Corona Patient का इलाज कर रहे Doctor हो रहे हैं भेदभाव का शिकार

कोरोना वायरस की महामारी से पूरी दुनिया त्रस्द है। इस एक वारस के कारण पूरी दुनिया लॉकडाउन है। लेकिन इस लॉकडाउन में भी कुछ लोग हैं जिनके लिए कोई छूट्टी नहीं है, जिन्हे 24 घंटे काम करना हे और लोगों की जान बचानी है।  हम जिनकी बात कर रहे है वो हैं हमारे मेडिकल क्षेत्र के लोग यानि की डॉक्टर्स, नर्स, कम्पाउंडर और अन्य मेडिकल स्टाफ्स। कोरोना वायरस ने दुनियाभर के डॉक्टरों की जिम्मेदारियां और ज्यादा बढ़ा दी हैं। धरती पर भगवान का दूसरा रुप कहे जानेवाले ये लोग आज लोगों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी क्षमता से ज्यादा काम कर रहे हैं।

आपको याद होगा कि जब चीन में कोरोना वायरस के बारे मं पता चला तो, वहां के डॉक्टर ली वेनलांग ने सरकार के सख्त निर्देशों की परवाह करे बिना इस बारे में पूरी दुनिया को बताया था। ली मौत भी कोरोना पेसेंट की जांच करने के कारण हुए इन्फेक्शन के कारण ही हुई थी। लेकिन ली अकेले नहीं थे और न है जो अपने कोरोना मरीजों का इलाज करते हुए इन्फेट हुए, उनके बाद आज दुनियाभर में कई सारे डॉक्टर इसी तरह मरीजों का इलाज करते हुए इन्फेक्ट हुए है और कई डॉक्टरों की इस कारण जान भी चल गई है।

facing discrimination

हमारे देश भारत की बात करें तो यहां का हाल भी दुनिया के बाकी के देशों की तरह है। भारत में दुनिया के बाकी बड़े देशों की तुलना में कोरोना के मामले कम हैं। लेकिन बात जब मेडिकल सिस्टम की आती है तो हमारा देश हेल्थ केयर और मेडिकल फैसिलिटी के मामले मेंं पड़ोसी भुटान और बंग्लादेश से भी पीछे है। इस मामले में भारत की रैकिंग 145 है। हालांकि यह रैकिंग पिछले 26 सालों में हुए कुछ सुधारों के कारण मिली है, लेकिन अभी भारत को और कई सुधार करने हैं।

सुरक्षा किट के अभाव में डॉक्टर भी हो रहे संक्रमित

कोरोना वायरस के भारत में आने के बाद से ही देश की सरकार को भी यह एहसास हो गया कि हमारा मेडिकल सिस्टम किस स्थिति में है और शायद इस लिए इस महामारी को लेकर सरकार इटली और अमेरिका का उदहारण देते हुए दिखाई दी। खैर, यह बात तो हम सब जानते हैं कि कोरोना के कारण पूरी दुनिया में अभी तक 5 लाख से ज्यादा लोग पीड़ित हैं, जिसमें से 23 हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई है। भारत में कोरोना के मामले 722 के करीब हैं और 16 लोगों की मौत हो गई है। वहीं आंकड़ों के अनुसार भारत में 1 लाख से ज्यादा लोगों को ऑब्जरवेशन में रखा गया है। लगातार बढ़ती मरीजों की संख्या ने डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ्स का काम और बढ़ा दिया है।

जब से दुनिया में कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई की शुरु हुई है तब से इसमें डॉक्टरों और नर्सों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। ये लोग अग्रिम पंक्ति में हैं, ऐसे में कोरोना से इनके संक्रमित होने के चांसेस सबसे ज्यादा है। इन स्वास्थ्यकर्मियों को रोज कई अनजान व्यक्तियों को देखना होता है और वे इस काम को करते हैं बिना इस बात की चिंता करते हुए कि उनकी जिंदगी भी खतरे में पड़ सकती है। दुनिया की तरह ही भारत में भी ऐसे डॉक्टरों की संख्या बढ़ रही है जो मरीजों के संपर्क में आने के कारण कोरोना पॉजिटिव हुए है।।

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डॉक्टरों के इसी सेवा भाव के लिए जब 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था तो लोगों से इनके सम्मान में पांच मिनट के लिए ताली बजाने की बात कही थी और लोगों की ओर से इसे एक बेहतर रिसपांस भी मिला था।

लेकिन इस बीच हमारे सामने एक कड़वी सच्चाई भी है। कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो हमे सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या सांकेतिक सम्मान से परे समाज और हमारा प्रशासन स्वास्थ्यकर्मियों को सही में वो सम्मान दे रहा है जिसके वे हकदार हैं।

