Holi Special Sweet Gujiya : जिसके मिठास के बिना रंगीला त्योहार भी लगता है बेरंग

होली आ रही है, इस साल 10 मार्च को रंगो का त्योहार मनाया जाएगा। दीपावली की तरह ही होली का अपना पैन इंडिया क्रेज है। रंगों के इस त्योहार पर जहां एक ओर लोग रंगो से, फूलों से, धूल से और न जाने किस-किस चीज़ से होली खेलकर जश्न मनाते हैं तो वहीं उनका यह जश्न बिना किसी स्वादिष्ट पकवान के पूरा भी नहीं होता है।

भारतीय त्योहार की अनेक खासियतों में से यह भी खास बात है कि हर एक पर्व और त्योहार के लिए कुछ स्पेशल डिश यानि की पकवान होते ही हैं। किसी भी हिन्दुस्तानी त्योहार में किचेन से स्वाद भरी खुशबू न आए ऐसा हो ही नहीं सकता है। होली भी कुछ ऐसा ही है। इस दिन रंगो के अलावा जो दूसरी सबसे ज्यादा फेमस चीज़ है वह है हर घर में बनने वाली स्पेशल गुझिया या गुजिया मिठाई।

बिना गुजिया के होली की कल्पना भी नहीं हो सकती

होली से कुछ दिन पहले ही लोगों में होली का जोश और उत्साह दिखने लगता है। सड़कों पर पड़ा गुलाल लोगों के होली के उत्साह को बड़ी आसानी से बयां करता है। होली के पहले से ही जहां रंग, पिचकारी और गुब्बारों का हर तरफ तांता लगने लगता है तो वहीं घरों के किचेन में गुजिया बनाने की समाग्री भी इकट्ठा होती रहती है। वैसे तो मुंह मीठा करने के लिए हर बार किचन में जाकर कुछ पकाने की जरूरत नहीं होती, मुंह मीठा तो मीठाइयों से भी कराया जा सकता है। लेकिन कुछ बड़े त्यौहार जैसे कि होली की बात कर लें तो इस दिन लोगों का आपसी मेलजोल ज्यादा होता है और कई बिगड़े रिश्ते भी सुधरते हैं, ऐसे में मेहमानों के लिए कुछ खास बनता है। इस दिन लड्डू से काम नहीं चलता, इस प्यार में और ज्यादा मिठास घोलनेवाली मिठाई गुजिया से ही लोगों का मन मानता है।

गुजिया पूरे देश में बनने वाली मिठाई है। इसे अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीकों से बनाया जाता है। अब जैसे यूपी में तो इसे गुजिया कहते हैं, लेकिन अगर आप बिहार जाएंगे तो आपको वहां गुजिया पिडिकिया नाम से दिखेगी। पिडिकिया दो तरह से बनी है एक तो इसके अंदर सूजी भरकर और दूसरी इसके अंदर खोया भरकर बनाई जाती है। गुजिया या फिर पिडिकिया का क्रेज कुछ ऐसा होता है कि जैसे ही इसे कढ़ाई से निकाला जाता है बच्चें उसे लपकने के लिए तैयार रहते है।

इसकी खुशबू जितना बच्चों से लेकर बूढ़ों को भाती है उतना ही इसका स्वाद मन को तृप्ती देता है। गुजिया को गुजरात में गुघरा, महाराष्ट्र में करांजी, तमिलनाडू में सोमास, तेलांगना में गारीजालू, आंध्रप्रदेश और कर्नाटका में काज्जीकाया नाम से जाना जाता है। गोवा में भी वहां के लोग त्योहारों पर इसी से मिलता जुलता स्वीट बनाते हैं। इसे न्यूरोमिओस कहते है। सभी फ्राइड स्वीट हैं जो आंटे से या मैदे से बनाए जाते हैं और इसके अंदर नारियल के संग कुछ न कुछ स्वादिष्ट चीज़े भरी जाती हैं।

गुजिया का इतिहास क्या कहता है ?

भारत के लगभग हर हिस्से में इस स्वादिष्ट पकवान को बनाया जाता है। अलग—अलग धर्मों को मानने वाले हमारे देश के लोगों के बीच गुजिया का अपना रिलीजियस पोजीशन भी है। ईसाई इसे क्रिसमस के दावत में पेश करते हैं, तो हिंदू इसे गणेश चतुर्थी के थाल में जगह देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो लड्डू और हलवे की तरह गुझिया भी अखिल भारतीय मिठाई है और शायद यहीं कारण है कि गुजिया जब बनती है तो इसे देखकर ऐसा लगता है कि यह अपने पोजीशन पर इतरा रही होती है। कई लोग इसे बंद टार्टलैट भी कहते हैं। लेकिन आज की यह पैन गुजिया का इतिहास क्या कहता है। क्या यह शुद्ध देसी है या यह भी दुनिया के बीच वर्षों से हो रहे आदान—प्रदान के रुप में कही से कहीं पहुंचती चली गई?

