Dog Father of India, जिन्होंने कुत्तों के लिए बनाई है एक सेंक्चुअरी

कुत्ता, एक ऐसा जानवर जो अपने नेचर में इंसानों के प्रति काफी वफादार होता हैं। इसके बारे में कहते हैं कि अगर किसी ने सिर्फ एक बार भी अगर किसी कुत्ते को खाना खिलाया हो तब भी यह जानवर ताउम्र उसके प्रति वफादार बना रहता हैं। लेकिन इस जानवर की वफदारी ही आज इसके लिए कई तरह की परेशानियों का सबब बन गई हैं। भारत पाकिस्तान जैसे देशों में सड़कों पर घूमने वाले कुत्तों की आबादी ज्यादा है, इनके बारे में कोई सोचता तक नहीं है। ये इस सड़क पर पैदा होते हैं, यही जीते हैं और यहीं मर जाते हैं।

जिस तरह आज इंसानों में क्लास डिवीजन हो गया है। कुत्तों में भी कुछ इसी तरह है। कुत्तें जिन्हें पाला जाता है उन्हें ‘डॉग’ या ‘डॉगी’ कहा जाता है और जो सड़क पर ठोकर खाकर, या किसी गाड़ी के नीचे आकर मर जाते हैं उसे कुत्ता कहा जाता है और शायद यही कारण है कि सड़कों पर घूमनेवाले इन कुत्तों को खाने से ज्यादा लोंगो का गुस्सा मिलता है। समाज में इंसानों का यही दोहरापन इन जानवरों के बारे में हमारी संवेदनाओं को खत्म कर देता है। हम हजारों रुपया खर्च कर विदेशी प्रजाती के डॉग्स खरीद लाते हैं, लेकिन सड़क पर किसी कुत्तें की टॉग टूटी हो तो उसका इलाज नहीं करा सकते, क्योंकि उसे छूने से हमें बीमारी हो जाएगी।

आवारा कुत्ते जिनसे लोग होते हैं शिकार

भारत, बंग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में सड़क पर घूमने वाले आवारा कुत्तों की आबादी इतनी है कि ये आपको हर गली मोहल्ले में दिख जाएंगे। लेकिन इन बेचारे जानवरों को दो रोटी के बजाए आस पास रहने वाले लोंगो के गुस्से का ही शिकार होना पड़ता है। कभी—कभी तो लोग इन्हें खेल की वस्तु बनाकर इनके उपर केमिकल, रंग या कैरोसन तेल डाल देते हैं, यह जानते हुए भी इससे इन्हें दिक्क्त होती है, और जब ये बेजुबान इसी के विपरीत लोंगो को काट लेते हैं तो इन्हें मारने तक के आदेश निकल जाते हैं जैसा कि पाकिस्तान में देखने को मिला था।  

आज स्ट्रीट डॉग कई जगहों की समस्या बन गए हैं। जेएनयू जैसी यूनिवर्सिटी में हर छात्र संघ के चुनाव में आवारा कुत्तों का भी एक मुद्दा जरूर उठता है। लेकिन सरकार से लेकर एनजीओ तक किसी ने भी अभी तक इन स्ट्रीट डॉग्स को लेकर कुछ बड़ा कदम उठाया नहीं है। लेकिन इन स्ट्रीट डॉग्स के लिए एक इंसान है जो आगे आए हैं। जिन्होंने खुद को इनका मां—बाप माना और सभी स्ट्रीट डॉग्स की देखभाल करने का जिम्मा भी उठाया। हम जिस शख्स की बात कर रहे हैं उनका नाम है राकेश शुक्ला।

राकेश शुक्ला की संस्था का नाम है, ‘व्हॉइस ऑफ स्ट्रे डॉग्स’

राकेश पेशे से एक एंटरप्रेन्योर है। उन्होंने स्ट्रीट डॉग्स के लिए एक सैंक्चुअरी बनाई है। जहां राकेश भारत ही नहीं दुनिया में कही से भी उन स्ट्रीट डॉग्स को अपने यहां पनाह देते हैं, जो किसी भी रूप में इंसानी हैवानियत का शिकार हुए होते हैं। यहां बिना आंख वालें डॉग्स से लेकर लंगड़े और कीड़े लगे कुत्तों को बराबर का इलाज और खाना मिलता है। राकेश ने इन स्ट्रीट डॉग्स के निए एक संस्था बनाई है, इस संस्था का नाम है ‘व्हॉइस ऑफ स्ट्रे डॉग्स’।

