के.एम.करियप्पा- भारत के पहले सेना चीफ के रोचक किस्से

देश को आज़ाद कराने की खातिर अनेकों देशभक्तों से लेकर अनेकों वीरों ने अपनी जान गंवाई है. यही वजह है कि, आज भी आज़ाद भारत उन सभी का शहीदों का ऋणी है. ऐसे में जिस समय भारत आज़ाद हुआ वो एक ऐसा समय था. जब भारत में रह रहे नेताओं से लेकर सेना को संभालने तक का अनुभव नहीं था. ऐसे में देश का प्रधानमंत्री बनने से लेकर देश की सेना की कमान संभालने की चर्चा जोर पकड़ा करती थी.

जिसके बाद जनरल के.एम. करियप्पा ने भारतीय सेना की कमान संभाली थी. चलिए आज हम आपको करियप्पा की ज़िदगी के बेहतरीन किस्से बताते हैं. शुरूवात यहां से की भारतीय सेना में आज़ादी के बाद से आज तक महज़ दो लोगों को फाइव स्टार रैंक मिली है. एक जनरल मॉनेकशॉ और दूसरे जनरल के.एम. करियप्पा को.

के.एम.करियप्पा को सेना प्रमुख बनाने पर मनाया जाता है सेना दिवस

  • के.एम. करियप्पा के नाम से मशहूर जनरल का नाम कोडनान मडप्पा करियप्पा था. जोकि भारत की आज़ादी के बात पहले चीफ ऑर्मी स्टाफ थे. हालांकि बहुत से लोग इन्हें किपर के नाम से भी जानते थे. करियप्पा ने 30 साल भारतीय सेना में दिए.
  • 15 जनवरी 1949 में जनरल करियप्पा को सेना प्रमुख बनाया गया था. यही वजह रही कि उसके बाद से इस दिन को ‘सेना दिवस’ के तौर पर मनाया जाने लगा. जनरल करियप्पा राजपूत रेजिमेंट से थे. करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक के कोडागू में हुआ था. जबकि 15 मई 1993 को जनरल करियप्पा ने दुनिया को अलविदा कहा.
  • अब आप सोच सकते हैं कि, महज़ 4 साल के अंदर रिटायर होने के बाद भी लोग इन्हें इतना क्यों मानते हैं. हालांकि ऐसा नहीं है. जनरल करियप्पा रिटायर होने के बाद भी सेना से हमेशा जुड़े रहे और सेना की हरसंभव मदद करते रहे.

जब के.एम.करियप्पा के बेटे ने गलती से पाकिस्तान की सीमा में किया प्रवेश

करियप्पा की ज़िदगी की सबसे चर्चित घटना तब हुई थी. जिस समय भारत-पाकिस्तान का 1965 में युद्ध शुरू हुआ था. उस समय करियप्पा रिटायर हो चुके थे. रिटायर होने के बाद करियप्पा अपने गृहनगर मेरकारा में रहा करते थे. जबकि उनके बेटे के.सी. करियप्पा भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात थे. जब युद्ध शुरू हुआ तो युद्ध लड़ते वक्त के.सी. करियप्पा पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश कर गए और पाकिस्तानी सैनिकों ने उनके विमान पर हमला कर दिया. जिसकी वजह से उन्हें अपने विमान से कूदना पड़ा और नतीजा ये रहा कि, उन्हें युद्ध बंदी बना लिया गया. जिसके बाद पाकिस्तानी रेडियो न तुरंत ऐलान कर बताया की नंदा करियप्पा उनकी गिरफ्त में हैं और पूरी तरह सुरक्षित हैं. ये वो समय था. जिस समय पाकिस्तान के के राष्ट्रपति पूर्व सेना प्रमुख जनरल अयूब खान हुआ करते थे. हालांकि देश के बंटवारे के पहले अयूब खान जनरल करियप्पा के अंडर आर्मी में काम कर चुके थे.

