Hauz Khas Village : एक तबेले वाला गांव कैसे बन गया दिल्ली का सबसे बड़ा पार्टी हब ?

हौज़ ख़ास विलेज नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में क्या आता है ? भाई आप दिल्ली वाले हैं तो बस हौज़ ख़ास का नाम सुनते ही पार्टी करने का मन करता है। एक ऐसी जगह जहां कि सड़क आपको दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों से बिलकुल अलग लगेगी। दिल्ली की एक ऐसी जगह जो पार्टी करने के लिए शायद सबसे बेस्ट है। एक से बढ़िया एक रेस्टॉरेंट पब और डिस्क। क्राऊड ऐसा कि बस आपकी निगाहें ही ना हटें। कहते हैं दिल्ली के पैसे वाले लोगों को अगर हाई फाई पार्टी करते देखना है तो फिर यहां आ जाइए। वैसे ज़्यादातर लोगों के दिमाग में हौज़ ख़ास का नाम सुनते ही बस यही सब आता हो क्योंकि हौज खास विलेज की पहचान ही पार्टी हब, रोमांटिक डेटिंग और दोस्तों के साथ हैंगआउट प्लेस के रूप में बन चुकी है। हौज खास विलेज के इस कल्चर ने साउथ एक्सटेंशन, डिफेंस कॉलोनी और खान मार्केट को ओवरटेक कर लिया है। अब तो हौजखास में प्रॉपर्टी होना किसी भी रेस्टोरेंट, नाइटक्लब, गैलरी मालिक का ड्रीम बन चुका है।

Hauz Khas Village

हौज खास विलेज : पार्टी करने या एक खूबसूरत शाम बिताने के लिए बेस्ट प्लेस है

पर कभी सोचा है कि हौज़ ख़ास नाम के आगे विलेज क्यों लगाया जाता है और पार्टी हब बनने से पहले ये जगह क्या थी और क्यों जानी जाती थी। ये गांव दिल्ली के बनने से पहले से है। दरअसल अलाउद्दीन खिलजी ने इस जगह पर एक टैंक बनवाया था, जो पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए था। यहां पर एक झील थी जो आज भी है। झील के इर्द गिर्द बना पुराना किला, चारों तरफ़ फैली हरियाली और बीचों बीच में बनी झील ने ही इस जगह को हौज खास विलेज के रूप में पहचान दी। पर तब के हौज़ ख़ास में और आज के हौज़ ख़ास में इतना कुछ कैसे बदल गया। आखिर इतना ज्यादा बदलाव इतने कम सालों में आया कैसे ?

तो इसका जवाब है कि हौजखास 1987 में बदलना शुरू हुआ। जब हमारी उम्र के लोग महीने की सैलरी कुछ सौ रुपये ही लिया करते थे। तब हौज़ ख़ास एक छोटी सी जगह थी। मगर तभी फैशन डिजाइनर बीना रमानी ने एक तबेले को अपना चिक डिजाइनर बुटीक बना दिया। शुरुआत में किसी को समझ नहीं आया कि ये डिजाइनर आखिर कर क्या रही है और ये चाहती क्या है ? उस वक़्त रमानी ने इस गौशाला को 2000 रूपए में खरीदा था। फिर उन्होंने गौशाला को पूरी तरह बदल डाला, उसमें शीशे और मेहराब लगाए, एयर कंडीशन लगाया। फैंसी सूट-ड्रेसेस टांग दिए और अपने हाई प्रोफाइल दोस्तों को एक बार उनके बुटीक में आने के लिए कहा। बस फिर इस अजीब सी जगह ने सभी तरह के आर्ट लवर्स को यहां खींचकर लाना शुरू कर दिया।

