डॉक्टर वी शांता, जिन्होंने उम्रभर की कैंसर मरीजों की सेवा

यूआईसीसी की संस्था इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) ने 17 दिसंबर 2020 को ‘ग्लोबोकैन 2020’ की एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसमें उन्होंने बताया कि, साल 2020 में दुनिया भर में कैंसर की बीमारी के करीब 1.93 करोड़ मामले सामने आए हैं. जबकि लगभग एक करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

पूरी दुनिया में रहने वाले पाँच लोगों में से लगभग एक व्यक्ति को पूरे जीवन में कभी न कभी कैंसर होने का अनुमान है. इतना ही नहीं उन्‍होंने ये भी कहा कि, 8 पुरुषों में से एक की मौत कैंसर से होगी, जबकि महिलाओं में ये आंकड़ा 11 का है. इन आंकड़ों से मालूम चलता है कि कैंसर कितनी भयावह बीमारी है. ऐसे में हमें डॉक्टर वी शांता जैसी महिलाओं की सख्त जरूरत है. जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी कैंसर के मरीजों की सेवा में लगा दी.

अब यहाँ सवाल ये उठता है कि, आखिर वी शांता कौन थी. जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी कैंसर मरीजों की सेवा में लगा दी.

कौन थीं डॉक्टर वी शांता?

11 मार्च 1927 को चेन्नई में जन्मी वी शांता का पूरा नाम विश्वनाथन शांता था. जिस परिवार में वी शांता का जन्म हुआ वो परिवार था भारत के दो महान वैज्ञानिकों का.. नोबेल पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर सीवी रमन और एस चंद्रशेखर दोनों ही वी शांता के परिवार के करीबी थे. यानि की अगर कहा जाए कि परिवार शिक्षा के नजरिए से धनी था तो ये कहना गलत नहीं होगा. ऐसे में वी शांता की शुरुआती पढ़ाई में कभी अड़चन नहीं आने पाई. उनके पैरेंट्स ने भी उनका खूब सपोर्ट किया.

‘द हिंदू’ को दिए अपने इंटरव्यू में एक बार वी शांता ने बताया था कि, “बचपन से ही मैं मेडिकल फील्ड में जाना चाहती थी, इस दौरान घर वालों ने मेरा खूब साथ दिया. हालांकि मेरे घर वालों के अंदर कहीं न कहीं एक डर था कि, क्या मैं मेडिकल जैसी लाइन में खुद को ढ़ाल पाऊंगी.”

शांता के परिवार वालों की शंका उस समय दूर हो गई. जिस समय उन्होंने 1949 में अपनी MBBS की डिग्री हासिल की. इसके बाद शांता ने 1952 में DGO यानि की डिप्लोमा इन गायनोलॉजी एंड ऑब्सटेट्रिक्स भी पूरा कर लिया और साल 1955 आते आते उन्होंने MD की भी डिग्री हासिल कर ली. एक तरफ जहां शांता हर दिन पढ़ाई में उस समय नए आयाम छू रही थीं. वहीं दूसरी ओर उसी समय चेन्नई के अद्यार में कैंसर इंस्टीट्यूट की नींव रखी जा रही थी.

जिनकी नींव रख रही थी उस समय की जानी मानी महिला डॉक्टर मुथुलक्ष्मी रेड्डी.. मुथुलक्ष्मी रेड्डी भारत के इतिहास की पहली मेडिसिन की फील्ड में ग्रेजुएट होने वाली महिला हैं. जिन्होंने साल 1912 में डॉक्टरी में अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री कंप्लीट कर ली थी. ऐसे में उन्होंने दो यूरोपियन्स के साथ मिलकर विमन इंडिया एसोसिएशन (WIA) की शुरुआत साल 1918 में की.

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जबकि साल 1922 आते-आते मुथुलक्ष्मी को मालूम चला कि, उनकी बहन कैंसर नामक बीमारी से पीड़ित है. और साल 1923 आते-आते मुथुलक्ष्मी की बहन उन्हें छोड़कर जा चुकी थी. इस घटना ने मुथुलक्ष्मी को इतना परेशान कर ड़ाला कि, उन्होंने कैंसर जैसी भयानक बीमारी पर काम करने का मन बना ड़ाला. इसके साथ ही उन्होंने भारत में कैंसर अस्पताल बनाने की योजना बना ड़ाली.

