यहां दुल्हे के बिना ही होती है शादी, कुंवारी बहनें निभाती हैं हर रस्म

फूलों से सजी घर की सारी दिवारें, हर कोने में सुनाई देती शहनाई की गूंज, महमानों से खचाखच भरा कमरें और मंडप की तैयारी में जुटे पंडित जी.. वाकई ये नज़ारा किसी शादी वाले घर का ही हो सकता है। कितना खूबसूरत होता है हर घर नज़ारा जब उस घर में किसी लड़के या लड़की की शादी होती है और आज कल की अगर बात करें तो हर फिल्मों की दुनियां में खोए आज के नौजवान अपनी शादी के सपने भी उसी अंदाज में देखते हैं।

शादी से पहले फोन पर बातें, थोड़ी बहुत होने वाली मुलाकातें, प्री वेडिंग शूट और फिर शादी पर हाथों में हाथ लिए 7 जन्म साथ रहने के वचन.. लेकिन क्या हो अगर शादी तो हो लेकिन मंडप में लड़के की जगह बस लड़की हो। शादी की सारी ख्वाहिशें अधुरी रह जाएंगी जब आपको मालूम चलेगा कि, मंडप में लड़के की जगह लड़की ही है जिसके साथ आपको सात फेरों से लेकर शादी की हर एक रस्म अदा करनी है।

दुल्हे के बिना शादी

मालूम है ये बात जरा हैरान करने वाली है लेकिन गुजरात के छोटा उदयपुर जिले के तीन गांवों में ये परंपरा पिछले करीब 300 सालों से चली आ रही है। हालांकि, जिले के बाकी सभी शहरों और गांवों में देश के बाकी हिस्सों की ही तरह सामान्य तरीकों से शादी की सारी रस्में निभाई जाती है लेकिन सुरखेड़ा, अंबाला और सनाड़ा गांवों में रहने वाले राठवा समाज की शादियों में दुल्हे की मौजूदगी अशुभ मानी जाती है। यहां लड़कों की शादी बिना उन्हें शामिल किए ही कर दी जाती है.

दुल्हे के बिना शादी करने की पीछे ये है वजह-

दरअसल, बारात लेकर दुल्हन के घर घोड़ी पर दुल्हे की बहन बैठकर जाती है और शादी के दौरान लड़के साथ निभाई जाने वाली हर रस्म का हिस्सा दुल्हे की कुंवारी बहन बनती है। दुल्हन की तरह दुल्हे की बहन को भी शादी के दौरान सजाया जाता है। इसके बाद मंड़प पर दुल्हन के साथ फेरे लेकर वर माला की रस्म भी ननद भाभी एक दूसरे के साथ पूरी करते हैं। यानी कि कुल मिलाकर देखा जाए तो इस गांव में बहन अपने भाई के लिए शादी करके दुल्हन घर लाती है।

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बात थोड़ी हैरान करने वाली जरूर है लेकिन इसके पीछे राठवा समाज की कई मान्यता छिपी है। इस समाज के लोगों का कहना है कि, ये परंपरा उनके गांवों में पिछले करीब 300 सालों से चली आ रही है। माना जाता है कि, इस गांव के देव कुंवारे थे। इसलिए कोई भी लड़का शादी नहीं कर सकता। देखा जाए तो ये गांववालें अपने कुंवारे देव की परंपरा को ही निभाते चले आ रहे हैं। इतना ही नहीं, समाज के लोगों का मानना है कि, अगर कोई लड़का या परिवार इस परंपरा को तोड़ते हैं तो देव नाराज हो जाते हैं और जिसका असर लड़के की शादी के बाद के जीवन पर पड़ता दिखाई देता है।

दुल्हे के बिना शादी

इनमें एक मान्यता ये भी है कि, कुंवारी बहन भाई के लिए कवच की तरह होती है। जो उसे समाज की बुरी नजरों से बचाने का काम करती है। माना जाता है कि, बहन भाई की रक्षक होती है। जो भाई को नई जिंदगी में प्रवेश करने में अपना सहयोग देती है।

सिर्फ कुंवारी बहन ही कर सकती है अपनी भाभी से शादी

इस पूरी परंपरा के चलते बहन अपने सिर पर टोकरी रखकर शादी की हर रस्म को पूरा करती है और भाभी की विदाई कराकर उसे अपने घर ले आती है। फिर बहन की सारी जिम्मेदारियां यहां खत्म हो जाती है। ससुराल में कदम रखने के बाद दुल्हन को एक बार फिर अपने पति के यानी कि दुल्हे के साथ शादी की सारी रस्में दोहरानी होती है। जिसके बाद जाकर इस गांव में लड़का और लड़की की शादी को पूर्ण मान्यता प्राप्त होती है।

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मान्यताओं के अनुसार, पहली शादी के दौरान दुल्हे की बहन का कुंवारा होना बेहद जरूरी होती है। अगर दुल्हे की खुदकी कोई बहन कुंवारी नहीं है तो चचेरी, ममेरी बहनें भी इस रश्म को पूरा कर सकती है। राठवा समाज में शादी को लेकर एक और अनोखी और खास मान्यता ये है कि, यहां शादी के लिए दुल्हन के घरवालों से दहेज की मांग नहीं की जाती है बल्कि, लड़के वाले दहेज देकर दुल्हन को अपने घर लाते हैं।

कितनी अनोखी है ना राठवा समाज की ये परंपरा। हालांकि शादी को लेकर ये कोई पहली अनोखी परंपरा नहीं है भारत के ऐसे कई गांव और समाज हैं जहां शादी को लेकर अलग अलग परंपराओं का चलन है। जिनके बारे में अगर आप पढ़ने के इच्छुक हैं तो दि इंडियननेस की वेबसाइट पर जाकर जरूर विजिट करें।

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