भगत सिंह और उनके साथियों की मदद करन वाली ‘दुर्गा भाभी’

हमारे देश की आज़ादी के बारे में अगर आज हम किसी भी इंसान से पूछे कि हमको आज़ादी किसने दिलाई तो, अनेकों नाम हमारे मुंह में गोता लगाते प्रकट हो जाएगें. चाहे बात महात्मा गांधी की हो, सुभाष चंद्र बोस की हो, चंद्र शेखर आजाद या भगत सिंह की हो…ऐसे और भी अनेकों नाम हैं जो हर कोई गिना सकता है.

इन सब नामों के पीछे ऐसे अनेकों नाम हैं. जिन्होंने देश की आज़ादी की खातिर अपना योगदान दिया. अफसोस मगर, उन नामों को आजतक देश जान नहीं सका. ऐसे में महिला नामों के योगदान की अगर बात करें तो शायद ही किसी इंसान को दो-चार नाम भी मालूम हो. लेकिन हम आपको आज बताएंगें दुर्गा देवी वोहरा के बार में. आज से पहसे शायद ही आपने ये नाम सुना हो, ऐसे में सवाल ये है कि दुर्गा देवी वोहरा आखिरी थी कौन..?

‘दुर्गा भाभी’ दुर्गा देवी वोहरा

जिस समय देश में दो धड़े गरम दल और नरम दल देश की आज़ादी की खातिर अपने हिसाब से लड़ रहे थे. उस समय 19 दिसंबर, 1928 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने असिस्टेंट पुलिस अधिक्षक जॉन सॉडर्सं की गोली मारकर हत्या कर दी थी. यही वजह थी कि, ब्रिटिश हुकुमत इन तीनों को हर हिस्से में ढूंढ़ रही थी. ऐसे में इन सबके सामने ब्रिटिश हुकुमत से लड़ने और छिपने की समस्या पैदा हो गई थी. यही समय था, जिस समय दुर्गा देवी वोहरा यानि की ‘दुर्गा भाभी’ ने इन तीनों को सुरक्षित छत दी थी.

जिस समय देश गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के खातिर जंग लड़ रहा था. उस समय दुर्गा देवी वोहरा, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) की गुप्तचर होने के अलावा प्रमुख योजनाकार थीं. गरम दल के क्रांतिकारियों के लिए हथियारों की व्यवस्था कर उन्हें उन तक पहुंचाना दुर्गा भाभी का मुख्य काम हुआ करता था. जिस समय भगत सिंह और उनके साथी सॉन्डर्स की हत्या कर, अपना वेश बदलकर, उनके पास पहुंचे तो उन्होंने इन्हें लखनऊ पहुंचाने की योजना बनाई.

जिसके बाद दुर्गा देवी ने भगत सिंह को अंग्रेजी हुकुमत की तरह कपड़े पहनाकर अलग वेशभूषा में ढ़ाल दिया. उसके बाद दुर्गा देवी अपने तीन के साल बच्चे के साथ और घर पर पैसे लेकर भगत सिंह के साथ ट्रेन में सवार हो गईं. इस दौरान राजगुरु को दुर्गा भाभी ने घर के नौकर का वेश दिया था. फिर ये सभी लखनऊ से आगे कोलकाता गए. जहां उन्होंने कांग्रेस के कलकत्ता सत्र में भाग लिया और बंगाल में उमड़ते बंगाली क्रांतिकारियों से मुलाकात की.

वहीं दूसरी ओर, दुर्गा भाभी के पति बम बनाने का कारखाना चलाते थे. जहां दुर्गा भाभी क्रांतिकारियों के लिए ‘पोस्ट-बॉक्स’ का काम करती थी. इस दौरान दुर्गा भाभी आजादी से जुड़े योजनाओं व पत्रों को एक-दूसरे तक पहुंचाती थी. बम बनाने के दौरान दुर्गा भाभी के पति एक दुर्घटना में मारे गए थे. जिसके बाद भी दुर्गा न तो शोक में डूबीं न ही ये घटना उनके हौसलों को डिगा पाई.

दुर्गा भाभी ने भगत सिंह की तस्वीर के साथ लाहौर में निकाला जुलूस

जिस समय भगत सिंह व उनके दोनों साथियों को अंग्रेंजी हुकुमत ने गिरफ्तार कर लिया था. ये वही समय था, जब साल 1929 में दुर्गा भाभी ने भगत सिंह की तस्वीर के साथ लाहौर में अन्य लोगों के साथ जुलूस निकाला था. साथ ही ब्रिटिश हुकूमत से उनकी रिहाई की मांग की थी.

वहीं दूसरी ओर जिस समय देश के जेलों में भगत सिंह से लेकर अन्य क्रांतीकारियों ने भूख हड़ताल शुरू की थी. उस समय भूख हड़ताल के चलते जातिंद्र नाथ दास जेल में ही शहीद हो गए थे, उस समय दुर्गा भाभी ही सबसे आगे आई थी. जिन्होंने जातिंद्र नाथ का अंतिम संस्कार करवाया था.

इसी साल दुर्गा भाभी ने 8 अक्टूबर को एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी पर हमला किया था. देश में ऐसा पहली बार हुआ था, जब किसी महिला क्रांतिकारी को किसी गतिविधि में सीधे तौर पर शामिल पाया गया था. जिसके चलते दुर्गा भाभी को तीन साल जेल हुई. जेल से बाहर निकलने के बाद दुर्गा भाभी जब रिहा हुई तो, उन्होंने लखनऊ में उत्तर भारत में पहला मोंटेसरी स्कूल खोला.

साल 1907 में जन्म लेने वाली दुर्गा देवी वोहरा ने इसी तरह अनेकों अभिन्न योगदान भारतीय आज़ादी से लेकर उत्थान के लिए दिया. और साल 1999 में दुर्गा भाभी ने दुनिया को अलविदा कह दिया.

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