हलधर नाग के आदिवासी दुकानदार से आदिवासी कवि बनने की दास्तां

आदिवासी..  एक ऐसा शब्द जो भारत के मूल मानव की पहचान कराता है। लेकिन खुद को ‘सभ्य’ मानने वाले समाज के बड़े वर्ग के लिए ये लोग जंगली, अनपढ़ और गरीब हैं जो जंगल में ही रहना पसंद करते हैं। खैर किसी महान व्यक्ति ने कहा है कि, जो आपके हिसाब से नहीं है इसका मतलब यह नहीं की वो होना ही होना चाहिए। जैसे हम नंबरों के अधार पर टैलेंट की पहचान करते हैं लेकिन हलधर नाग जैसे तीसरी क्लास ड्रॉप आउट व्यक्ति के बारे में सूनते हैं तो लगता है हुनर नंबरों का मोहताज नहीं होता। बल्कि ये तो हमारी सोच के उलट होता है।

हलधर नाग, ये नाम सुनकर आपको कुछ याद आया। एक चेहरा जिसे आपने अपनी टीवी स्क्रिन पर 2016 में तत्कालिक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों पद्मश्री सम्मान लेते देखा होगा। कुछ याद नहीं आया तो जरा इस तस्वीर को देखिए, बड़े काले बाल, शरीर पर खादी का एक जामा और नीचे सफेद रंग की धोती। हलधर को देख कोई भी सोच में पड़ जाए आखिर इस व्यक्ति ने ऐसा क्या किया है!

साल था 1950 का देश में एक ओर संविधान के लागू होने के 3 महीने पूरे होने को थे तो वहीं इसी साल ओडिशा के संभलपुर से लगभग 76 किलोमीटर दूर, बरगढ़ जिले में एक गरीब परिवार में 31 मार्च को एक बच्चे का जन्म हुआ था, जिसका नाम रखा गया हलधर नाग। देश को आजाद हुए भले ही 3 साल हुए थे लेकिन देश अभी भी गरीबी से आजाद नहीं था, आम आदमी की स्थिति बहुत खराब थी। ऐसे में आदिवासी परिवार में जन्में हलधर नाग की स्थिति आम आदमी से भी बद्तर थी। मुश्किल से गुजर रही जिंदगी में एक और पहाड़ टूटा जब हलधर 10 साल के हुए। भारतीय परिवारों में पिता को घर की छत कहा जाता है, जिसके छांव में उसके बच्चे सुकून से अपना बचपन गुजार सकते हैं। हरधर के सिर पर अब यह छत नहीं रही थी। पिता के जाने के बाद हलधर का स्कूल छूटा और जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं।

हलधर नाग ने बहुत कम उम्र में उठाया घर का कारभार

जीने के लिए कमाना जरूरी है, हलधर को यह बात समझ आई और उनकी पढ़ाई तीसरी क्लास के बाद छूट गई। पहले 2 सालों तक दुकान में बर्तन धोने का काम किया फिर एक स्कूल में खाना बनाने की नौकरी मिल गई। यहां उन्होंने 16 साल तक काम किया। हलधर में किताबों के प्रति एक लगाव था। इस बीच उन्होंने यह देखा कि कई सारे स्कूल गांव में खुलने लगे हैं। इस बारे में एक अखबार को बताते हुए हलधर ने कहा था कि स्कूलों की बढ़ती संख्या को देख उन्हें स्टेशनरी खोलने का ख्याल आया और उन्होंने एक बैंक से 1000 रूपये का लोन लेकर यह काम किया।

