Jayamma Bhandari- वो शख्सियत जिसने बदली कई तवायफों की जिंदगी

उन्ही में से एक है, तेलंगाना की जयम्मा भंडारी। जयम्मा ने अपनी जिंदगी बदलने के लिए ही लड़ाई नही लड़ी बल्कि देश में पनपते देह व्यापार में धकेल दी गईं कई बच्चियों और महिलाओं की जिंदगी संवारने का भी बीड़ा उठाया।

निर्भया का नाम आज कई लोग जानते हैं। आज भी निर्भया के जख्म लोगों के दिलो में जिंदा हैं। निर्भया का असली नाम जो भी हो, लेकिन एक रात सामूहिक बालात्कार का शिकार होने के बाद अपने हमलावरों से लड़ने और अपने जख्मों की वजह से दम तोड़ने से पहले कई दिनों तक अपने जीवन के लिए वो मौत से लड़ती रही। भले ही उसकी हिम्मत ने आखिर में आकर दम तोड़ दिया हो। मगर उसके इस संघर्ष के चलते हर उस साहसी महिला को निर्भया का नाम दिया गया जो निडर भाव से समाज के लिए मिसाल बन रही हैं।

जयम्मा का संघर्ष तीन साल की में ही शुरु हो गया था। तीन साल की उम्र में उनके सिर से मां बाप का साया उठा गया। बहुत गरीबी में बचपन बिताने के बाद शादी होने पर जयम्मा को लगा कि उनकी जिंदगी शायद अब बदल जाएगी, लेकिन शादी के बाद खुद उनके पति ने ही उन्हें देह व्यापार में धकेल दिया। लेकिन जयम्मा ने इस गंदे धंधे में धकेल दी गई अन्य पीड़िताओं की तरह हार मानकर अपनी किस्मत से समझौता नहीं किया, बल्कि इससे लड़ने का फैसला किया और अपने जैसी कई अन्य महिलाओं के लिए वो आज प्रेरणा बन चुकी हैं।

Jayamma Bhandari- जब खुदका ही पति रक्षक से बन जाए भक्षक

दरअसल, मां बाप का साया सर से उठ जाने पर उन्हें रिश्तेदारों के साथ रहना पड़ा। रिश्तेदार जयम्मा को बोझ समझते थे और उनसे जल्द से जल्द छुटकारा पाना चाहते थे बस इसे के चलते रिश्तेदारों ने मौक़ा मिलते ही जयम्मा की शादी करवा दी। शादी के बाद जयम्मा के लिए हालात बद से बद्तर होते गए। जयम्मा का पति उनका शारीरिक और मानसिक दोनो ही तरह से शोषण करने लगा था।

और हर तरह का दबाव बनाने के बाद भी जब उनके पति को कुछ हासिल नहीं हुआ तो बेटी होते ही पति ने जयम्मा को जिस्मफ़रोशी के धंधे में झोंक दिया। वैसे तो हमारे समाज में पति, पिता और भाई तीनों को ही महिलाओं की इज्जत का रक्षक माना जाता है, लेकिन जयम्मा के तो पति ने ही उसकी इज्जत को बाजार में बेच दिया था. और जयम्मा को मजूबरन वो सब करना पड़ा जिसके महज खयाल से ही किसी की रूह कांप जाती है।

अपने दर्दभरे दिनों में जयम्मा ने कई बार अपनी जान लेने की कोशिश की, लेकिन जवान बेटी के ख़्याल ने उन्हें हमेशा रोक लिया। बेटी के अच्छे भविष्य की फिक्र ने ही जयम्मा के अंदर बेशुमार हिम्मत भरी। उन्होंने तय कर लिया कि, अपनी बच्ची और तमाम बच्चियों के लिए उन्हें अवाज उठानी ही होगी।

ज़िंदगी से ज़ुल्म के सिवाय जयम्मा को कुछ भी हासिल नहीं हुआ, लेकिन इसके बावजूद भी उनका हौंसला कभी नहीं टूटा। और बस उसी समय जयम्मा की मुलाक़ात जय सिंह थॉमस से हुई, जो एक एनजीओ के साथ काम कर रहे थे। जय सिंह ने जयम्मा से मुलाक़ात के दौरान ही उनके अंदर छिपी एक क्रांतिकारी महिला को पहचान लिया था। उन्होंने जयम्मा को सलाह दी कि वह सेक्स वर्कर्स के कौशल विकास पर काम करें और उन्हें अपने पैरों पर खड़े होना सिखाएं।

Jayamma Bhandari- जय सिंह ने जयम्मा को दिखाया नई जिंदगी का रास्ता

जय सिंह ने ही उन्हें को-ऑर्डिनेटर की नौकरी का ऑफ़र दिया और जयम्मा नौकरी करने लगीं। 2001 में जयम्मा ने अपनी नौकरी छोड़ी और आंध्र प्रदेश में चैतन्य महिला मंडली की स्थापना की। इस मंडली का मकसद ही जिस्मफ़रोशी के धंधे में पड़ी महिलाओं को बाहर निकालना और उन्हें रोजगार के दूसरे तरीको के बारे मे बताना है।

ये संगठन कई मुद्दों पर झुग्गी बस्तियों में जागरूकता अभियान भी चलाता है। बता दे कि, जयम्मा अब तक 5 हजार महिलाओं के जीवन में बदलाव ला चुकी हैं, ऐसी ही 1 हजार महिलाओं को रोजगार दिला चुकी हैं और उनके बच्चों को कौशल विकास योजनाओं से जोड़ चुकी हैं। उनके इस काम को देखते हुए महिला दिवस के दिन राष्ट्रपति ने उन्हें सम्मानित भी किया।

हालांकि जयम्मा के पति उनकी इस नई यात्रा से खुश नहीं थे और उन्हें पति के गुस्से और मार पिटाई का शिकार होना पड़ा। आखिरकार 2012 में अपनी बेटी की मदद से जयम्मा ने साहस जुटाकर अपने पति को उनकी जिंदगी से दूर चले जाने को कह दिया। जयम्मा और उनका संगठन उनके जैसी ही अन्य पीड़िताओं तक पहुंचने का प्रयास करते हैं, और  उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि अगर वो चाहें तो उनकी जिंदगी में भी उजाला हो सकता है।

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