Engineer’s Day 2021: जानें महान इंजीनियर विश्वेश्वरैया के बारे में

भारत इंजीनियरिंग और आईटी के क्षेत्र में दुनिया का अग्रणी देश माना जाता है। भारत में बहुत सारे इंजीनियरिंग कॉलेज हैं और इंजीनियरिंग के बहुत सारे कोर्स भी हैं। किसी भी देश को विकसित बनाने में इंजीनियर्स की मुख्य भूमिका रहती है। इंजीनियर्स को आधुनिक समाज की रीढ़ माना जाता है। बिना इंजीनियर के किसी भी देश का विकास असंभव है। इंजीनियर्स डे हर साल में एक बार आकर बार बार दुनिया को जताता है कि इंजीनियर हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं और वो सम्मान के हकदार है। इंजीनियर्स डे सिर्फ मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया और सभी इंजीनियर के सम्मान का दिवस तो है ही साथ ही ये दिवस सभी छात्रों को जताता है कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आप अपना करियर बना कर आप देश को विकसित करने में बाकी इंजीनियर्स की तरह अपना योगदान दे सकते हैं। इस दिन का महत्व मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया के योगदानो के कारण और भी बढ़ जाता है। उनकी योग्यता के आगे बड़े बड़े अंग्रेज इंजीनियर भी बौने साबित हो जाते थे। मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया जी के कुछ तकनीक विदेशों में भी उपयोग में लाये जा रहे हैं। 15 सितंबर 1860 को मैसूर में जन्में महान भारतीय इंजीनियर एम विश्वेश्वरय्या वैसे तो हर क्षेत्र में माहिर थे। मगर इंजीनियरिंग की फील्ड में इन्होंने अपना सबसे ज़्यादा योगदान दिया।

एक किस्सा है उनसे जुड़ा हुआ आप उसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि वो कितने महान इंजीनियर थे। दरअसल एक बार सर एमवी ट्रैन में सफ़र कर रहे थे इस ट्रेन में ज़्यादातर अंग्रेज ही सवार थे और अचानक से उन्होंने ट्रैन की जंजीर खींच दी। जो आस पास अंग्रेज बैठे थे उन्होंने सर एमवी को भरा बुला कहा और गार्ड भी आ गया उसने भी पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया। तब डॉ विश्वेश्वरैया ने कहा कि मेरा अंदाजा है कि यहां से लगभग कुछ दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है. इसपर गार्ड ने पूछा कि आपको कैसे पता चला? तब विश्वेश्वरैया ने कहा कि’गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आया है और आवाज़ से मुझे खतरे का आभास हो रहा है। इसके बाद पटरी की जांच हुई तो पता चला कि एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं और सब नट-बोल्ट खुले हुए हैं।

डॉ विश्वेश्वरैया ने अपनी शुरुआती पढ़ाई चिकबल्लापुर में की थी। इसके के बाद वो बैंगलोर चले गए, जहां से उन्होंने 1881 में बीए डिग्री हासिल की। इसके बाद पुणे में उन्होंने कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में पढ़ाई की। सर एमवी ने पुणे कॉलेज टॉप किया तो उन्हें गवर्नमेंट ऑफ़ बॉम्बे ने बिना इंटरव्यू के ही अस्सिटेंट इंजीनियर की नौकरी दे दी। बस फिर क्या उन्होंने तो जैसे इसके बाद देश में क्रान्ति ही ला दी। 1932 में ‘कृष्ण राजा सागर’ बांध परियोजना का निर्माण करवाया। जिसमें वो चीफ इंजीनियर की भूमिका में रहे। ये निर्माण यादगार इसलिए है क्योंकि तब देश में सीमेंट तैयार नहीं होता था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और इंजीनियर्स के साथ मिलकर ‘मोर्टार’ तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। इसके बूते उन्होंने बांध बनवाया। ये बांध आज भी कर्नाटक में मौजूद है। इतना ही नहीं ये बांध उस समय एशिया का सबसे बड़ा बांध कहा जाता था। इस बांध से कावेरी, हेमावती और लक्ष्मण तीर्थ नदियां आपस में मिलती है। यही नहीं उन्होंने प्राकृतिक जल स्रोत्रों से घर-घर में पानी पहुंचाने की व्यवस्था करायी। साथ ही गंदे पानी की निकासी के लिए नाली-नालों की समुचित व्यवस्था भी करवायी। विश्वेश्वरय्या के प्रयासों से ही कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर का निर्माण हो पाया। अपने कौशल से उन्होंने हैदराबाद शहर को बाढ़ से बचाने का सिस्टम भी मनाया था. अंग्रेज भी उनकी इंजीनियरिंग का लोहा मानते थे। विश्वेश्वरैया ने स्वचालित स्लुइस गेट बनाए जो बाद में तिगरा डैम जो मध्य प्रदेश में है और केआरएस डैम जो कर्नाटक मेंहै इसके लिए भी इस्तेमाल किए गए। इस पेटेंट डिज़ाइन के लिए उन्हें रॉयल्टी के रूप में एक बड़ी रकम मिलनी थी, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया ताकि सरकार इस धन का उपयोग विकास के अन्य परियोजनाओं के लिए कर सके। उनके प्रयासों के कारण ही मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग और औद्योगिक कॉलेज भी खुलवाए जिससे देश का हर बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें। वो गरीबी और बेरोजगारी को लेकर अक्सर परेशां रहते थे जिसके बाद उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग और औद्योगिक कॉलेज भी खुलवाए जिससे देश का हर बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दी थी। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल और पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है।

जब वो केवल 32 वर्ष के थे, उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया, जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए एमवी ने एक नए ब्लॉक सिस्टम को ईजाद किया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए, जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने मुक्तकंठ से की। आज ये प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है। विश्वेश्वरैया ने मूसा और इसा नाम की दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया। मैसूर में ऑटोमोबाइल और एयरक्राफ्ट फैक्टरी की शुरूआत करने का सपना मन में संजोए विश्वेश्वरैया ने 1935 में इस दिशा में कार्य शुरू किया। बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स और मुंबई की प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्टरी उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। 1947 में वो आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। वो किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे।

मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया का व्यक्तित्व भी बड़ा ही अनोखा था। मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया बड़े ही साधारण, आदर्शवादी और अनुशासित व्यक्ति थे। वो शुद्ध शाकाहारी और नशे से दूर रहने वाले इंसान थे। मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया समय के बहुत पाबंद थे और अपना हर एक कार्य वक्त से पहले कर लेते थे। ववो हमेशा साफ सुथरे कपड़े पहनते थे और अपना हर एक काम बिल्कुल दिल से करते थे। इनसे मिलने वाला हर व्यक्ति मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया से प्रभावित जरूर होता था।

तो 1955 में विश्वेश्वरैया को सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था। सार्वजनिक जीवन में योगदान के लिए किंग जॉर्ज पंचम ने उन्हें ब्रिटिश इंडियन एम्पायर के नाइट कमांडर से भी नवाज़ा। सर विश्वेश्वरैया को न केवल भारत सरकार द्वारा प्रशंसा मिली, बल्कि दुनिया भर से मानद पुरस्कार और सदस्यता भी मिली। 101 साल की उम्र में 14 अप्रैल 1962 को उनका निधन हो गया। लेकिन उनका जीवन आज भी हमारे देश के सभी इंजीनियरों के लिए प्रेरणा स्रोत है। देश के निर्माण और विकास सभी इंजीनियरों को अभियंता दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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