जिस पर काम करते हुए उन्होंने 1918 में शुरू की अपनी संस्था के WIA के सपोर्ट से 1949 में कैंसर रिलीफ फंड की शुरुआत कि, फिर उसी फंड से अद्यार कैंसर इंस्टीट्यूट की शुरुवात एक झोपड़ी से शुरुवात की. जिससे अप्रैल 1955 में वी शांता पहली बार जुड़ी. उन्होंने पहली बार इस इंस्टीट्यूट में अपनी जॉइनिंग रेसिडेंट मेडिकल ऑफिसर के तौर पर की. फिर कभी भी इस इंस्टीट्यूट से दूर नहीं जा सकीं. अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में भी अद्यार कैंसर इंस्टीट्यूट की वी शांता अध्यक्ष थीं.

वी शांता की जिंदगी का पूरा सफर

आज पूरे भारत में कैंसर मरीजों के लिए अपनी अलग पहचान बना चुका अद्यार कैंसर इंस्टीट्यूट एक पब्लिक चैरिटेबल इंस्टीट्यूट है. जिस समय शांता ने इस इंस्टीट्यूट में अपनी ज्वाइनिंग की थी. उस समय यहाँ 12 बेड्स हुआ करते थे. हालांकि आज इस इंस्टीट्यूट में कैंसर मरीजों के लिए 535 बेड हैं. जहाँ गरीब कैंसर मरीजों का मुफ्त इलाज होता है.

साल 2013 में वी शांता ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि, “उन्होंने अस्पताल को दो हिस्सों में बांटा हुआ है. जिसमें एक प्राइवेट वॉर्ड है तो दूसरा जनरल वॉर्ड. जो कैंसर मरीज प्राइवेट वॉर्ड में आता है हम उससे पैसे चार्ज करते हैं. ताकि जनरल वॉर्ड में आए गरीब मरीजों का फ्री में इलाज हो सके.”

अद्यार इंस्टीट्यूट भले ही एक झोपड़ी से शुरु हुआ इंस्टीट्यूट है. हालांकि आज इस इंस्टीट्यूट का नाम भारत के उन सभी बड़े अस्पतालों में शामिल है. जो कैंसर के मरीजों के लिए काम करते हैं. ऐसे में वी शांता के 65 सालों की कड़ी मेहनत का नतीजा है कि, उन्होंने यहां लोगों में कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ, इलाज की क्वालिटी पर जोर दिया.

साल 2019 के अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि, “जिस समय मैं इस इंस्टीट्यूट से जुड़ी थी. उस समय यहां 12 पलंग थे, दो डॉक्टर्स, दो टेक्निशियन्स, दो सेक्रेटेरिएट स्टाफ और दो नर्स थी. हमने ये सब एक कॉटेज से शुरू किया था. आज मुझे गर्व है कि, हम भारत के सभी अच्छे इंस्टीट्यूट में से एक हैं. जिसकी वजह है हम हमारे यहां आने वाले लगभग 30 प्रतिशत कैंसर मरीजों का मुफ्त में इलाज करते हैं. जबकि 40 फीसदी से पैसे लेते हैं और बाकि बचे 30 प्रतिशत से नाम मात्र पैसा लेते हैं.”  

गुलामी की बेड़ियों से आजाद होकर आगे बढ़ते भारत में जिस समय वी शांता और मुथुलक्ष्मी जैसी महिलाएं अद्यार इंस्टीट्यूट को कैंसर पीड़ित मरीजों के लिए तैयार कर रही थी. उस समय हमारे देश में लोगों की सोच उन्हें पढ़ा लिखाकर बड़ा बनाने की नहीं, उनकी शादी कर उनके घर भेजने की हुआ करती थी. ऐसे में उन्होंने एक ऐसा ऑप्शन चुना जो आज भी न जानें कितनी लोगों की मदद कर रहा है.

ऐसे में एक समय जब डॉक्टर वी शांता से पूछा गया था कि, आप खाली समय में क्या करती हैं तो उन्होंने कहा था कि, मेरे पास इंस्टीट्यूट की बेहतरी के लिए सोचने के अलावा कुछ नहीं होता. हाँ मगर अगर कुछ वक्त मिल जाता है तो मैं किताबें-पढ़ती हूँ. या फिर गाने सुन लेती हूँ.

अपने इन्हीं सब कामों के चलते वी शांता ने जहाँ पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था. वहीं अन्तर्राष्ट्रीय मैग्सेसे अवॉर्ड पाने वाली वी शांता का मानना था कि, ये सम्मान उनके कामों को मान्यता देने का एक जरिया मात्र हैं. इस ये मतलब बिल्कुल भी नहीं है की इन अवॉर्ड के बाद काम खत्म कर दिया जाए. ये सब बस इंस्पीरेशन के लिए है. अपने इन्हीं कामों और कैंसर मरीजों के लिए अपना पूरा जीवन खत्म करने वाली वी शांता ने 19 जनवरी 2021 को दुनिया को अलविदा कह दिया.

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