका चलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। जो लोग पढ़ लिख गए और अच्छी नौकरियों में चले गए उन्होंने लौंडा नाच करवाना बंद कर दिया। बाकि कई लोग बिहार से बाहर नौकरी करते हैं तो वो भी अब ये सब पसंद नहीं करते। फिर भी बिहार में लौंडा नाच को बुरा नहीं माना जाता क्योंकि लोग इसे पारम्परिक नृत्य की तरह देखते हैं जो सदियों से चला आ रहा है। जो भी हो बिहार में हर छोटे-बड़े आयोजन में छकरबाजी नाच जरूर होता है। उतना नहीं जितना पहले हुआ करता था मगर आज भी कुछ जगहों पर होता है। इस बदलाव की वजह से छकरबाजों के रोजगार पर असर पड़ा है। पहले नाच-गान के पेशे से वो अच्छी कमाई कर लिया करते थे, अब मांग ज़्यादा नहीं है तो ये लड़के दूसरे धंधों की तरफ जाने लगे हैं। अब गिने-चुने ही लौंडा नाच मंडलियां बची हैं, जो इस विधा को जिंदा रखे हुए है, नाच मंडली में अब बहुत कम ही कलाकार बचे हैं। उनका भी हाल खस्ता ही है। फिर भी कहीं कहीं दबी जुबां से तो कहीं खुल्लेआम बिहार में आज भी लोग लौंडा नाच पसंद तो बहुत करते हैं।

देखिए लौंडा नाच

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