हलधर नाग

स्टेशनरी की दुकान में ही हलधर कॉपियो पर कुछ न कुछ अपनी कोसली भाषा में लिखते। यही वह समय था जब उन्होंने अपनी एक लिखावट को अखबार में छपने के लिए भेजा। लिखावट कोसली में थी और इसका शिर्षक था ‘ढोडो बरगाछ’ यानि पुराना बरगद का पेड़। कहते हैं जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। यानि जहां सूर्य की किरण नहीं पहुंच सकती वहां कवि की आवाज और संदेश पहुंच जाता है। हलधर नाग की यह लिखावट जब कविता के रूप में पहुंची तो जोरदार रिस्पांस मिला। इससे खुश होकर उन्होंने अपनी कुछ और रचनाएं भेजीं। अखबार ने सारी कविताएं छाप दीं और लोगों को यह सभी बहुत पसंद आईं। हलधर नाग जो कल तक एक आदिवासी दुकानदार थे, वे आज एक आदिवासी कवि बन गए थे, एक आदिवासी कवि जो कोसली में लिखता है।

हलधर नाग की कविताओं को पढ़कर उन्हें नाम मिल ‘लोक कबि रत्न’

इसके बाद हलधर की लोकप्रियता बढ़ने लगी। उन्हें आसपास के गांवों से कविता पाठ के लिए ऑफर मिलने लगे। इससे उनका नाम कुछ ऐसा हुआ कि, उन्हें लोग ‘लोक कवि रत्न’ के नाम से पुकारने लगे। पुराने बरगद की कविता से शुरू हुई हलधर की कविताएं प्रकृति के बाद प्रकृति के लिए जीने वाले आदिवासियों की दशा की ओर केन्द्रित हुईं। वे सामाज के दर्द को अपनी भाषा में कविता के रूप में बयां करते हैं।

यहीं नहीं हलधर की ये रचनाएं जल्द ही स्कूलों में भी पढ़ाई जाएंगी। संभलपुर विश्वविद्यालय में अब उनके लेखन के कलेक्शन ‘हलधर ग्रंथावली-2’ को पाठ्यक्रम में शामिल किया है। साथ ही इनके अंग्रेजी अनुवाद भी मार्केट में किताब के रूप में आने को तैयार हैं। एक इंटरव्य में हलधर ने कहा था कि कवि सब होते हैं, सबके अंदर एक कवि होता है। बस कहने का तरीका नहीं होता। कुछ लोगों के भीतर ही अपने मन के शब्दों को एक रूप देने की कला होती है। वे कहते हैं कि उन्हें यह देख कर काफी खुशी होती है कि देश के युवा कोसली भाषा में भी कविताएं पढ़ना पसंद करते हैं। 

हमारे समाज में कई कवियों को देखा है लेकिन हलदर उनसे अलग हैं। वे एक आदिवासी कवि है, यह मैं इस लिए कह रहा हूं ताकी हम और आप यह समझ सकें कि जिस आदिवासी सामाज को हम पिछड़ा और असभ्य मानते हैं उसी सामाज का एक तीसरी क्लास ड्रॉपआउट व्यक्ति का ज्ञान हमारे सभ्य समाज के कई पढ़े लिखे ज्ञानियों के ज्ञान पर भारी है। क्यों कि उसके अंदर का ज्ञान किताबी नहीं सामाजिक है चेतना से जुड़ा हैं।

उनकी एक शानदार सी कविता जिसका शीर्षक है ‘मैं तुम्हे खत लिख रहा हूं हालधार’। जिसके अर्थ को बताते हुए गुलजार कहते हैं कि इस कविता में कवि खुद को खत लिख रहा है, लेकिन कोसली जुबान में लिखने वाला यह कवि जब अपनी गांव की जमीन पर चलता है तो लगता है वो सारे ग्लोब पर चल रहा है, जब अपने आसपास के लोगों से बात करता है तो लगता है कि वो इस ग्लोब के सभी लोगों से बात कर रहा है और जब वो खुद से बात करता है तो ऐसा लगता है वह इस ग्लोब के हर एक व्यक्ति से बात कर रहा है। इन कविताओं का मूल आदमी की अपनी असली पहचान से है। जिसे एक आदिवासी कवि जो कोसली भाषा में लिखता है वह समझा रहा है।

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