बेगम हजरत महल जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक किए हिंदू-मुस्लिम

बेगम हजरत महल एक ऐसी महिला थी जिन्होंने अपनी मेहनत एवं लगन से इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया। अवध की बेगम हजरत महल ने आजादी के पहले युद्ध के दौरान अंग्रेजों के साथ लड़ाई भी की थी। ऐसा कहा जाता है कि, उन्होंने हाथी पर सवार होकर ना सिर्फ अपनी सेना को दांव पर लगाया बल्कि उन्होंने विदेशी शासकों के खिलाफ जंग जीतने के लिए हिंदू और मुस्लिमों को एकजुट भी किया था।

ऐसी महान भारतीय नारी के बारे में हम सभी को अवश्य जानना चाहिए। आइए आज हम बात करते हैं बेगम हजरत महल के बारे में जिन्होंने युद्ध भूमि में अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई की और हमारे दिल में एक ऊंचा स्थान बनाया।

वह थी बेगम हजरत महल जिन्होंने अपने बलबूते पर रच दिया इतिहास:

बेगम हजरत महल मोहम्मदी खनूम के नाम से जानी जाती थी और इनका जन्म सन 1820 ई. में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में हुआ था। बेगम हजरत महल को ‘ महक परी ‘ के नाम से भी जाना जाता था। बेगम हजरत महल पेशे से एक तवायफ के रूप में जानी जाती थी। बेगम हजरत जन्म से ही एक निडर महिला थी। एक खूबसूरत और तेज दिमाग वाली महिला।

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प्रारंभिक जीवन में उन्हें अवध के दरबार में गणिका के पद पर नियुक्त किया गया और बाद में इन्हें शाही हरम में एक ख़्वासीन के पद पर नियुक्त किया गया। ख़्वासीन के बाद बेगम हजरत को परी के पद पर स्थापित किया गया और इसी पद के नाम पर इनका एक नाम महक परी भी पड़ा।

परी पद के बाद बेगम हजरत महल से अवध के आखिरी नवाब वजीर अली शाह ने विवाह कर लिया एवं इन्हें अपनी बेगम बना लिया। विवाह के बाद जब इनका 1 पुत्र हुआ तो इसके बाद ही इनका नाम बेगम हजरत महल पड़ा । इससे पहले इन्हें मोहम्मदी खनूम के नाम से ही जाना जाता था।

भारत में 1857 ई. की क्रांति में बेगम हजरत महल की शानदार भूमिका:

जब भारत आजाद नहीं हुआ था, उससे पहले 1800 ईसवी में कुछ क्रांतिकारियों द्वारा एकजुट होकर आंदोलन चलाया जा रहा था। इस क्रांतिकारी आंदोलन में बेगम हजरत महल भी शामिल थी। जब यह आंदोलन हो रहा था, तब बेगम हजरत महल ने अवध की गद्दी पा ली थी और उस पर अपने बेटे बृजेश कादिर को अवध का नवाब घोषित कर दिया था।

अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी की क्रांति में बेगम हजरत महल ने एक शानदार भूमिका निभाई और इस क्रांति के बाद ही भारत में अन्य क्रांतियों की शुरुआत हुई। इन्हीं लाख कोशिशों के बाद ही धीरे-धीरे भारत देश अंग्रेजों की चंगुल से बाहर निकला।

बेगम हजरत महल ने जेल में ली आखिरी सांसें :

1857 की क्रांति के बाद आगे फिर से इस तरह का आंदोलन ना किया जाए, इसके लिए जमीदारों ने इस पर निगरानी की। इस क्रांति में भाग लेने वाले लोगों को जेल के अंदर डाल दिया गया क्योंकि इस क्रांति में काफी ज्यादा अंग्रेजी प्रशासन का विरोध किया गया, जो ब्रिटिश सरकार सहन नहीं कर पाई।

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1858 ईसवी में बेगम हजरत महल के साथ-साथ उनके अन्य कई साथियों को जेल के अंदर डाल दिया गया। बेगम हजरत महल ने अपने साथियों के साथ मिलकर पूरे तन मन से लड़ाई की परंतु गिरफ्तार कर लेने के बाद जब उन्हें जेल भेज दिया गया तब कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने जेल के चारदीवारी में ही अपनी अंतिम सांस ली।

जामा मस्जिद घंटाघर के पास काठमांडू में है बेगम हजरत महल का स्मारक :

बेगम हजरत महल ने अपने सौर्य से इतिहास में कुछ इस तरह से अपना स्थान बनाया है कि उनके नाम पर एक स्मारक का भी निर्माण रखा गया है। यह स्मारक मकबरा के रूप में जामा मस्जिद घंटाघर के पास काठमांडू में है। यह दरबार मार्ग से बहुत अधिक दूरी पर नहीं है और इस स्मारक की देखभाल जामा मस्जिद केंद्रीय समिति द्वारा किया जाता है।

इस स्मारक के लिए भारत सरकार ने 10 मई 1984 को इस महल के सम्मान में एक स्मारक टिकट भी जारी किया था और यह सी आर पकराशि द्वारा डिजाइन किया गया। अभी तक इस स्मारक के लिए 15 लाख से भी ज्यादा टिकट जारी किए है।

नेपाल यात्रा के दौरान बेगम हजरत महल :

बेगम हजरत महल के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसमें इन्होंने अपने जीवन को नए रुख की तरफ मोड़ा। परंतु एक ऐसा समय आया जब उनके पास अंग्रेजों से लड़ने के लिए कोई साधन नहीं थे और वे अंग्रेजों से हार गई थी परंतु उन्होंने स्वयं को अंग्रेजों के हवाले नहीं किया। उन्होंने नेपाल जाने से पहले नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर के शरण में जाना चाहा। लेकिन उन्होंने पहले तो उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया लेकिन बाद में उन्होंने बेगम को शरण दी।

नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर की शरण में रहकर बेगम हजरत महल ने अपने जीवन के अंतिम दिन व्यतीत किए। नेपाल में रहने के दौरान ही 1879 ईस्वी में बेगम हजरत महल की मृत्यु हो गई और इन्हें काठमांडू की एक मस्जिद के मैदान में अज्ञात रूप से दफन कर दिया गया। इनकी मृत्यु के बाद रानी विक्टोरिया की जयंती के अवसर पर सरकार ने बिरजिस कद्र को माफ कर दिया और उन्हें घर जाने की दिया।

बेगम हजरत महल ने अपने पूरे जीवन में हिंदुओं एवं मुस्लिमों को एकजुट करने का जो साहस दिखाया वह वाकई में सराहनीय था। एक महिला होकर उन्होंने अंग्रेजों के सामने जिस बहादुरी से युद्ध किया वह कई बार तो पुरुषों के लिए भी असंभव होता है। उन्होंने अपने बुद्धिमानी और प्रयासों के द्वारा गुलामी के जंजीरों को काटने का प्रयास किया और आज भी हमारे दिल में एक महत्वपूर्ण स्थान के साथ सम्मान को लेकर जीवित है।

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