अरूप सेनगुप्ता, जो बरसों से संवार रहे हैं सेक्स वर्कर्स की जिंदगी

यूँ तो हम सबने प्रेरणादायी कहानियां न जानें कितनी ही पढ़ी हैं और न जानें कितनी ही सुनी हैं. ऐसे में न जानें कितने ही लोग हैं. जो अपने इन्हीं कामों के चलते देश-दुनिया के लिए मिसाल हैं. ऐसे में हम आज आपको इसी तरह एक ऐसे शख्स से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं जिन्होंने अब तक अपने संघर्ष के चलते उन महिलाओं और बच्चों की ज़िंदगी संवारने का जिम्मा उठा रखा है. जिन्हें हमारा समाज़ दुत्कार देता है.

हम जिस शख्स की बात कर रहे हैं उनका नाम है अरूप सेनगुप्ता. बंगाल के कोलकाता शहर में रहने वाले अरूप सेनगुप्ता आज सेक्स वर्कर्स और उनके बच्चों के लिए संघर्ष करते हैं ताकि उन्हें बेहतर जीवन मिल सके. अपने स्वास्थ्य में कई बीमारियों से परेशान रहने वाले, लगभग 70 साल के अरूप सेनगुप्ता जहां भी जाते हैं. उनका ऑक्सीजन सिलेंडर उनके साथ होता है. जिसकी वजह है उनका क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) नाम की बीमारी से ग्रसित होना.

इस बीमारी के बारे में अरूप सेनगुप्ता को आज से लगभग 7 साल पहले मालूम चला. इस बीमारी से पीड़ित होने के बाद भी अरूप इस बीमारी से लड़ तो रहे हैं. साथ ही उन महिलाओं और बच्चों के लिए भी लड़ रहे हैं. जिन्हें ये समाज़ दुत्कारता रहता है. यही नहीं अरूप सेनगुप्ता को (COPD) बीमरी के अलावा ट्यूबरक्लोसिस की बीमारी से भी पीड़ित रह चुके हैं. उसके बाद भी ये बीमारियां अरूप के हौसलों को नहीं तोड़ पाई है.

ऐसे शुरू हुआ सेक्स वर्कर्स की जिंदगी संवारने का सफर

आज से लगभग चार साल पहले अरूप सेनगुप्ता ने एक एनजीओ ‘नोतून जीबोन’ शुरू किया था. जिसका हिंदी मतलब होता है नया जीवन. ऐसे में अरूप कहते हैं कि, “मैं अपनी आखिरी साँस तक इन सबके लिए काम करता रहूँगा. यही मेरा मकसद और उद्देश्य है. मैं इन सभी की ज़िदंगी में बदलाव लाना चाहता हूँ यही मेरी कोशिश है और मरते दम तक ये कोशिश जारी रहेगी.”

इस संगठन के जरिए अरूप सेनगुप्ता अब तक लगभग 40 सेक्स वर्कर्स को उस दलदल से निकाल चुके हैं. जबकि उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा और बेहतर जीवन मिल सके. उस दिशा में काम कर रहे हैं. यही नहीं अपने एनजीओ ‘नोतून जीबोन’ के तहल अरूप घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को भी बचाते हैं.

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साल 1952 में एक अमीर परिवार में जन्में अरूप बताते हैं कि, “साल 1968 में ही मैंने अपने पिता को खो दिया और मेरी माँ इस सदम को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकी. जिसके चलते माँ नशे की आदि हो गई. घर चलाने की खातिर मेरी बड़ी बहन क्लब में डांस करने लग गई. इन सबके अलावा उसी समय मुझे ट्यूबरक्लोसिस (टी.बी) हो गई. जिस समय मेरे पड़ोसियों को इस बीमारी के बारे में मालूम चला. मेरे पड़ोसियों ने हमें जगह खाली करने पर मजबूर कर दिया. ये वो समय था, जैसे आज लोग कोविड-19 के मरीज़ों से मुंह फेर लेते हैं. उस समय ट्यूबक्लोसिस बीमारी को लेकर लोगों को रवैया रहता था.”

