एक दिन की खातिर, दादरा और नगर हवेली का प्रधानमंत्री बनने की दिलचस्प कहानी

इतिहास हमेशा देश-दुनिया की दास्तां सुनाता है. ऐसे में इतिहास में समेटे कई किस्से ऐसे होते हैं. जो रोचक तो होते हैं. हालांकि उनके बारे में ज्यादातर लोगों को मालूम नहीं होता. कुछ ऐसा ही किस्सा है भारत के गुजरात के बीच बसे हुए 500 स्क्वायर किलोमीटर से भी कम क्षेत्रफल वाले दादरा और नगर हेवली को. हरे-भरे जंगल, खूबसूरत झीलों और ऐतिहासिक भवनों से घिरा ये प्रदेश इतिहास की कई अनूठी घटनाओं को अपने अंदर समेटे है. चलिए उन्हीं किस्सों में से एक किस्से के बारे में हम आपको आज बताते हैं. बात है साल 1961 की. जिस समय दादरा और नगर हवेली जोकि भारत का अहम हिस्सा है. उसे उस प्रदेश के एक दिन के लिए बने प्रधानमंत्री ने चलाया था.

भारत का अहम अंग होने के नाते अगर आप सोच रहे हैं कि, दादरा और नगर हवेली का खुद का प्रधानमंत्री! तो आप बिल्कुल सही हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि, आखिर इस प्रदेश को अपने खुद के प्रधानमंत्री की क्या जरूरत आन पड़ी. तो बात ये है कि, भारतीय राजनीती के अनोखे किस्सों के कारनामों की लिस्ट हमारे सोचने से भी कई ज्यादा लंबी है.बात है अठारहवीं सदी की, जिस समय मराठाओं की हार के चलते दादरा और नगर हवेली पुर्तगाल के अधिकार में चल गया.

इस दौरान 1738 में मराठा नौसेना ने पुर्तगाली फ्रिगेट सैंटाना को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था. इसी के मुआवजे के तौर पर मराठाओं को नगर हवेली पुर्तगालियों कोसौंपना पड़ा था. इसी के दो साल बाद ही पुर्तगालियों ने दादरा पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया था और इसे अपनी मिल्कियतबना दिया था. ताकि पुर्तगाली इस पर अपना शासन चला सके.ऐसे में गुलामी की जंजीर में लिपटे भारत में जिस समय मराठा सेना साल 1818 के एंग्लो-मराठा युद्ध में अंग्रेजों से पराजित हुई.

दादरा और नगर हवेली पर पुर्तगालियों का शासन

उस समय दोनों ही प्रदेशों में पूरी तरह से पुर्तगालियों का शासन छा गया. जहाँ देश के अन्य हिस्सों में स्वतंत्रता की चिंगारी भड़की, वहीं इन सबके बावजूद भी दोनों प्रदेशों पर पुर्तगालियों का शासन जस का तस बना रहा. यहाँ तक कि, साल 1947 में जिस समय भारत देश आजाद हुआ तो, अंग्रेज देश छोड़कर चले गए.

हालांकि उसके बाद भी उनका शासन गोवा, दादरा और नगर हवेली पर जस का तस ही रहा. आजादी के पहले जहाँ फ्रांस पांडिचेरी से अपना शासन छोड़ चुका था तो भी पुर्तगाली भारत के इन तीनों क्षेत्रों पर राज कर रहे थे. इन क्षेत्रों की आजादी की खातिर जहाँ अंतर्राष्ट्रीय सम्मति भी पुर्तगालियों से इन क्षेत्रों को खाली नहीं कर सकी तो, गोवा में राष्ट्रवादियों ने पुर्तगाल से आजादी के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया. अपनी आजादी की खातिर यहाँ के लोगों ने अन्य दलों से मिलकर काम करना शुरू कर दिया. इस समय भारत की मशहूर स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने भी इन क्षेत्रों की आजादी की खातिर, अपना समर्थन दिया और उन्होंने पुणे में एक कॉन्सर्ट कर चंदा इकट्ठा किया. जिससे यहां के क्रांतिकारी जंग के लिए हथियार खरीद सकें.

ऐसे में अपनी आजादी की खातिर लड़ते इन क्षेत्रों में पहली सफलता 21 जुलाई 1954 को मिली. जिस समय दादरा को पुर्तगालियों से पूरी तरह आज़ाद कर लिया गया. इसी के दो हफ्ते के भीतर ही नगर हवेली को भी पुर्तगालियों से आजाद कर लिया गया.अपनी आजादी के बाद इन क्षेत्रों ने जहाँ भारत का अभिन्न अंग बनने की कही, तो दूसरी ओर तिरंगे और भारतीय राष्ट्रगान की धुन पर यहां आज़ादी का जश्न मनाया गया. इस दौरान यहाँ एक ‘वरिस्ता पंचायत’ बनाई गई. जिसने 1 जून 1961 तक इन क्षेत्रों पर राज किया और फिर औपचारिक तरीके से भारतीय संघ से जुड़ने की इच्छा जताई.

जब के. जी. बदलानी को बनाया गया दादरा और नगर हवेली का प्रधानमंत्री

ऐसे में दोनों क्षेत्रों का भारत में एक संघीय क्षेत्र के तौर पर भारत में विलय होना बाकी थी.जिसके चलते उस समय भारतीय सरकार ने यहां अपना एक दूत भेजा ताकि, यहां के प्रशासन पर पूरी तरह से नियंत्रण किया जा सके और जिस इंसान को ये जिम्मेदारी दी गई वो थे,गुजरात कैडर के आईएएस अफसर के. जी. बदलानी.

ऐसे में दोनों क्षेत्रों का भारत में विलय कराने की खातिर के. जी. बदलानी को एक स्वतंत्र राज्य दादरा और नगर हवेली का प्रधानमंत्री बनाया गया. ताकि इन क्षेत्रों के प्रधानमंत्री होने के नाते वो उस समय के भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर कर सकें, यहीं से दादरा और नगर हवेली का भारत में विलय हो गया और के.जी. बदलानी इतिहास में एक दिन के लिए दादरा और नगर हवेली के प्रधानमंत्री बन गए.

ऐसे में दो क्षेत्रों में भारत में विलय के बाद बचे गोवा को भी पुर्तगाल से आजादी चाहिए थी.जबकि पुर्तगालियों को मालूम चल गया की वो अब और अधिक दिन टिक नहीं सकेंगे. जिसके चलते नवम्बर 1961 में उन्होंने अपनी फौजों के साथ गोवा के तट पर जहाज़ों और मछली पकड़ने वाली नावों पर गोलीबारी शुरू कर दी. जिसका जवाब देते हुए भारतीय सरकार ने दिसंबर 1961 में अपनी जल, थल और वायु सेना भेजकर एक साथ पुर्तगालियों पर धावा बोल दिया.

नतीजा ये रहा कि, पुर्तगालियों के गवर्नर जनरल मैनुएल अंटोनिओ वस्सलो ए सिल्वा ने महज 48 घंटे के अंदर ही आत्मसमर्पण कर दिया और गोवा भारत को सौंप दिया.अब सोचने वाली बात ये भी है कि, पुर्तगाली ही सबसे पहले भारत आने वाले विदेशी थे और भारत से जाने वाले विदेशी भी पुर्तगाली ही थे. ऐसे में इस बीच अंग्रेज, फ्रांस, डच सब आकर लौट गए.

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