इतिहास के पन्नों में खोया लाचित बोड़फुकन, जिसने अकेले किया मुगलों की सेना से मुकाबला

जब भी हम इतिहास की बात करते हैं तो हमें गुलामी की जंजीरों की बात याद आती है. मुगल साम्राज्य की बात याद आती है और हमेशा हम जो पढ़ते हैं अकबर महान ऐसी कुछ चीजें याद आती है. हालांकि इन सबके बीच कहीं न कहीं अनेकों ऐसे वीरगाथाऐं हैं. जिन्हें हमने इतिहास की पोटली में बंद कर रख दी. जिन्हें फिर बाद में हम पलटने की जहमत तक नहीं उठा सके. इसी तरह हम आपको आज बताने जा रहे हैं. इतिहास के एक ऐसे वीर सेनापति की कहानी जिसने अपने दम पर पूरी मुगल सेना को पीछे भागने पर मजबूर कर दिया था.

जिस समय हमारे देश में बाहीर आक्रांता यहां आकर हमें लूट रहे थे. जिस समय हमारे देश में मुगलों का शासन था. उस समय पूरा उत्तर भारत इनका गुलाम था. ऐसे में कई वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में लिपटे उत्तर भारत ने बहुत कुछ देखा. ऐसे में अपनी विस्तार वादी नीति के चलते जब-जब मुगल शासकों ने दक्षिण भारत पर कब्जा करने की योजना बनाई तब तब उन्हें मुहं की खानी पड़ी. चाहे बात मराठा साम्राज्य की हो या फिर अहोम साम्राज्य की. वीर माराठाओं की कहानी आज अधिकतर लोग जानते हैं. लेकिन अहोम साम्राज्य के बारे में शायद ही लोग जानते हैं. ऐसे में भारत के असम राज्य की ब्रह्मपुत्र घाटी में लगभग 600 सालों तक राज करने वाले ये साम्राज्य इकलौता ऐसा वंश था. जिन्होंने पूर्वोत्तर में मगुल साम्राज्य की विस्तारवादी नीति का दमन किया.

आहोम साम्राज्य की स्थापना 13 वीं शताब्दी में दीखौ और दीहिंग नदियों के बीच छो लुंग सुकफा ने की थी. जिसके बाद से साम्राज्य 19वीं शताब्दी के अंत तक जस का तस बना रहा. इसी साम्राज्य के एक वीर सेनापति थे लाचित बोड़फुकन, जिन्हें 1670 में हुई सराईघाट की लड़ाई में नेतृत्व-क्षमता के लिए याद किया जाता है.

लाचित बोड़फुकन एक वीर योद्धा

लाचित बोड़फुकन लाचित सेंग कालुक मो-साई (एक ताई-अहोम पुजारी) के चौथे पुत्र थे. जिनका जन्म सेंग-लॉन्ग मोंग, चराइडो में ताई अहोम के परिवार में हुआ था. बरफूकन फुरेलुंग अहोम धर्म के थे. बचपन से ही मानविकी, शास्त्र और सैन्य कौशल में शिक्षा प्राप्त करने वाले बोड़फुकन अहोम स्वर्गदेव के ध्वज वाहक थे. इसके अलावा सेनापति बनने से पहले लाचित अहोम साम्राज्य में महत्वाकांक्षी कूटनीतिज्ञ और राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़साल के अधीक्षक के तौर पर सिमुलगढ़ किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के पदों पर आसीन रहे.

जिसके चलते राजा चक्रध्वज ने गुवाहाटी के शासक मुगलों के विरुद्ध सेना की कमान उनके हाथ में दी थी. ‘बोड़फुकन’ लाचित का नाम नहीं था बल्कि उनकी पदवी थी. ऐसे में लाचिक एक ‘डेका’ 10 सैनिकों का, ‘बोरा’ 20 सैनिकों का, ‘सैकिया’ 100 सैनिकों का, ‘हजारिका’ 1,000 सैनिकों का और ‘राजखोवा’ 3,000 सैनिकों का संचालन किया करते थे. अपने बोड़फुकन बनने से बाद से लाचित ने अनेकों चुनौतियों से लड़ना शुरू कर दिया.

