महामारी के बीच पानी की अहमियत खत्म, भविष्य का क्या?

पानी एक इंसान की खास जरुरतों में से एक है. बिना पानी इंसान तो क्या किसी भी जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती. उसके बावजूद पानी को लेकर इंसान जितना लापरवाह और लचर है. उससे कल्पना की जा सकती है कि, भले ही अनेकों देश, राज्य, जगहों पानी की भारी किल्लत का सामना कर रहे हों, फिर भी इंसान को पानी की तनिक परवाह नहीं है.

इस दौर में जहां कोरोना महामारी पूरी दुनिया में फैली हुई है. वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO से लेकर अनेकों विशेषज्ञ का कहना है कि, नियमित तौर पर पानी और साबुन से हाथ धोते रहें. हाथों को सैनेटाइज करते रहें. यही एक वजह है कि, कोरोना महामारी को रोकने में मदद मिल सकती है. WHO के कहने पर, विशेषज्ञों की राय पर आज इंसान वो सब कुछ कर भी रहा है. लेकिन इन दौरान हो रही पानी की बर्बादी की फ्रिक का क्या?

हमने कभी सोचा कि, जिस महामारी को रोकने की खातिर हम दिन रात पानी की बर्बादी कर रहे हैं. उसका आने वाले समय में क्या असर होगा? हमारे देश में भी पानी को बचाने की खातिर कागज़ी तौर पर, एड के तौर पर हज़ारों करोड़ों रुपये फूंक दिए जाते हैं. लेकिन असल धरातल पर बस ये एक दिखावा मात्र रह जाता है. हालिया दिनों में दिल्ली में आए दिन भूंकप की खबरें सबने देखी महसूस की.

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विशेषज्ञों का मानना है कि, अधिक जल दोहन भूकंप का कारण है. लेकिन न तो हमारी सरकारें, न तो विशेषज्ञ न ही कोई आम इंसान. इस मुद्दे पर कोई बात करना नहीं चाहता. लेकिन कभी-कभी एक छोटी पहल भी मजबूत इरादे और बड़े बदलाव लाने में सक्षम है. यही हकीकत कर दिखाया है तमिलनाडु के त्रिची निवासी मराची सुब्बरामण ने. जिनकी उम्र आज 71 साल की है. जिन्होंने महामारी के इस दौर में पानी बचाने की मिसाल कायम की है.

कोरोना महामारी में पानी की अहमियत

तमिलनाडु के त्रिची गांव में रहने वाले मराची सुब्बरामण को भारत सरकार, इससे पहले भी स्वच्छता से जुड़े कार्यों और ग्रामीण क्षेत्रों में सुधारों की खातिर पद्म श्री से सम्मानित कर चुकी है. यही वजह है कि, शायद मराची सुब्बरामण इस अहमियत को समझ सके. अपने एनजीओ ‘सोसाइटी फॉर कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन एंड पीपल्स एजुकेशन’ (SCOPE) के तहर मराची सब्बुरामण आज तक लगभग 1.2 लाख शौचालय बनवा चुके हैं.

हालांकि इसके अलावा हाल ही में उन्होंने अपने घर पर एक तकनीक बनाई है. जिसके चलते वो हर रोज़ करीबन दस लीटर पानी बचा रहे हैं. वो कहते हैं न कि, छोटी-छोटी सोच बड़ा बदलाव लाती है. ठीक इसी तरह मराजी जी ने हाथ धोने वाला अपना वॉशवेशन शौचालय के फ्लश से फिट कर दिया. जहां हाथ धोने से उसका पानी सीधे तौर पर फ्लश बॉक्स में इक्ट्ठा हो जाता है. उसी पानी का इस्तेमाल फिर आसानी से फ्लश के तौर पर किया जा सकता है.

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Marachi Subburaman

पानी बचाने की है जरुरत-मराची सुब्बरामण

सुब्बरामण कहते हैं कि, “आज जब इस महामारी में लोगों को नियमित तौर पर हाथ धोना है. लेकिन लोग हाथ तो धोते हैं. हालांकि पानी बचाने की दिशा में कोई नहीं सोचता. कुछ लोग तो हाथ में साबुन लगा कर दस-बीस सेकंड तक पानी यूँ ही खुला रहने देते हैं. जिससे बड़े पैमाने पर पानी बर्बाद होता है.”

इन्हीं सब चीजों को देखकर सोच समझकर मैंने पानी बचाने की दिशा में प्रयास करने की ठानी. फिर अपना काम शुरू किया. जिससे पानी बचाया जा सके. इस बीच मैंने जापान के किसी टॉयलेट की तस्वीर देखी. जिसमें वॉशबेसिन टॉयलेट के साथ जुड़ा हुआ था. मुझे मेरा आईडिया मिल गया.

यही देखकर सुब्बरामण ने एक ऐसा मॉडल तैयार कर ड़ाला. जिससे हर रोज़ वो औसतन पचास लीटर पानी यूं ही बेकार होने से बचा पाते हैं. सुब्बरामण कहते हैं कि, “ये मॉडल बहुत आसान है. कोई भी इंसान इसे आसानी से तैयार कर सकता है.”

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पानी बचाने की दिशा में उठाने होंगे सख्त कदम

जाहिर है, आज महामारी से बचने की खातिर हमें नियमित तौर पर हाथ धोने की जरूरत है. हालांकि उसी तरह आगे अपना भविष्य बचाने और संवारने की खातिर हमें पानी की भी जरुरत है. आप सोच सकते हैं कि, मराची सुब्बरामण ने तो जापान की विधि अपनाई है. लेकिन यहां सोचने वाली बात है कि, उन्होंने इस दिशा में एक प्रयास तो किया.

हमें भी जरूरत है कुछ इसी तरह के प्रयास की. ताकि हर रोज़ सैकड़ों, हज़ारों, लाखों लीटर पानी जो हम यूं ही जाया होने दे रहे हैं. उसे रोका जा सके. नीति आयोग के मुताबिक देशभर में पानी की किल्लत से औसतन दो लाख मौतें होती हैं.

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जबकि आने वाले समय में अनेकों शहर डे-जीरों के कगार पर पहुंच जाएगें. ऐसे में हमें अपना भविष्य बचाने की दिशा में अनेकों बेहतर प्रयास करने होगें. इसी दिशा में मराची सुब्बरामण का प्रयास ये इशारा करता है की हम इस बारे में सोचे.

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