हिंदी सिनेमा की पहली अभिनेत्री का किरदार निभाने वाले अन्ना सालुंके

बॉलीवुड का ग्लैमर आज हर एक भारतीय को लुभाता है, शायद ही कोई इंसान आज होगा फिल्में देखना न पसंद हो. जहां एक तरह अनेकों लोग सिनेमाघरों में इसलिए जाते हैं ताकि, वो अपने पसंदीदा स्टार्ट और अभिनेता को देख सकें तो, वहीं दूसरी ओर फिल्मों के हिट होने में अभिनेत्रियों का भी खासा रोल रहता है. लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक दौर ऐसा भी था. जिस समय फिल्मी दुनिया में कोई अभिनेत्री नहीं बनना चाहता था. यही वजह थी कि, भारत में बनी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र को बनाने वाले फिल्मी दुनिया के जनक दादा साहेब फालके को, इस फिल्म को बनाने की खातिर अभिनेत्री का किरदार निभाने के लिए एक कुक को हायर करना पड़ा था. क्या आप जानते हैं की आखिर वो कुक कौन था? अगर नहीं तो चलिए हम आपको बताते हैं.

3 मई 1913 को रिलीज हुई भारत की पहली साइलेंट फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र को गिरगांव के कोरोनेशन थिएटर में रिलीज किया गया था. जिसे देखने की खातिर चिलचिलाती गर्मी में भी लोगों की कतार एक तरफ जहां कम नहीं हो रही थी. वहीं दूसरी ओर ये फिल्म भारतीय सिनेमा की नींव बन चुकी थी.

दादा साहेब फालके ने बनाया हिंदी सिनेमा

राजा हरिश्चंद्र फिल्म से निर्देशन का काम करने वाले दादा साहेब ने जहां इस फिल्म के जरिए देश में सिनेमा की नींव रखी. वहीं दूसरी ओर इससे पहले वो फोटोग्राफी और प्रिंटिंग प्रेस का काम करते थे. लंदन से फिल्म मेकिंग का कोर्स करके भारत आने के बाद से ही दादा साहेब फालके भारत में फिल्म बनाना चाहते थे. वो हमेशा से चाहते थे कि, मैं कोई फिल्म बनाऊं जिसमें अभिनय से लेकर हर काम भारतीय करें. अपनी इसी उधेड़बुन के चलते उन्होंने आखिर में ‘राजा हरिश्चन्द्र’ की मशहूर कहानी पर फिल्म बनाने की कवायद शुरू की और फिर इस फिल्म के लिए कास्टिंग शुरू कर दी.

ऐसे हुई राजा हरिश्चंद्र की कास्टिंग

जहां एक तरफ अपने शुरूवाती समय में ही इस फिल्म के लिए दादा साहेब फालके को पुरुषों का किरदार निभाने वाले लोग आसानी से मिल गए. वहीं राजा हरिश्चंद्र के बेटे का किरदार निभाने की खातिर उन्होंने अपने बेटे को चुना. हालांकि जिस समय बात इस फिल्म की नायिका की खोज़ पर पहुंची तो दादा साहेब की मुश्किलें बढ़ गईं.

जिसकी वज़ह थी कि, उस दौर में रंगमंच या किसी अभिनय में लड़कियों को तुच्छ नज़र से देखना. या यूँ कहें तो…उस दौर में लड़कियों को लोग घरों के अंदर ही देखना पसंद करते थे. उन्हें रंगमंच, नाच, गाना इन सबसे दूर रखा जाता था. यही वजह थी कि, उस दौर में महिलाओं की भूमिका भी पुरुष कलाकार ही निभाते थे. कई प्रयास करने के बाद भी दादा साहेब को फिल्म में राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती का किरदार निभाने के लिए कोई महिला अभिनेत्री नहीं मिल सकी.

जब अन्ना सालुंके ने निभाया तारामती का किरदार

हर तरफ से असफल रहने वाले दादा साहेब फालके को जब कोई अभिनेत्री इस किरदार के लिए नहीं मिल सकी तो, उन्होंने इस किरदार की खातिर अपनी पत्नी से बात की. हालांकि फिल्म-निर्माण में अनेकों भूमिकाएं निभाने वाली उनकी पत्नी ने भी ये किरदार निभाने से मना कर दिया. जिसकी वज़ह थी उनकी व्यस्तता. आखिर में जब उन्हें कोई नहीं मिला तो उनके दिमाग में पुरुष को ही महिला किरदार बनाने के ख्याल आया. और उन्होंने इस किरदार को निभाने के खातिर होटल में काम करने वाले एक कुक से बात की. जिसका नाम था ‘अन्ना सालुंके’.

अन्ना सालुंके को अपनी पहली नज़र में देखने वाले दादा साहेब फालके ने उनकी कद-काठी और बनावट को देखते हुए उनसे रानी तारामती के किरदार की खातिर बात की. जिसे सुनने के बाद अन्ना सालुंके ने भी हाँ कर दी. ऐसा इसलिए नहीं था कि, अन्ना को किरदार पसंद आया था. वजह था होटल में काम करते हुए उन्हें महज़ 10 रुपये तनख्वाह मिलती थी. जबकि दादा साहेब ने उन्हें 15 रुपये प्रति महीने देने की बात कही थी. जिसके बाद अन्ना ने बिना देर किए हाँ कर दी थी. यही वजह थी कि, अन्ना भारतीय सिनेमा की ‘पहली अभिनेत्री’ बन गए. 

वहीं दूसरी ओर अभिनेत्री के तौर पर फिल्मी दुनिया में कदम रखने वाले अन्ना सालुंके ने अपने करियर में 5 फिल्मों में अभिनेत्री की भूमिका निभाई. इतना ही नहीं, हिंदी सिनेमा में पहले ‘डबल रोल’ निभाने वाले भी अन्ना सालुंके ही थे. इसके अलावा दादा साहेब फालके ने साल 1917 में एक फिल्म ‘लंका दहन’ बनाई थी. इस फिल्म की सबसे खास बात ये थी कि, इस फिल्म में मुख्य किरदार राम और सीता, का किरदार भारत की पहली अभिनेत्री अन्ना सालुंके ने ही किया था.

हिंदी सिनेमा में पहला डबल रोल निभाने वाले अन्ना सालुंके को उस समय कोई भी दर्शक शायद ही पहचान सका था. इन सबके अलावा अन्ना सालुंके ने दादा साहेब के साथ काम करते हुए अभिनेता होने के साथ-साथ सिनेमेटोग्राफर का हुनर भी सीख लिया. जिसके चलते उन्होंने लगभग 32 फिल्मों में सिनेमेटोग्राफर की भूमिका निभाई. हालांकि जैसे-जैसे दौर बदलता गया कुछ नया सिनेमा में जुड़ता गया और साल 1931 आते-आते देश में फिल्में में आवाज़ दी जाने लगी.

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अब तक ‘साइलेंट’ बनाने वाले अन्ना सालुंके इस बीच न जाने कहां गुम हो गए. और आज एक ऐसा वक्त आ गया है. जहां फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में शामिल होने की ख़ातिर न जाने कितनी लड़कियाँ और लड़के उम्र भर स्ट्रगल करते हैं. अगर हम कहें कि, वो अन्ना सालुंके ही थे, जिन्होंने भारत के लोगों को मानसिकता को बदलकर महिलाओं को पर्दे पर आने का हुनर दिया. लेकिन आज शायद ही इतिहास के इस बाजीगर को कोई जानता हो.

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