जिसमें मुगलों की विशाल और संगठित सेना एक तरफ, जबकि दूसरी ओर अहोम साम्राज की विखंडित सेना शामिल थी. ऐसे में अपनी सेना कुशल बनाने के साथ उन पर अपने राज्य को मगुलों से बचाने की जिम्मेदारी भी थी. ऐसे में सेनापति बनने के बाद लाचित बोड़फुकन ने अपने शुरूवाती चार साल में अपनी सेना को तैयार करने के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र इकट्ठा करने और किलों को मजबूत करने पर जोर दिया. ताकि दुश्मनों को मात दी जा सके. जिसके बाद साल 1667 में उन्होंने गुवाहाटी के ईटाकुली किले को मुगलों से स्वतंत्र कराने की योजना बनाई.

Also Read- सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जिसने जॉगिंग के दौरान इकट्ठा कर डाला 40,000 किलोग्राम कूड़ा

ये उस समय की बात है जिस समय मगुलों ने फिरोज खान को अपना फौजदार नियुक्त किया था, भोग-विलासी होने के नाते फिरोज खान ने फौजदार बनने के बाद असमिया राजा चक्रध्वज सिंह को सीधे-सीधे हिंदू कन्याओं को भोग-विलास की खातिर अपने पास भेजने को कहा. जिससे आक्रोशित लचित ने गुवाहाटी का किला मुगलों से छीनने की योजना बनाई. ऐसे में उन्होंने 10-12 सिपाहियों को रात के अंधेरे में चुपके से गुवाहाटी के किले में भेज दिया. इन सभी सिपाहियों ने मिलकर वहां मौजूद सभी तोपों में पानी डाल दिया ताकि सुबह के समय तोपों काम करने योग्य न रह जाए. दूसरी ओर लाचित ने ईटाकुली किले पर अगली सुबह आक्रमण कर दिया और फलस्वरूप उसे जीत लिया.

सरायघाटी का युद्ध

जब इसकी जानकारी औरंगजेब को लगी तो उन्होंने मिर्जा राजा जयसिंह के बेटे रामसिंह को 70 हजार सैनिकों के साथ अहोम साम्राज्य पर चढ़ाई करने का हुक्म दे दिया. दूसरी ओर लाचित को मालूम था कि, मुगल सेना शांत नहीं बैठेगी. जिसके चलते उन्होंने किले की सुरक्षा मजबूत करने के साथ-साथ रातोंरात अपनी सेना की सुरक्षा हेतु मिट्टी से मजबूत तटबंधों का निर्माण कराया. इन तटबंधों को बनवाने की जिम्मेदारी उन्होंने अपने मामा को दे दी. हालांकि निर्माण-कार्य में लापरवाही के चलते लाचित ने अपने मामा का वध कर दिया और कहा, ”मेरे मामा मेरी मातृभूमि से बढ़कर नहीं हो सकते.”

मुगल साम्राज्य जहां दिल्ली से लेकर हर तरफ फैला हुआ था. वहीं पूर्वोत्तर में लाचित की कुशल शासन और रणनीति के चलते पांव नहीं पसार पा रहा था. यही वजह थी कि, 1671 में ब्रह्मपुत्र नदी में अहोम सेना और मुगलों के बीच ऐतिहासिक लड़ाई हुई. जिसकी शुरुवात तब हुई जिस समय राम सिंह जोकि असमिया मुगल सेनापति था. उसे मालूम चला कि, अन्दुराबली के किनारे पर रक्षा इंतजामों को भेदा जा सकता है और गुवाहाटी को फिर से हथियाया जा सकता है. इसी अवसर को देखते हुए रामसिंह ने पानी से मार करने वाली मुगल सेना बना ड़ाली और 40 जहाज, 16 तोपों और छोटी नौकाओं को लेकर हमले की तैयारियां शुरू कर दी.

Also Read- Corona Virus की पहुंच से कोसो दूर छत्तीसगढ़ के आदिवासी

दूसरी ओर भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था कि, कोई सेना कहीं कब्जा करने की खातिर नौसेना की मदद से उसे हथियाना चाहती थी. ब्रह्मपुत्र नदी के सरायघाट पर लड़ा गया ये युद्ध फिर ऐतिहासिक युद्ध का साक्षी बन गया.

