Chitra Chandrachud – रूढ़िवादी सोच को मुँह चिढ़ाती महिला पंडित

हमारा समाज पुरुष प्रधान है ये बात बताने की कोई जरुरत नहीं आपको भी पता ही है और ये भी बताने की जरुरत नहीं है कि महिलाएं आज आत्मनिर्भर हैं लेकिन हर गाँव हर कस्बे और हर शहर में नहीं। आज ही नहीं बल्कि हमारे समाज में कई चीज़ें ऐसी हैं, जो सदियों से पुरुष प्रधान रही हैं। समाज की उस ज़िम्मेदारी को निभाने वाला केवल पुरुष ही होगा।

लेकिन क्या वाकई ऐसा है? कुछ ज़िम्मेदारियां केवल पुरुष ही निभा सकते हैं? शायद हाँ तभी तो आज भी एक पेशा ऐसा है, जहां आज भी केवल पुरुषों का ही दबदबा है और वो है पंडित। लेकिन समाज में फैली इस सोच को बदलने का काम किया पुणे की रहने वाली 72 साल की चित्रा चंद्रचूड़ ने जो शादी से लेकर अंतिम संस्कार तक की विधि करवाती हैं। चित्रा एक महिला पंडित हैं। वो करीब 20 सालों से इस काम को कर रही हैं।

Chitra Chandrachud – 200 अंतिम संस्कार और 100 शादियां करवा चुकी है चित्रा

चित्रा को इस प्रोफ़ेशन में रहते हुए 20 साल हो गए हैं। इस दौरान उन्होंने करीब 200 अंतिम संस्कार की विधि और करीब 100 शादी समारोह को बतौर पंडित सम्पन्न करवाया है। समाज की वो ज़िम्मेदारी जो केवल पुरुषों के ही नाम थी, उसमें भी अब महिलाएं आगे आ रही हैं। मगर फिर भी महिला पंडित के तौर पर काम करना महिलाओं के लिए आज इतना जाना-माना प्रोफ़ेशन नहीं हैं।

पुरुष प्रधान समाज में इस प्रोफ़ेशन को चुनना चित्रा के लिए आसान नहीं था। 1997 में चित्रा ने एक मराठी किताब ‘गार्गी अज़ुन जीवंत आहे’ पढ़ी थी। इस किताब में गार्गी एक महिला पुजारी होती है, जो लोगों के अंतिम संस्कार की विधि करवाती है। इस किताब को पढ़ने के बाद चित्रा को इंस्पिरेशन मिली।

Chitra Chandrachud – काफी मुश्किल भरा था चित्रा का पंडित बनने तक का सफर

इसके बाद उन्होंने जनान प्रबोधिनी इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया और दीक्षा प्राप्त की। अच्छी बात ये थी कि इतने साल पहले भी इस काम में चित्रा के परिवार ने भी उनका बखूबी साथ दिया। शुरुआती दिनों में चित्रा के लिए भी ये काम थोड़ा मुश्किल था। लोगों के लिए उन्हें एक्सेप्ट करना मुश्किल था।

क्योंकि आज भी हम घरों में पूजा पाठ के लिए पुरुष पंडितों पर ही भरोसा कर पाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे चित्रा ने अपनी जगह बनाना शुरू कर दिया। आज के समय में चित्रा नामकरण, शादी से लेकर अंतिम संस्कार तक की हर विधि करवाती हैं। लोगों से भी उन्हें उसी तरह का आदर-सम्मान मिलता है, जो कि पुरुष पंडितों को मिलता है।

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