भारत की पहली महिला चिकित्सक रुखमाबाई राउत

हमारे समाज में महिला और पुरुष को सम्मान के साथ रहने का अधिकार है और आज के समय में महिला और पुरुष को कंधे से कन्धा मिलाकर काम करने का अधिकार है। लेकिन पहले समय में जब भारत अंग्रेजो की गुलामी में था उस वक्त महिलाओ को आज के जैसे अधिकार नहीं थे। उन्हें घर के बाहर जाकर काम करने पर पाबन्दी थी। लेकिन उस समय में कुछ बहादुर महिलाये थी जो खुद को बदलना चाहती थी, खुद की नई पहचान बनाना चाहती थी। ये झुठलाया नहीं जा सकता कि आज जो महिलाएं आज़ाद होकर नौकरी कर रही हैं उसके पीछे उस वक़्त की महिलाओं का त्याग और लड़ाई है जो उन्होंने महिला अधिकारों के लिए लड़ी थी। रुख्माबाई राउत एक ऐसी ही बहादुर महिला हैं जो उस समय केवल घर से बाहर नहीं गयी बल्की उन्होंने तो दुसरे देश में जाकर डॉक्टर बनने का सम्मान भी हासिल किया। रुख्माबाई एक प्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक थी और महिलाओ के कल्याण के लिए काम करती थी, एक तरीके से कहा जाए तो वे एक नारीवादी थी। भारत जब अंग्रेजो के कब्जे में था तो उस वक्त कुछ गिने चुने पहले महिला डॉक्टर में रुख्माबाई का नाम आता है।

जनार्धन पांडुरंग उनके पिताजी थे और जयंतीबाई उनकी माँ थी। रुखमाबाई की मां की शादी बचपन में ही कर दी गई थी, जिसके चलते मात्र 17 साल की उम्र में वो विधवा हो गई थी। कम उम्र के चलते रुखमाबाई की मां का विवाह एक सामाज सुधारक और पेशे से डॉक्टर सखाराम अर्जुन से करवा दिया गया। रुखमाबाई उस बॉम्बे प्रजिडेंसी में पैदा हुई थीं, जहां अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव और दायरा काफी बड़ा था। बावजूद इसके उनकी पैदाइश के समय 1864 में बाल विवाह जैसी प्रथा बहुत आम बात थी। रुखमाबाई माँ की शादी के कुछ ही वक़्त बाद उनकी भी मात्र 11 साल की उम्र में उनकी शादी करवा दी गई। हालांकि, वो शादी के तुरंत बाद अपने ससुराल नहीं गई और अपने घर में रहकर ही पढ़ाई की। मगर एक बात अच्छी थी कि अपने दूसरे पिता के समाज सुधारक और डॉक्टर होने का रुखमाबाई की जिंदगी पर गहरा और सकारात्मक असर पड़ा। मगर जब वो 12 साल की हुईं, तो दकियानुसी ख्यालों वाले पति के साथ रहना उन्होंने स्वीकार नहीं किया। मगर रुखमाबाई के पति उन पर अपने साथ वैवाहिक जीवन बिताने के लिए दबाव बनाने लगे। मगर तब तक अपने पिता की तरह डॉक्टर बनने का सपना देख चुकी रुखमाबाई इसके खिलाफ हो चुकी थीं। लिहाजा रुखमाबाई के पति दादाजी भीकाजी ने बॉम्बे कोर्ट में याचिका दायर कर दी। आजादी के समय रुखमाबाई के इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि चर्चा बाल गंगाधर तिलक तक पहुंच गई थी। कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि रुखमाबाई को अपने पति के साथ रहना होगा। अगर वह ऐसा नहीं करती तो उन्हें जेल जाना होगा। रुखमाबाई ने भी पति के साथ जाने की वजाए जेल जाना ज्यादा उचित समझा। बाद में दादाजी भीकाजी को मुआवजा देकर रुखमाबाई के पिता ने दोनों का तलाक करवा दिया। इस तरह वो मजबूरी के रिश्ते से हमेशा-हमेशा के लिए आजाद हो गईं। बाद में रुख्माबाई घर में ही रहकर फ्री चर्च मिशन लाइब्रेरी की क़िताबे लाकर पढाई करती थी। इसके बाद रुख्माबाई अपने डॉक्टर बनने के सपने को साकार करने में पूरी तरह से जुट गईं। डॉक्टर बनने के उनके सपने में बॉम्बे के कामा अस्पताल के डॉयरेक्टर एडिथ फिजसन ने उनकी काफी मदद की। उन्हें अंग्रेजी सीखने का कोर्स करवाया।वो रुख्माबाई को पढाई के लिए प्रेरित करते ही थे लेकिन उन्हें आगे की शिक्षा मिलनी चाहिए इसके लिए पैसे भी इकट्ठा करते थे। आखिर पढाई के लिए पैसा इकट्ठा होते ही सन 1889 में रुख्माबाई डॉक्टर की पढाई करने के लिए इंग्लैंड चली गयी । जिसके बाद रुखमाबाई लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर वूमैन में पढ़ने के लिए इंगलैंड गईं। सन 1894 में उन्होंने लन्दन स्कूल ऑफ़ मेडिसिन में डॉक्टर की डिग्री हासिल की। उन्होंने रॉयल फ्री हॉस्पिटल में भी कुछ समय तक पढाई की थी। सन 1895 में लंदन से पढ़ाई पूरी करने के बाद 35 साल की उम्र में भारत लौटीं, और उन्होंने खुद को बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसे दकियानूसी विचारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। वो भारत में वापस आ गयी और ऊन्होने सूरत के महिला अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी के रूप में काम किया। सच में रुख्माबाई एक बहुत ही बहादुर और होशियार महिला थी। अपनी ढृढ़ इच्छाशक्ति की वजह से ही वो बाल विवाह से मुक्त होकर अपने और देश के लिए कुछ कर सकीं और आज इसी वजह से वो देश की पहली महिला डॉक्टर भीकहलाई जाती हैं।

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