एक एंटरप्रेन्योर होने से पहले राकेश भारत समेत विदेशों की कई टेलीकॉम कंपनियों में काम कर चुके हैं। वे स्ट्रीट डॉग्स के लिए सैंक्चुअरी बनाने के आइडिया के बारे में बताते हैं कि यह लगभग 7 साल पहले शुरू हुआ, जब उन्होंने सड़क पर दो बेबी डॉग्स को देखा। जिसमें से एक गाड़ी के नीचे आकर मर गया था। ऐसे में मुझे लगा कि इसे अपने साथ लेकर जाना चाहिए और मैं उसे अपने ऑफिस लेकर आ गया। राकेश अपने सैंक्चुअरी के सभी कुत्तों का ख्याल उसी तरह से रखते हैं जैसे कोई अपने एक पालतू डॉग का रखता है।

वे बताते हैं कि उनके यहां लाये जाने वाले कुत्ते काफी खराब हालत में होते हैं। ऐसे में हमें अच्छे मील्स के साथ ही अच्छा खाना देना भी हमारी जिम्मेदारी बन जाती है। वे बताते हैं कि इन्हें हेल्थी
रखने के लिए उनके इस डॉग सैंक्चुअरी में दिन में दो बार 100 केजी चिकेन और 200 केजी चावल बनता है। राकेश के इस डॉग सैंक्चुअरी में अभी तक 20 हजार से ज्यादा ऐसे स्ट्रीट डॉग्स का इलाज हो चुका है जो किसी न किसी रुप में क्रूरता के शिकार हुए थे। राकेश की डॉग्स सेंक्चुअरी में आज 700 डॉग्स हैं, जिन्हें कही न कहीं से रेश्क्यू करके लाया गया है।


फिलहाल राकेश को VOSD चलाने के लिए सरकार की ओर से अभी तक कोई डायरेक्ट या इन डायरेक्ट सपोर्ट नहीं मिला है। लेकिन हां इसे बनाए रखने में उन्हें कोर्ट तक के चक्कर लगाने पड़े। क्योंकि बहुत से लोग उनके इस काम के खिलाफ थे। फिर भी वे इस काम को करते रहे। उनका कहना है कि वे इन डॉग्स की मां हैं, अगर वे इनका ख्याल नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा। स्ट्रीट डॉग्स के प्रति राकेश का यह प्रेम ही है जिसके कारण लोंगो ने उन्हें ‘द डॉग फादर ऑफ इंडिया’ या ‘डॉग विस्पर’ का नाम दिया है।

आज राकेश दुनिया के हर बड़े फोरम पर सड़कों पर अपनी जिंदगी रहनेवाले कुत्तों की आवाज हैं। उन्हें 2013 में बंगलोर के हीरो की भी उपाधी दी गई थी। साथ ही प्रदीप खरे ने अपनी किताब रियल इंस्पाइरिंग स्टोरिज़ में भी राकेश और स्ट्रीट डॉग्स की उनकी कहानी को जगह दी है। पैसा इज्जत और  शोहरत होने के बाद भी राकेश ने एक ऐसे काम को चुना जिसे आम आदमी करने से कतरायेगा। लेकिन राकेश ने यह बीड़ा उठाया और आज वे सैकड़ों बेजुबानों की आवाज हैं।

सच में राकेश की यह कहानी बड़ी ही मोटिवेशनल है और साथ ही हमें यह भी सीख देती है कि धरती पर सबसे शक्तिशाली जीव होने का मतलब यह नहीं है कि कि बेजुबानों पर क्रूरता की जाए। राकेश सच में एक हीरो हैं और हीरो वहीं होता है जो बड़ा होने के नाते अपनी बड़ी जिम्मेदारियों को भी समझता है।

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