बात गुजिया की करें तो आज इसे अलग-अलग क्षेत्रों के लोग अपने क्षेत्र से विकसित हुई मिठाई बताते हैं। लेकिन अगर इतिहास पर नज़र डालें तो इसके बारे में दो तरह का इतिहास बताया जाता है। पहला इतिहास इसे शुद्ध देसी बताता है तो दूसरा इसे समोसे का हमसफर बताता है जो उसके संग या उसके बाद उसी सिल्क रुट को फॉलों करते हुए भारत तक पहुंचा जिसके जरिए समोसा यहां पहुंचा था। ऐसे में कई लोग तो इसे मीठा समोसा बनाने की प्रक्रिया में ईज़ाद की गई मिठाई भी बताते हैं।

Gujiya

बात दूसरे नंबर के इतिहास की पहले करते हैं, इसके अनुसार गुजिया मिडिल ईस्ट से भारत आया है। कइयों का मानना है कि गुजिया तुर्की के ‘बाकालावा’ से ही परिवर्तित होकर बना है और इसका यह रुप भारत में तैयार हुआ। लेकिन अगर हम बाकालावा को और गुजिया को एक साथ देखें तो दोनों में एक डिफ्रेंस तो दिखता है। बाकालावा गुजिया से ज्यादा खाजा मिठाई के ज्यादा नजदीक लगता है। गुजिया को कई लोग समोसे से निकली हुई मिठाई मानते हैं और इस तरह यह मान लिया जाता है कि यह मध्यकाल में बनने वाली मिठाई है जो भारत में मिडिल ईस्ट से पहुंची।

अब बात पहले वाले इतिहास की। इसके अनुसार गुजिया शुद्ध रुप से देसी है और इसे सबसे पहले यूपी के बुंदेलखंड में तैयार किया गया था। यहीं से फिर यह मिठाई भारत के कई हिस्सों में गई। जहां-जहां गई वहां-वहां इसका नाम बदला और बनाने के तरीके में भी थोड़ा बहुत बदलाव आया। गुजिया ज्यादा करीब चंद्रकला मिठाई के के है, फर्क बस इतना ही है कि गुजिया अर्धचंद्रकार होती है और चंद्रकला पूरा चंदा मामा। ऐसे में गुजिया स्वदेशी मिठाई ज्यादा प्रतीत होती है।

गुजिया भारतीय स्वाद की पहचान

गुझिया का गरिष्ठ अवतार खोये (मावे) वाला है, जिसे चिरौंजी, किशमिश, पिस्ता आदि से और भी समृद्ध बनाया जाता है। लेकिन अगर जो परिवार साधन-संपन्न नहीं होता उस आम आदमी की गुझिया में भरी रहती है भूनी सूजी, कसी नारियल की गिरी, सौंफ और इलायची के दाने। गुझिया को पसंद और सुविधानुसार घी या तेल में मंद आंच पर तला जाता है। कलाकारी की कसौटी यह है कि भली-भांति पकने के बाद भी गुझिया का रंग सांवला न पड़े! इन्हें आकर्षक बनाने के लिए इसके किनारे को कंगूरों से अलंकृत किया जाता है।

पहले तो यह काम हाथ से ही होता था लेकिन अब एक एक छोटा सा उपकरण आ गया है, जिससे आसानी से इसको आकार दिया जाता है। जिन लोगों का काम कम मिठास से नहीं चलता, उनके लिए गुजिया को चीनी की चाशनी में डूबो दिया जाता है तली होने की वजह से और चीनी के कवच के कारण नाजुक मिठाइयों की तुलना में गुझिया अधिक टिकाऊ हो जाती है।

एक बेहतरीन गुजिया में बर्फी, कलाकंद और पेड़े की दुधिया मलाइयत के संग बालूशाही और खाजे की खस्तगी का मजा भी मिलता है। गुजीया को जिस तरीके से भारत में अपनाया गया है वैसे में तो यहीं कह सकते हैं कि गुजिया सिर्फ भारतीय पकवान नहीं बल्कि भारतीयता के स्वाद की पहचान है। तो इस होली गुजिया के मिठास का लाभ उठाएं और दूसरों को भी खिलाएं ताकी भरतीयपन हर एक के दिल में यूं ही बना रहे।

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