जब राजा का हुआ लाचित बोड़फुकन पर संदेह

इस युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया था. जब राजा चक्रध्वज को लाचित की निष्ठा पर संदेश पैदा हो गया था. जिसकी वजह थी, मुगल सेनापति राम सिंह असमिया का एक पत्र. युद्ध के पहले अहोम शिविर में एक तीर के जरिए पहुंचे पत्र पर लिखा था कि,लाचित को एक लाख रुपये दिए गए थे ताकि वो गुवाहाटी छोड़कर चले जाए. हालांकि चक्रध्वज के प्रधानमंत्री अतन बुड़गोहेने ने इस दौरान राजा को समझाते हुए इसे सिरे से नाकार दिया.

ब्रह्मपुत्र नदी में उतरी मुगलों की सेना और लाचित की सेना के बीच युद्ध के समय एक ऐसा नज़ारा बना गया कि, मानों त्रिभुज तैयार हो गया हो. जहां एक तरफ कामख्या मंदिर, दूसरी ओर अश्वक्लान्ता का विष्णु मंदिर तो तीसरी ओर ईटाकुली किले की दीवारें.

ऐसे में मुगलों की बड़ी सेना देखकर शुरुवात में सख्ते में आए अहोम सैनिक जब पीछे हटने लगे. तो लाचित ने कहा कि, मैं अपने सात नावों के बेड़े के साथ मुगल बेड़े की ओर जा रहा हूँ.  “यदि तुम सब भागना चाहते हो तो भाग जाओ. लेकिन महाराज ने मुझे एक कार्य सौंपा है और मैं इसे अच्छी तरह पूरा करूंगा. चाहे मुगल मुझे बंदी बना ले. तुम सब महाराज को सूचित करना कि, आपके सेनाध्यक्ष ने आपके आदेश का पालन किया है और इस युद्ध को पूरी निष्ठा से लड़ा है.”

जिसके बाद आत्मविश्वास से भरी अहोम सेना ने युद्ध के दौरान लाचित की अहोम सेना ने अनेकों आधुनिक युक्तियों का प्रयोग किया. साथ ही उनके बनाए अनेकों नौका-पुलों ने उनकी मदद की. मुगलों के आकार में अहोम सेना काफी छोटी होने के बाद भी लाचित की सेना ने मुगलों पर दो दिशाओं से वार करना शुरू किया. जिससे मुगल सेना में हड़कंप मच गया और सांझ होते-होते मुगल सेना के तीन अमीर के साथ चार हज़ार सैनिक मारे गए. जिससे डरी मुगल सेना ने मैदान छोड़ दिया और मानस नदी की ओर चली गई. हालांकि इस युद्ध में लाचित बुरी तरह जख्मी हो गए और दुर्भाग्यवश इस युद्ध के कुछ दिनों बाद ही लाचित ने अपने प्राण त्याग दिए.

जिसके बाद सरायघाट की इस अभूतपूर्व विजय ने असम के आर्थिक विकास से लेकर सांस्कृतिक समृद्धि की आधारशिला तैयार कर डाली. इतना ही नहीं इसी तरह एक युद्ध 1682 में भी लड़ा गया. जिसमें अहोम सेना ने एक बार फिर मुगलों को भागने पर विवश कर दिया. वहीं लाचित की इस वीरगाथा का सम्मानित करने की खातिर पूरे असम राज्य में हर साल 24 नवम्बर को लाचित दिवस के रूप में मनाया जाता है. जिसमें राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को लाचित मैडल से सम्मानित किया जाता है.

इतिहास में लाचित बोड़फुकन का कोई चित्र मौजूद नहीं. हाँ मगर एक पुराने इतिवृत्त के वर्णन के अनुसार “लाचित का मुख चौड़ा था और वो किसी पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह चमकते दिखाई देते थे. यही वजह थी कि, कोई भी इंसान उनके चेहरे की तरफ आंख उठाकर नहीं देख सकता था.” हमारा इतिहास ऐसे ही न जानें कितनी ही वीर कहानियों से अटा पड़ा है. जरुरत है तो उसे जानने की और उन्हें सम्मान देने की

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

स्पेशल बच्चों को नई राह दिखाती रीता सक्सेना

Tue Dec 8 , 2020
Share on Facebook Tweet it Pin it Email आज आपको एक ऐसी महिला से परिचित करवाने जा रहे है जो एक गृहिणी है, एक मां है एवं उन लाखों बच्चों की एक आस है जिन्हें हमारा समाज अपाहिज कहकर ठुकरा देता है इनका नाम है रीता सक्सेना यह एक बहुत ही […]
रीता सक्सेना