यही वजह था कि, अरूप को अपना घर छोड़कर एक शेल्टर होम में शरण लेनी पड़ी. जहां उन्हीं की तरह अनेकों और ट्यूबक्लोसिस से ग्रसित मरीज़ थे. उस वक्त को याद करते हुए ही अरूप बताते हैं कि, “मैं जिस कमरे में था. वहां मेरी तरह अनेकों मरीज़ थे. जिन्हें टी.बी थी. मैं वहां कई लोगों को मरते देखा था. हमारे वहां मशीन लगी थी और जब भी हम बीप की आवाज़ सुनते हमको मालूम चलता हमने फिर से किसी को खो दिया. ये मेरी बदकिस्मती समझो या कुछ मगर उस शेल्टर होम के कमरे से महज़ दो लोग ही जिंदा वापस लौटे, जिसमें एक मैं था.”

अपने घर वापस लौटने के बाद अरूप दो साल तक घर पर ही रहे. जहां उनकी नियमित देखभाल के चलते एक बार फिर अरूप सामान्य हो गए. लेकिन मुश्किलों का दौर उनमें घर कर गया था.

नोतून जीबोन एनजीओ बना नई पहचान

अरूप बताते हैं कि, जिस समय मैं लगभग सब कुछ खो चुका था. उस समय मैंने शादियों से लेकर अन्य अवसरों में अपनी जीविका के लिए गिटार और ड्रम बजाने का काम शुरू किया. ताकि पैसे कमा सकूँ और अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूँ. जिसके बाद मैंने दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई जैसे शहरों में अपनी ज़िदगी के 45 साल निकाल दिए. इस दौरान मैंने मानव पूंजी प्रबंधन क्षेत्र से लेकर कॉर्पोरेट की दुनिया में काम किया. फिर मैंने इस दुनिया से रिटायरमेंट लेकर वापस अपने कोलकाता लौटने का इरादा बनाया. और इतने सालों बाद में वापस फिर अपने शहर लौट आया.”

अरूप जिस समय कोलकाता छोड़कर निकले थे. और जिस समय अरूप वापस कोलकाता पहुंचे. उन्हें लगा ये कोलकाता वो कोलकाता नहीं. जिसे वो असरा पहले छोड़ आए थे. जिसकी वजह थी वहां की गरीबी. यही वजह थी कि, अपने शहर लौटने के बाद उन्होंने 31 दिसंबर 2016 को 10,000 रुपये के कंबल खरीदें और अपने आस-पास रह रहे मजबूर लोगों को वो कबंल बांट दिए. जिसके बाद ही उन्होंने ‘नोतून जीबोन’ एनजीओ शुरू करने की योजना बनाई.

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अपनी योजना पर काम करने के लिए अरूप ने नोतून जीबोन को पंजीकृत कराया और फिर अपने ट्रस्ट के नाम के मुताबिक ज़रूरतमंद बच्चों से लेकर उन महिलाओं के लिए काम करना शुरू कर दिया. जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी. आज लगभग 4 साल से अरूप सेनगुप्ता सेक्स वर्कर्स से लेकर बच्चों के लिए काम कर रहे हैं. ताकि उनका जीवना बेहतर किया जा सके.

लॉकडाउन में लोगों की ज़रूरत बना नोतून जीबोन

अरूप बताते हैं कि, “आज हमारे यहां 3 साल से लेकर 12 साल तक के बच्चें हैं. जिन्हें हमारा समूह पढ़ाता है. हालांकि देश में लगे सर्व व्यापी लॉकडाउन में वो पढ़ने नहीं आते थे. ऐसे में हम उन तक राशन पहुंचाते थे. यही नहीं इस महामारी के दौरान मैं अपने वालिंटियर को सैलरी भी देता था ताकि उन्हें किसी भी तरह की मुसीबत न हो. ऐसे में हमारी टीम लगभग 400 से ज्यादा सेक्स वर्कर्स को साप्ताहिक राशन देती थी. जिसमें दाल, चावल, तेल, आटा, आलू सब कुछ होता था. ताकि किसी को भी कोई दिक्कत न हो.”

एनजीओ में लगा दी पूरी उम्र की पूंजी

अरूत इसके आगे बताते हैं कि, “मैं अपने 45 सालों में जितना कुछ कमाया था. सब कुछ अपने इस एनजीओ में लगा दिया. ताकि मैं उन सभी को बेहतर जीवन दे सकूं. आज सोशल मीडिया पर या अन्य जगहों पर भी लोग हमारी एनजीओ की फंडिंग के लिए आगे आते हैं. हमारा ये काम यूँ ही चल रहा है. मैं अपने मरते दम तक ये करता रहूंगा. ताकि इन्हें बेहतर जीवन मिल सके.”

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