Hauz Khas Village

इस जगह ने गांव के नज़ारे से पार्टी के शोरगुल तक सबकुछ देखा

बीना रमानी बड़ी ही खुरापाती थीं उनका दिमाग बस इतना कर के ही नहीं रुका बल्कि वो तो और भी बहुत कुछ करना चाहती थीं। जबकि उन्हें अभी बुटीक खोले ज्यादा टाइम भी नहीं हुआ था और उसका रिस्पांस भी उन्हें बहुत ज़्यादा अच्छा नहीं मिला था। इसके बाद भी 1990 में सुरेश कलमाड़ी और बीना रमानी ने साझेदारी से बिस्त्रो की नींव रखी। उस वक़्त बिस्त्रों को एक हाई क्लास रेस्टोरेंट की तरह बनाया गया। वो भी उस प्लॉट पर जिसे गांववाले पूरी तरह से छोड कर चले गए थे। मतलब जो जगह गांव वालो के ही काम की ना थी उस जगह पहले बुटीक और बाद में हाई क्लास बिस्त्रो रेस्टॉरेंट। अब सवाल था कि चारो तरफ गांव से घिरे इस रेस्टॉरेंट में आखिर कोई क्यों खाना खाने आएगा। मगर देखते ही देखते इस रेस्टॉरेंट तो बेहद कामयाबी हासिल कर ली। इसके बाद गांव की तस्वीर ही बदलने लगी और तब गांव में दुकानें खोलने के लिए वो किराया मिलने लगा जिसकी कल्पना भी किसी गांववाले ने नहीं की होगी। इसके बाद गांववालों ने अपने घरों में एयर कंडीशन लगाए, अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। महंगी गाड़ियां खरीदीं और तो और पैसा इतना आने लगा कि गांव के अधिकतर लोगों ने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी। वहीं दूसरी तरफ बीना रमानी अपने साथ डिजाइनर्स, आर्टिस्ट्स और फैशन के दीवाने लोगों को हौज खास विलेज लेकर आईं और दो दशक से भी ज़्यादा वक़्त तक ये लोग हौज़ ख़ास में ना सिर्फ जमे रहे बल्कि इन लोगों ने हौज़ ख़ास की पहचान को भी बदल कर रख दिया। कुछ गांववाले जो आज भी यहां रहते हैं वो बताते हैं कि कैसे एमएफ हुसैन महान चित्रकार होकर भी गांव में नंगे पांव घूमा करते थे। इसके अलावा फिल्ममेकर और जामुन स्टूडियो की मालकिन, आयशा सूद की मां ने भी गांव में एक बिल्डिंग खरीद ली। उस वक़्त आयशा ने सोचा था कि वो अपना फिल्म स्टूडियों यहां बनाएंगी। मगर फिर साल 2000 में धीरे धीरे बाजार नीरस होता चला गया। मतलब एक दम कामयाबी को देख लेने वाला बाज़ार अब फिर से सुनसान होने लगा।

Hauz Khas Village

मगर अभी हौज़ ख़ास विलेज को दूसरा दौर देखना बाकि था। दूसरे दौर में यहां कई बड़े बड़े बिजिनेसमैंन आए जिन्होंने यहां धीरे धीरे अपना काम ज़माना शुरू किया। तभी एक फ्रेंच नागरिक Pio Coffrant ने यहां का पहला होटल The Rose शुरू किया। तब से लेकर अब तक ये जगह होटल रेस्टॉरेंट और पब के लिए एक बड़ा हब बन चुकी है। हालांकि नए बदलाव और लाइफस्टाइल ने शुरुआत में इस गांव के लोगों को चौंकाया। क्योंकि धीरे धीरे उस गांव में रहने वाले लोग आस पास का माहौल बात करने का तरीका, रहन सहन सबकुछ बदलने लगा। गांव वो भी इतना मोडिफाइड जहां आपको हर तरह की शहरी सुविधा और चकाचौंध नजर आएगी। मगर ये बदलाव हर किसी को पसंद था क्योंकि उसकी वजह से कई लोगों की ज़िंदगी बदली थी। उनकी भी जो यहां पहले से रह रहे थे और उनकी भी जिन्होंने यहां ज़मीन लेकर अपना काम शुरू किया था। वाकई किसी गांव में इतने जबरदस्त बदलाव की कल्पना भी शायद ही किसी ने की होगी। एक गांव इस हद तक बदला कि उसने शहर के बाकि हिस्सों को पीछे ही छोड़ दिया और जो आज दिल्ली के रहीसों का एक अड्ड़ा बन चुका है।

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