जानिए कैसे दूरदर्शन के प्रोग्राम ने बदली संजीव सिंह की जिंदगी

देश में जिस समय टेलीविजन का चलन हुआ था. उस समय गाँव से लेकर शहरों तक में टेलीविजन देखने के लिए पूरा परिवार इकट्ठा हो जाता था. टेलीविजन पर उस समय दूरदर्शन आता था. जो शायद ही आज के समय में कोई देखता है. इसकी खास वजह है आज की डिजिटलाईजेशन…

जिसके चलते कई लोग अपना मनोरजंन करते हैं तो कई लोग इससे बहुत कुछ सीख रहे हैं. ठीक इसी तरह ही देश के एक किसान हैं संजीव सिंह टांडा.. गाँव के रहने वाले संजीव सिंह की उमर आज 54 साल है और अपनी छोटी उम्र में संजीव सिंह दूरदर्शन देखने के आदि थे. वो भी ठीक उन्हीं लोगों की तरह टी.वी देखा करते थे जैसे अन्य लोग.

हालांकि उन्हें दूरदर्शन पर आने वाला प्रोग्राम ‘मेरा पिंड मेरा गाँव’ काफी पसंद था. इसी प्रोग्राम में उन्होंने एक दिन मशरूम की खेती के बारे में देखा. जिसके बाद उन्होंने तुरंत ये निर्णय ले लिया कि आने वाले दिनों में संजीव मशरूम की खेती ही करेंगे. यही वजह है कि, साल 1992 में मशरूम की खेती शुरू करने वाले संजीव सिंह पिछले लगभग 30 सालों से इसकी खेती कर रहे हैं. जिसके चलते उन्हें आज लोग ‘मशरूम किंग’ कहते हैं.

संजीव सिंह बताते हैं कि, जिस समय मैंने वो प्रोग्राम देखा था, “उस समय मैंने पहली बार मशरूम की खेती के बारे में सुना था. उसी समय मैंने तय कर लिया था की आने वाले दिनों में मैं इसकी खेती करूंगा.”

यही वजह थी कि, संजीव सिंह ने आने वाले एक साल तर मशरूम पर शोध किया, मशरूम को किस तरह उगाया जाए, किस तरह इसको तैयार किया जाए इसके बारे में जाना. साथ ही उन्होंने मशरूम की बाजार के बारे में भी पता लगाया.

इसके साथ-साथ संजीव कहते हैं कि, “मैंने इस दौरान पंजाब कृषि विश्विद्यालय में मशरूम की खेती के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए एक कोर्स किया. जहां मैंने मशरूम को कैसे उगाया जाए. कैसे बोरियों में लटकाकर इसको तैयार किया जाए, सब कुछ सीखा. वहीं मैंने ये भी जाना की इस फसल को तैयार करने के लिए मिट्टी की नहीं बल्कि जैविक खाद की जरूरत होती है. जोकि आपको कहीं भी आसानी से मिल सकती है.”

मशरूम की खेती की शुरूआत थी चुनौती

संजीव सिंह बताते हैं कि, “जिस समय मैंने इसे अपने यहां मशरूम की खेती (mushroom cultivation) की सोची, उस समय सबसे ज्यादा समस्या ये थी कि, हमारे यहां कोई भी किसान इसकी खेती नहीं कर रहा था. न ही लोगों को मशरूम की खेती के बारे में मालूम था. यहां तक की स्थानिय बाज़ारो में इसके बीज तक नहीं मिलते थे. जिसके लिए मुझे दिल्ली आना पड़ता था.”

मशरूम की खेती के लिए अपनाया वैज्ञानिक तरीका

संजीव सिंह ने मशरूम की खेती (mushroom cultivation) की शुरूवात करने के साथ-साथ परंपरागत खेती की भी शुरूवात कि, ताकि आगे चलकर अगर कोई समस्या होती है तो उनके पास अतिरिक्त आय की जगह बनी रहे. जिसके बाद उन्होंने लगभग आठ सालों तक उच्च गुणवत्ता वाली मशरूम की खेती शुरू की. साथ-साथ उन्होंने मशरूम का स्थिर बाजार बनाने के लिए भी अपना संघर्ष शुरू किया.

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मशरूम की खेती के लिए बनवाया कमरा

संजीव कहते हैं कि, “लगभग आठ साल बाद 2001 में मैं सबसे पहले अपने यहां एक कमरा बनवाया. जहां मैंने छह मेटल की रैक तैयार करवाई. जिसके बाद मैंने उस पर खाद की बोरियां भरकर रखा. इन बोरियों में मैंने जैविक खाद रखी. जिसमें नाइट्रोजन के साथ यूरिया बराबर मात्रा में मिलाई थी.”

फिर धीरे-धीरे बिजनैस अच्छा चलता रहा. और फिर मैंने साल 2008 आते-आते अपना पहला ‘कम्पोस्ट यूनिट’ तैयार किया. जहां संजीव ने मशरूम की खेती के साथ-साथ मशरूम के बीज बनाने भी तैयार किए. तब तक उनकी मशरूम की खेती एक कमरे से निकलकर 1500 वर्ग फुट तक फैल गई. यानि को लगभग दो एकड़ जमीन में.

अपनी इन बुलंदियों को लेकर संजीव कहते हैं कि, “ये मेरी दिन-रात की मेहनत का नतीजा था की मशरूम की खेती में मेरा व्यापार बढ़ रहा था. मेरा उत्पादन हर रोज सात क्विंटल तक पहुंच चुका था. मेरे द्वारा तैयार किए गए बीज और मशरूम के अन्य उत्पाद जम्मू, हरियाणा, जालंधर से लेकर देश के अन्य राज्यों में जाने लगे. आज यही वजह है कि, मेरी सालाना कमाई लगभग 1.25 करोड़ रुपये से अधिक है.” आज संजीव जिस तरह से मशरूम की खेती कर रहे हैं. आज हर रोज अलग बुलदियों को छू रहे हैं. यही वजह है कि, स्थानिय लोग उन्हें पंजाब का ‘मशरूम किंग’ कहते हैं.

मशरूम का बाजार

मशरूम के बाजार पर बोलते हुए संजीव कहते हैं कि, “मशरूम के लिए बाजार मिलने की संभावना आजा के समय में ज्यादा है. लेकिन लोगों के लिए खेती की जगह सीमित रह गई है. ऐसे में ‘वर्टीकल खेती’ खड़ी खेती के जरिए मशरूम को बेहतर तरीके से उगाया जा सकता है. जोकि कम जगह में तैयार हो जाएगी. साथ ही मशरूम को कभी भी उगाया जा सकता है और किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं.” आज अपनी महज दो एकड़ जमीन में मशरूम की खेती करने वाले संजीब करोड़ो कमा रहे हैं. जबकि परंपरागत खेती के तरीके से उन्हें करोड़ो कमाने के लिए लगभग 100 एकड़ से ज्यादा जमीन की जरूरत होगी.

संजीव सिंह की इसी मेहनत को देखते हुए साल 2015 में राज्य की सरकार ने प्रगतिशील खेती के तरीकों के लिए सम्मानित किया था. इसके साथ अन्य कई तरह की उपलब्धियों से अब तक उन्हें नवाजा जा चुका है.

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