यही वजह रही कि, जिस समय अयूब खान को करियप्पा के बेटे की बात पता चली तो उन्होंने रिटायर जनरल करियप्पा को फोन किया और उनके बेटे को तुरंत रिहा करने की बात कही. इतना ही नहीं..इसके बाद अयूब खान की पत्नी और उनका बड़ा बेटा अख्त़र अयूब नंदा करियप्पा से मिलने पहुंचे. एयरमार्शल करियप्पा उस घटना को याद करते हुए बताते हैं कि, “उस मुलाकात के दौरान वो मेरे लिए स्टेट एक्सप्रेस सिगरेट और वुडहाउस का एक उपन्यास लेकर आए थे”

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इस अलावा जिस समय आज़ाद भारत में प्रधानमंत्री पद से लेकर अन्य कई पदों पर उस काबिल लोगों की तलाश की जा रही थी. उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने एक मीटिंग की थी. जिसमें सभी नेता के साथ उच्च आर्मी ऑफिसर मौजूद थे. जिसमें देश का पहला आर्मी चीफ किसे बनाया जाए इस बात पर चर्चा हो रही थी. उस समय पंडित नेहरू ने कहा था कि, मुझे लगता है की हमें किसी अंग्रेज़ को हमारी भारतीय सेना का आर्मी चीफ बनाना चाहिए. इसकी वजह ये है कि, हमारी सेना के पास अभी वो अनुभव नहीं है. उस मीटिंग में मौजूद उस समय अधिकतर लोगों ने हाँ कहा था. जिसकी वज़ह ये थी कि, नेहरू का विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी. हालांकि उसी समय पीछे से एक आवाज़ आई, ‘मैं कुछ कहना चाहता हूँ’. जब पंडित नेहरू ने उन्हें बोलने की इज़ाजत दी तो उन्होंने कहा कि, “हमारे पास अगर सेना को लीड करने का अनुभव नहीं है तो, देश को भी लीड करने का अनुभव नहीं है….तो क्यों न हम किसी अंग्रेज़ को भारत का प्रधानमंत्री बना दें”.

ये वो समय था जब सभी शांत हो गए थे. नेहरू ने इसके जवाब में उनसे पूछा तो क्या आप इंडियन आर्मी के पहले जनरल बनने को तैयार हैं? मौका बेहद अच्छा था. देश का पहला सेना चीफ बनने का…हालांकि उन्होंने नेहरू को जवाब दिया की सर हमारे बीच ऐसा व्यक्ति बैठा है जो ये जिम्मेदारी निभा सकता है. जिनका नाम है लेफ्टिनेंट जनरल करियप्पा और सभी की नज़न करियप्पा तक पहुंच गई. इस सुझाव के बाद लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौर बैठ गए और बाद में जनरल करियप्पा को सेना चीफ बना दिया गया.

साऊथ से होने की वजह करियप्पा की हिंदी काफी कमज़ोर थी. यही वजह थी कि, कई लोग उन्हें ब्राउन साहिब भी कहते थे. देश की आज़ादी के बाद उन्होंने आर्मी ट्रूप्स को संबोधित किया था. इस दौरान उन्होंने हिंदी में भी वहां मौजूद लोगों को संबोधिक किया था. उन्होंन कहा कि, इस वक्त आप मुफ्त हैं, हम मुफ्त हैं, मुल्क मुफ्त है, सब कुछ मुफ्त है. हालांकि उस समय जनरल करियप्पा कहना चाहते थे कि, Country is free and so are all of us. इसी तरह एक अन्य मौके पर उन्होंने सैनिकों की पत्नियों को संबोधित करते हुए कहा कि, “माताओं और बहनों, हम चाहता है की आप दो बच्चे पैदा करो. एक बच्चा अपने लिए और दूसरा हमारे लिए.” हालांकि उनके कहने का मतलब था की दो बच्चे पैदा करो. एक घर रह सके और दूसरा बच्चा आर्मी ज्वाइन कर सके.

अपनी रिटायरमेंट के पहले एक बार जनरल करियप्पा जिस समय राजपूर रेजीमेंटल सेंटर विज़िट करने जा रहे था. उस समय उनके दोनों बच्चे उनके साथ थे. हालांकि उन्होंने अपने बच्चों को एक प्राइवेट कार में कमांडेट के घर भेज दिया. उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि ऑफिसर्स मेस में बच्चों को ले जाने की अनुमति नहीं थी. हालांकि उनका ओहदा इतना था कि, उन्हें कोई रोकता नहीं. फिर भी उन्होंने अपने बच्चों को वहां ले जाना उचित नहीं समझा.

जनरल करियप्पा के बेटे एयर मार्शल के.सी करियप्पा ने बाद में अपनी किताब लिखी. जिसमें उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर इस बात के डर का जिक्र किया था कि, पंडित नेहरू को लगता था की मेरे पिता उनका तख्तापलट कर सकते हैं, यही वजह थी कि, नेहरू ने 1953 में मेरे पिता को ऑस्ट्रेलिया का हाई कमिश्नर बनाकर भेज दिया. नेहरू के इस डर की वजह ये थी कि, मेरे पिता जी आर्मी के साथ-साथ पॉलिटिकली भी काफी पॉपुलर थे.

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