‘सेकंड चांस’ चलाने वाले जैसपर ने बनाए 150 से ज्यादा माता-पिता

किसी मंदिर-मस्जिद या फिर किसी फुटपाथ से गुजरते अक्सर हमने कई ऐसे लोगों को देखा होगा. जो भीख मांगते हैं. जिनके पास न तो रहने का कोई ठीक ठिकाना होता है और न ही कहीं कुछ करने का बसर. ऐसे में हम में से कई लोगों के अंदर इन लोगों की मदद करने का ख्याल जहन में आया होगा. लेकिन हम इनके लिए क्या कर सकते हैं. यह सोचकर हम आगे बढ़ गए होंगे. जिसकी वजह है पैसा, जहाँ आज के दौर में खुद का खर्चा उठाने का पैसा नहीं है. ऐसे में किसी बेसहारा के लिए हम कहाँ से पैसा लाकर उसकी देखभाल कर पाएगें. लेकिन आज जिसके बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं. उसकी कहानी आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि, अगर हौसलों में उड़ान हो तो कुछ भी किया जा सकता है.

कहानी है हैदराबाद के रहने वाले इंजीनियर जैसपर पॉल की, जिन्होंने इंजीनियरिंग से ग्रैजुएट किया है. जोकि आज उन लोगों के लिए काम कर रहे हैं जो लोग सड़कों पर बेसहारा नज़र आते हैं. इन्हीं लोगों के लिए जैसपर पॉल ने आश्रय-गृह बनाया है. हालांकि एक समय था. जब उन्हें भी मालूम नहीं था कि, आखिर ये सब वो कैसे कर सकेंगे. लेकिन आज अपने नेक इरादों के चलते जैसपर लोगों की मदद कर रहे हैं. साथ ही करोड़ों रुपए की फंडिंग भी प्राप्त कर रहे हैं. जिससे उन बेसहारा लोगों की देखभाल हो सके. जिसके लिए उन्होंने एक संगठन ‘सेकंड चांस’ Second Chance बनाया है

सड़क हादसे ने बदली जैसपर की जिंदगी

आज अपने संगठन ‘सेकंड चांस’ Second Chance के जरिए भले ही जैसपर लोगों की मदद कर रहे हैं. हालांकि शुरुवाती समय में उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि, वो कुछ ऐसा करेंगे. अपनी 25 साल की जिंदगी पूरी करने वाले जैसपर कहते हैं कि, “इसकी शुरुवात साल 2014 में हुई. जिस समय मैं एक सड़क हादसे का शिकार हुआ था. उस समय मेरी उम्र लगभग 19 साल थी. हादसा इतना भीषण था कि, सड़क पर पलटी गाड़ी ने कई बार पलटा खाया. लेकिन फिर भी मैं बाल-बाल बच गया और यही जिंदगी ने मुझे मेरा ‘सेकंड चांस’ दे दिया.”

यही से बदली जैसपर की जिंदगी में उन्होंने सोच लिया था कि, अब वो अपनी जिंदगी किसी अच्छे काम में लगाएंगे. हाँ मगर कौन सा ये उन्हें नहीं मालूम था.

ऐसे शुरु हुआ ‘सेकंड चांस’ Second Chance संगठन

जैसपर कहते हैं कि, “एक दिन में शहर के सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन जा रहा था की तभी मेरी नज़र वहां के फुटपाथ पर बेसुध पड़ी एक बुजुर्ग मिहाला पर पड़ी. उस महिला के हाथ में चोट लगी थी. उस चोट पर मक्खियां भिनभिना रही थी. हाँ मगर उस समय मैं वहां से आगे निकल गया. लेकिन मुझसे रहा नहीं गया. मैं फिर उस महिला के पास वापस लौटकर आया. मैंने उनसे बात की तो मालूम चला कि, वो बेसहारा हैं और उन्हें ये चोट काफी वक्त पहले लगी थी. यही वजह रही कि, मैंने एक पुलिस कांस्टेबल की मदद लेकर उन्हें अस्पताल पहुंचाया और उनका इलाज़ करवाया. लेकिन इस दौरान उनके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था. जिसके चलते मैंने उनका रहने का इंतजाम एक आश्रय-गृह Shelter home में करवा दिया. इस दौरान मैंने एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी. जिसके चलते उनका परिवार उन्हें मिल गया और वो आकर उन्हें वहां से ले गए.”  

इस सुकून भरे काम के बाद जैसपर ने ठान लिया की अब वो आगे यही काम करेंगे. जिसके चलते उन्होंने अपने शहर के आश्रय-गृहों (shelter home) और सामाजिक संगठनों के साथ काम करना शुरु कर दिया. हालांकि हर जगह उन्हें कुछ न कुछ ऐसा लगता था की ये सही नहीं है. इन्हीं सबसे परेशान होकर और कुछ अच्छा करने की फिराक में जैसपर ने साल 2017 में अपना संगठन ‘सेकंड चांस’ Second-Chance शुरु किया.

