Jamini Roy : जिन्होंने चित्रकारी को दिया नया आयाम

हमारे देश में बहुत से माहन चित्रकार हुए हैं और उन्हीं में से एक है जामिनी रॉय लेकिन वो बाकी चित्रकारों से इस मायने में अलग है क्योंकि उन्होंने चित्रकारी की परंपरागत शैली अपनाने की बजाय अपनी ख़ुद की शैली बनाई। आज तो ऐसे कई माध्यम हैं जो चित्रकारों को एक मंच एक पहचान देते हैं। मगर, जामिनी रॉय उस दौर में भी मशहूर हुए जब चित्रकारों को आज जैसी इज्ज़त नहीं मिलती थी। चलिए, आपको बताते हैं भारत के इस महान चित्रकार से जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।

Jamini Roy

Jamini Roy : एक ऐसा महान चित्रकार, जिनका काम राष्ट्रीय धरोहर माना जाता है

जामिनी रॉय की गिनती आधुनिक कलाकारों में होती है, क्योंकि उनकी सोच अपने समय से काफ़ी आगे की थी। 1887 में जन्में जामिनी रॉय ने महान चित्रकार अबनिन्द्रनाथ टैगोर से कला की शिक्षा ली। रॉय ने यूरोपियन आर्ट की क्लासिक परंपरा की शैली की बजाय आदिवासी कला से चित्रों को बनाना शुरू किया। उन्होंने चटाई, कपड़े और लकड़ी पर भी चित्रकारी की। उन पर ‘कालीघाट पाट स्टाइल’ का बहुत असर था, जिसमें मोटे ब्रश स्ट्रोक का इस्तेमाल होता था। रॉय ने एशियाई शैली, पक्की मिट्टी से बने मंदिरों की कला, लोक कलाओं की वस्तुओं और शिल्प परम्पराओं से प्रेरणा ली। उनके चित्रों में गांव के दृश्य, जानवर और खुशहाल लोग दिखते थे। रॉय ने संथाल महिलाओं के पोर्ट्रेट भी बनाए, जिसमें उन्होंने नई उभरती शैली का प्रयोग किया। आसपास की घटनाओं और लोगों का चित्रण करने के साथ ही उन्होंने रामायण, महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों की घटनाओं को भी कैनवस पर उतारा। कृष्ण लीला का उनका चित्रण बहुत मशहूर हुआ था। रॉय सभी धर्म का सम्मान करते थे, तभी तो हिंदू देवी-देवताओं के साथ ही उनकी कला में ईसाई धर्म को भी जगह दी गई। उन्होंने अपने समय में ईसाई धर्म से जुड़ी पौराणिक कथाओं का चित्रण भी बहुत ही खूबसूरती से किया। जामिनी रॉय की मशहूर कलाकृतियों में क्वीन ऑन टाइगर, कृष्णा एंड बलराम, गोपिनी, वर्जिन एंड चाइल्ड, वॉरियर किंग आदि शामिल हैं। रॉय की खासियत थी भारतीय संस्कृति से उनका प्यार, तभी तो अपनी कला में वो पश्चिमी कैनवास, पेंट का इस्तेमाल नहीं करते थे।

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Jamini Roy : जिनके जैसा पेंटर फिर ना हुआ

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रॉय ने कला को कभी पैसों में नहीं तौला। अगर उन्हें पता चलता कि उनकी पेंटिंग खरीदने वाला कोई शख्स अगर पेंटिंग की ठीक से देखभाल नहीं कर रहा है, तो वो उसे दोबारा खरीद लेते थे। उनकी कला की प्रदर्शनी पहली बार सन् 1938 में कोलकाता के ‘ब्रिटिश इंडिया स्ट्रीट’ पर लगी थी। 1940 के दशक में वो बंगाल के मीडिल क्लास लोगों और यूरोपिय समुदाय में बहुत मशहूर हो गए थे। जामिनी रॉय को उनके बेहतरीन काम के लिए भारत सरकार ने 1955 में पद्मभूषण से सम्मानित किया था। 24 अप्रैल 1972 को रॉय दुनिया को अलविदा कह गए। उनकी मौत के 4 साल बाद सरकार ने उन्हें उन 9 मास्टर्स में शामिल कर लिया, जिनके काम को राष्ट्रीय धरोहर माना गया। वहीं, रॉय को उनके ‘मदर हेल्पिंग द चाइल्ड टु क्रॉस ए पूल’ चित्र के लिए 1934 में वाइसरॉय का स्वर्ण पदक मिला था। जामिनी रॉय भारत के महान चित्रकारों में से एक थे। उन्हें 20वीं शताब्दी के महत्व पूर्ण आधुनिकतावादी कलाकारों में एक माना जाता है। आज भी उनकी बनाई हुई कई म्यूज़ियम की शोभा बढ़ा रही है।

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