पिछले कुछ दिनों में देश के कई हिस्सों से खबरे सामने आई हैं, जो बताती हैं कि लोगों की जान बचाने में जुटे इन लोगों के पास अपनी सुरक्षा तक के समान नहीं हैं। सुरक्षा किट जैसे मास्क, दस्ताने, सूट इत्यादि की भारी कमी है, लेकिन इस अभाव में भी ये लोग मरीजों और संदिग्ध मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इसी कारण ये भी कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं। सिर्फ बिहार की राजधानी पटना को ही अगर ले लें तो यहां कम से कम 83 की संख्या में डॉक्टर इस वायरस से संक्रमित हुए हैं, जिन्हें क्वारंटीन कर दिया गया है। डॉक्टरों के संक्रमित होने के कारण अब मेडिकल विभाग ने सरकार से अपील की है कि डॉक्टरों के लिए सुरक्षा किट उपलब्ध कराया जाए।

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ऐसी खबरें देश के हर कोने से सामने आ रही हैं। हाल ही में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट करके भारत सरकार को कहा है कि मार्च महीने में ही 7.25 लाख सूट चाहिए थे लेकिन पता नहीं वे कब तक उपलब्ध कराए जाएंगे। वहीं कई खबरें ऐसी भी हैं कि 19 मार्च तक तो भारत सरकार इन चीजों को भारत से बाहर निर्यात कर रही थी। ये निर्यात तब रोके गए जब कोरोना के मामले 200 के पार निकल गए। वहीं सरकार की ओर से हाल ही जारी एक निर्देश में यह जोर दिया गया था कि स्वास्थ्यकर्मी इन उपकरणों का इस्तेमाल सीमित तौर पर करें। ऐसे में तो यही लग रहा है कि सरकार के लिए अभी जरूरत के हिसाब से सुरक्षा किट उपलब्ध करा पाना पॉशिबल नहीं है।

डॉक्टर को घरों से निकाल रहे हैं मकान मालिक 

एक ओर जहां डॉक्टर सुरक्षा किट की कमी से जूझ रहे हैं । वहीं दूसरी ओर सामाजिक तौर पर भी एक रूढ भावना ने उनकी जिंदगी पर बड़ा असर डाला है।। जिन डॉक्टरों के लिए 22 मार्च को हमारा समाज सम्मान दिखा रहा था आज उसी समाज में डॉक्टरों को एक अलग तरह की घृणा का शिकार होना पड़ रहा है। जैसा की हमने पहले ही बताया कि सुरक्षा किट के अभाव में डॉक्टरों के कोरोना से संक्रमित होने की संभावना ज्यादा है।….. बस इसी बात ने हमारे समाज में एक अंधविश्वास को जन्म दे दिया है। डॉक्टरों को इसी कारण से न सिर्फ लोगों की ओर से घृणा का शिकार होना पड़ रहा बल्कि उन्हें उनके आसियाने से भी हाथ धोना पड़ रहा है।

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दिल्ली के प्रतिष्ठित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के रेजिडेंट डॉक्टरों के संगठन ने कहा है कि देश भर में किराए के मकानों में रहने वाले डॉक्टरों, नर्सों और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों को वायरस के संवाहक होने के डर से उनके घरों से निकाला जा रह है। संगठन ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस बारे में बताते हुए कहा है कि कई डॉक्टर अपने सामान के साथ सड़कों पर आ गए हैं। संगठन ने सरकार से ऐसे डॉक्टरों की मदद करने की अपील की है। डॉक्टरों के संगठन की इस अपील को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन ने ट्वीट कर लोगों से ऐसा नहीं करने की अपील की है। दिल्ली सरकार ने भी अधिसूचना जारी करके ऐसे मकान मालिकों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही है। बता दें कि कुछ समय पहले ठीक ऐसा ही बर्ताव दूसरे देशों में फंसे भारतीय नागरिकों को वापस लाने वाले विमानों को चलानेवाले पायलटों के संग भी किए जाने की बात सामने आई थी।

सरकार की ओर से तो इस बारे में कार्रवाई करने की बात कही गई है, लेकिन हमारा समाज-…. वो इस बारे में क्या कर रहा है। हम किस तरह का समाज बना रहे है, जो समाज सबको अपनाने की बात करता है, किसी भी तरह का भेद-भाव नहीं करने की बात करता है, वो समाज आज किस दिशा में जा रहा है? समाज में पनपते ऐसे माहौल चिंतित करनेवाले हैं। माना कि कोरोना से बचाव जरूरी है, लेकिन बचाव के तौर पर बात तो सोशल डिस्टेंस मेंटेन करने की हुई थी, रेसिज्म की नहीं। समाज को अपने इस वर्ताव पर चिंतन करने की आवश्यकता है। हमे समझना होगा कि जो लोग बिना अपनी परवाह किए लोगों की जान बचा रहे हैं, उनको सिर्फ थाली और ताली पीटकर थैंक्स बोलने से हमारा काम खत्म नहीं हो जाता है, सम्मान व्यवहार में झलकना चाहिए। डिस्टेंस मेंटेन करिए लेकिन सोशल वाला डिस्टेंस , घृणा से भरी दूरी मत बनाइए।

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