ऐसे करते हैं जैसपर बेसहारा लोगों की मदद

जैसपर कहते हैं कि, हमारी संस्था ने अपना नंबर पुलिस स्टेशन लेकर अन्य कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच बांट रखे हैं ताकि, उन्हें जब भी कोई बेसहारा या बुजुर्ग रास्ते या फुटपाथ पर भटकता मिले तो वो उन्हें फोन कर बता दें. ऐसे में हैदराबाद पुलिस भी बेसहारा लोगों को रेस्क्यू कर उन्हें हमारे पास भेजती है. जैसपर कहते हैं कि, “पूरे हैदराबाद में हमारे तीन केंद्र हैं. जिनमें हम रेस्क्यू के जरिए आए बेसहारा लोगों को ले जाते हैं. ये सभी केंद्र किराए पर लिए गए हैं. ऐसे में सबसे पहले हम अपने पहले केंद्र जोकि यापरल में है. वहाँ बुजुर्गों और बेसहारा लोगों को ले जाते हैं. जहाँ उन्हें नहलाने-धुलाने से लेकर डॉक्टर उनकी स्वास्थ्य की जाँच करता है. अगर वो स्वस्थ्य नहीं होते तो उन्हें चिकिस्सा दी जाती है. जबकि स्वस्थय बुजुर्गों और बेसहारा लोगों को हम अपने अन्य केंद्र जोकि, चेरापल्ली और घाटकेसर में है. वहां ले जाते हैं. जहाँ उनके खाने, रहने, सोने तक का पूरा इंतजाम हमने किया हुआ है.” 

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आज जैसपर की सच्ची लगन और बेसहारा लोगों के प्रति जिम्मेदार रवैया को देखते हुए जैसपर के साथ छह डॉक्टरों की टीम जुड़ी है. जो बिना किसी फीस के उनकी मदद करती है. उन्हीं डॉक्टरों में से एक डॉक्टर हैं डॉ. जी. एस. कार्तिक जो बताते हैं कि, “शुरुवाती समय में मैं अपने दोस्त के कहने पर उसके साथ यहाँ आया था.

यहाँ आकर देखा कि, कैसे लोग यहां आते हैं, अनेकों ऐसे लोग आते हैं. जिनके घाव सड़ चुके होते हैं. उनमें कीड़े पड़े होते हैं. घाव से बदबू आ रही होती है. फिर भी ये लोग उनकी मदद करते हैं. उनके घाव साफ करते हैं. उन्हें रहने खाने से लेकर उनकी देखभाल करते हैं.” तभी से ‘सेकंड चांस’ Second Chance से जुड़ने वाले कार्तिक को जब भी वक्त मिलता है तो, वो इन केंद्रों पर जाकर बेसहारा लोगों का इलाज़ करते हैं.

बिछड़ो से मिलाता है ‘सेकंड चांस’

यूँ तो इन केंद्रों पर ज्यादातर ऐसे लोग आते हैं. जिन्हें अपनी सुध तक नहीं होती. हालांकि फिर भी उनका इलाज किया जाता है और जब उनकी स्थिति ठीक होती है तो, उनके बात कर उनके घर वालों का पता लगाया जाता है.

यही वजह है कि, अब तक ‘सेकंड चांस’ Second Chance 1500 से ज्यादा लोगों की मदद कर चुका है. जब 70 लोगों को उनके घर पहुंचा चुका है. जबकि उनके तीनों केंद्र पर कुल मिलाकर 150 से ज्यादा लोग रह रहे हैं.

‘सेकंड चांस’ टीम आज जहां बेसहारा लोगों की मदद करती है. वहीं दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों से लेकर अन्य जगह पर पड़े लावारिस लोगों की जिम्मेदारी लेती है. साथ ही उनकी मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार कराती है.

‘सेकंड चांस’ Second Chance की फंडिंग

जैसपर बताते हैं कि, मैंने जब से ये काम कर रहा हूँ. इसमें सबसे ज्यादा मदद मेरी पत्नी, तैरिसा करती हैं. हमने अपनी आजीविका के लिए अपना खुद का फूड बिजनेस शुरू किया है. जहां की कमाई का हिस्सा हम यहां लगाते हैं. हालांकि इससे ये संगठन नहीं चल सकता. ऐसे में हम सोशल मीडिया के जरिए लोगों से मदद मांगते हैं और लोग हमारी मदद करते हैं. अनेकों ऐसे लोग हैं जो यहां आते हैं, बुजुर्गों को देखते हैं और यहां से खुश होकर संगठन में फंड देते हैं.

यही वजह है की जैसपर कहते हैं कि, “अगर आप कहीं भी किसी बुजुर्ग को बेसहारा देखते हैं तो उन्हें यूँ अकेला ना छोड़े. आप हमें हमारे नंबर 080108 10850 पर फोन करके हमारी टीम को बता सकते हैं. हमारी टीम जितनी जल्द हो सकेगी उनकी मदद के लिए पहुंचेगी. ताकि वो लोग यूँ बेसहारा न रह जाएं.”

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