20 हज़ार में शुरू हुआ गारमेंट्स बिज़नेस बना करोड़ों का कारोबार, जिसे चलाती हैं डेज़ी

दुनिया जैसे जैसे विकास की ओर अग्रसर है. वैसे वैसे दुनिया से इंसानियत खत्म होती जा रही है. किसी की परवाह खत्म होती जा रही है. इसकी शायद बस एक वज़ह है कि, खुद की परवाह और लोभ. लेकिन इसके अलावा भी कुछ गिने चुने लोग फिर भी उस अपवाद की तरह दुनिया को संभाले हुए हैं. जैसे की शास्त्रों के अनुसार शेषनाग के फन पर धरती. खैर ये तो पहेलियों जैसा है. हालांकि असल हकीक़त की बात करें तो मध्यप्रदेश के भोपाल से ताल्लुक रखने वाली डेज़ी की ज़िदगी कुछ ऐसी ही है.

वो कहते हैं मदद करने की चाहत हो और जिंदगी को बेहतर करने के सपने अगर आप में हो तो आप सब कुछ कर सकते हैं. डेज़ी भी यही करती हैं. लोगों की मदद, ज़िंदगी को भरपूर जीने की चाहत. यही वजह है कि, जिस डेज़ी को हमेशा से लोगों की मदद करने में खुशी महसूस होती थी और ये काम शादी के बाद भी जारी रहा. यही वजह है कि, डेज़ी शादी के बाद जब अपने पति के घर अलीगढ़ पहुंची तो वहां भी वो अपने आप को लोगों की मदद करने से रोक नहीं सकी. यही वजह रही की ससुराल में आने के बाद भी उन्होंने अपना सबसे पसंदीदा काम नहीं छोड़ा.

डेज़ी खुद बताती हैं कि, “वो हमेशा से देश की महिलाओं, खासकर गाँव की महिलाओं के साथ-साथ पिछड़ी व निचले तबके की महिलाओं के उत्थान को लेकर सोचती हैं कि, कैसे इन्हें आगे किया जाए. ऐसा क्या किया जाए की इन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जाए. जिससे इन महिलाओं को किसी के आगे झुकना न पड़े. इनके पास कोई हुनर तो ऐसा हो जिससे चलते इन्हें किसी दूसरे के आगे विवश न हो पड़े.”

हालांकि गाँव की महिआऐं आज भी न तो शिक्षित हैं न ही उतनी सशक्त की वो अपने परिवार को सबल बनाने के साथ, चुनौतियों से लड़ सकें. यही वजह रही कि, डेज़ी ने आज से लगभग 12 साल अलीगढ़ में ‘कबीर इंटरनेशनल’ नाम से गारमेंट्स का काम शुरू या. जिसमें उन्होंने महज़ उन महिलाओं को रोज़गार देना शुरू किया. जिन्हें इसकी जरूरत थी. चाहे वो कोई बुजुर्ग महिला हो, तलाक़शुदा हो, गरीब या फिर विधवा ही क्यों न हो.

ऐसे शुरू हुआ कबीर इंटरनेशनल गारमेंट्स का सफर

डेज़ी बताती हैं कि, अलीगढ़ में जिस समय उन्होंने अपनी फ़ैक्टरी का काम शुरू करने की सोची, उसी समय उन्होंने सड़क के किनारे एक आदमी को देखा था. जो सड़क पर ही सिलाई का काम करता था. हालांकि जब उन्होंने उस आदमी से बात की तो उन्हें पता चला कि, उस इंसान के पैर में इन्फेक्शन है. जिसके चलते न तो कोई दुकानदार उन्हें काम पर रखता है और न ही फ़ैक्टरी में उन्हें रोज़गार मिल पाया है. जिसको सुनकर डेज़ी ने उस इंसान को अपनी गाड़ी में बैठाकर डॉक्टर को उसका पैर दिखाया. पूरा चेक अप होने के बाद डॉक्टर ने उसकी दो अंगुलियों का ऑपरेशन किया. इस दौरान उन्होंने उस इंसान का पूरा ख्याल रखा.

डेज़ी कहती हैं कि, इस बात को लगभग 15 साल होने को हैं. उसी समय मैंने अपना गारमेट्स का काम शुरू किया और आज ये शख्स मुझसे जुड़ा होने के साथ-साथ मेरी गैर मौजूदगी में अलीगढ़ का पूरा काम काम देखता है.

यहाँ जॉब के लिए महिलाओं को नहीं होना होता क्वालीफाई

डेज़ी कहती हैं कि, “हमारे यहाँ काम करने वालों के लिए किसी भी तरह की शिक्षा की जरूरत नहीं. मैं चाहती हूँ कि, मैं उन सभी महिलाओं का सहारा बन सकूँ. जो हालात के सताए हैं. यही वजह है कि, मैं उन हद से ज्यादा टूट चुकी महिलाओं का सहारा बनना पसंद करती हूँ. ताकि उन्हें मोटिवेट कर सकूँ. फिर उन्हें ट्रेनिंग देकर उस काबिल बना सकूँ. जहां से वो अपनी मंजिल खुद चुन सकें साथ ही मुख्यधारा से जुड़ सकें.”

शायद यही वजह है कि, आज भोपाल के कानूगांव की हजारों महिलाएं कपड़े सिलने का काम अपने घर से ही कर रही हैं और सभी जरूरी सामान डेज़ी उन्हें मुहैया करा रही हैं.

पति ने हर कदम पर निभाया डेज़ी का साथ

यही वजह है कि, अपना सफलता का सारा श्रेय डेज़ी अपने शौहर सैय्यद हसन कबीर को देती हैं. साथ कहती हैं कि, “जिंदगी में कई मौकें आए, जब इस काम में चुनौतियों ने दस्तक दी. कई बार ऐसा लगा सब बिखर जाएगा. हालांकि मेरे पति ने मेरा हर पल साथ दिया. साथ मुश्किलों से लेकर चुनौतियों में हर कदम मेरे साथ रहे.

यही वजह की आज से 12 साल पहले महज़ 20 हज़ार रुपये में शुरू हुआ कबीर गारमेट्स आज अलीगढ़ से निकलकर देश के कई हिस्सों में अपनी जगह बना चुका है. जहां कबीर गारमेंट्स के भोपाल में 25 कारखाने हैं तो वहीं दिल्ली में 5, बुंलद शहर, अमरौली व हरदोई में भी इसके गारमेंट्स के कारखाने हैं. इतना ही नहीं देश की नामी कंपनियां जैसे की विशाल मेगा मार्ट, वी मार्ट जैसी कंपनियों में भी आज कबीर गारमेंट्स के क्लाइंट हैं.

आज डेज़ी की कंपनी कबीर गारमेंट्स में महिलाओं से लेकर पुरुषों के अलग-अलग सेगमेंट में कपड़े तैयार किए जाते हैं. साथ ही कई कंपनियों को इसकी सप्लाई दी जाती है. महज़ अलीगढ़ में ही डेज़ी एक हज़ार से ज्यादा ज़रूरतमंदों को रोज़गार देती हैं.

वाकई अगर हमारी सोच में उड़ने की क्षमता है तो, हर इंसान उड़ सकता है. ऐसा की मानों वो उड़ान उसके जीवन की सबसे बेहतर उड़ान हो. डेज़ी की सोच कुछ ऐसी ही है. तभी तो आज डेज़ी उन अग्रिम महिलाओं में शुमार है. जिन्हें अपनी फ्रिक के साथ उनकी भी फ्रिक है. जिनकी फ्रिक कोई नहीं करता.

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